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“जेब गरम, तभी काम नरम: आपूर्ति विभाग में सरकारी बाबुओं की जगह प्राइवेट दलालों का राज!”

"गरीबों की भूख पर दलाली का सौदा: क्या आपूर्ति कार्यालय बन चुका है 'भ्रष्टाचार का अड्डा'?"

अजीत मिश्रा (खोजी)

।। आपूर्ति विभाग या ‘दलाली का अड्डा’? गरीबों की भूख पर सजी है भ्रष्टाचार की महफिल।।

उत्तर प्रदेश

बस्ती ।। जब व्यवस्था खुद बीमार हो जाए और रक्षक ही भक्षक बन जाएं, तो न्याय की उम्मीद किससे की जाए? जिले का आपूर्ति कार्यालय इन दिनों सेवा का केंद्र नहीं, बल्कि खुलेआम भ्रष्टाचार और ‘सुविधा शुल्क’ (रिश्वत) की मंडी बन चुका है।

💫आम जनता की लाचारी, दलालों की चांदी

खबरों के अनुसार, सरकारी फाइलों और ऑनलाइन फीडिंग का पवित्र काम अब प्राइवेट कर्मचारियों के हाथों गिरवी रख दिया गया है। सरकारी दफ्तरों में सरकारी बाबुओं की जगह प्राइवेट ‘बाबू’ का कब्जा है, जो गरीबों से उनकी मेहनत की कमाई ‘सुविधा शुल्क’ के नाम पर डकार रहे हैं। सवाल यह है कि जो व्यक्ति दो वक्त की रोटी जुटाने के लिए राशन कार्ड के दर-दर भटक रहा है, वह 1000 से 2000 रुपये की रिश्वत कहां से लाएगा?

💫नियमों का मजाक, फाइलों का ‘उपवास’

सिस्टम का क्रूर चेहरा देखिए—अगर आप पैसे देने में समर्थ नहीं हैं, तो आपका आवेदन महीनों तक फाइलों की धूल फांकता रहेगा। विभाग के नियम और सरकारी आदेश इन प्राइवेट दलालों के आगे बौने साबित हो रहे हैं। यह सिर्फ एक कार्यालय की बात नहीं है, यह उस पूरे प्रशासनिक ढांचे पर तमाचा है जो जनता की सेवा के लिए बना था।

💫जिम्मेदारी किसकी?

क्या उच्चाधिकारियों को यह सब दिखाई नहीं दे रहा? या उनकी चुप्पी ही इस भ्रष्टाचार को संरक्षण दे रही है? सरकारी काम में बाहरी व्यक्तियों का हस्तक्षेप न केवल सुरक्षा के लिए खतरा है, बल्कि यह गरीब जनता के संवैधानिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है।

🔥अंतिम प्रश्न: क्या जिला प्रशासन इस ‘जेब गरम’ संस्कृति को बंद करने की हिम्मत दिखाएगा, या फिर गरीबों की आह पर इसी तरह दलाली का कारोबार चलता रहेगा? जनता जवाब चाहती है, और कार्रवाई का इंतजार कर रही है।

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