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खुली सीमा, ढीली सुरक्षा: ककरहवा बॉर्डर बना ‘हवाला’ का गलियारा?

सीमा पर नकदी का 'खेल': क्या हम राष्ट्रीय सुरक्षा से कर रहे समझौता?

अजीत मिश्रा (खोजी)

खुली सीमा, ढीली सुरक्षा और ‘हवाला’ का खतरा: क्या हम जाग रहे हैं?

उत्तर प्रदेश

भारत-नेपाल की ‘खुली’ सीमा को अक्सर दोनों देशों के बीच अटूट मित्रता का प्रतीक माना जाता है। लेकिन सिद्धार्थनगर के ककरहवा बॉर्डर से हाल ही में आ रही खबरें इस मित्रता के आवरण में पनप रहे खतरों की ओर इशारा कर रही हैं। जब तीन महीनों में नेपाली मुद्रा की जब्ती के सात मामले सामने आते हैं और विदेशी नागरिकों की संदिग्ध आवाजाही पकड़ी जाती है, तो यह महज इत्तेफाक नहीं, बल्कि एक सोची-समझी चुनौती है।

🔥सुरक्षा में सेंध का ‘कैश’ कनेक्शन

सीमा पर दोनों देशों की मुद्राओं का चलन वहां की अर्थव्यवस्था की मजबूरी हो सकती है, लेकिन यही मजबूरी अब सुरक्षा एजेंसियों के लिए सिरदर्द बन चुकी है। खुले बाजार, ढीले नियम और भारी नकदी का लेनदेन—ये तीनों तत्व मिलकर हवाला कारोबारियों के लिए एक ‘सुरक्षित गलियारा’ (Safe Corridor) तैयार कर रहे हैं।

😇सवाल जो अनुत्तरित हैं:

⭐निगरानी बनाम सुविधा: क्या हम सीमावर्ती व्यापार की सुविधा के नाम पर अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता कर रहे हैं?

⭐प्रवर्तन में कमी: जब नियम स्पष्ट हैं कि 25,000 रुपये से अधिक की राशि पर जब्ती हो सकती है, तो फिर भारी मात्रा में नकदी का सीमा पार करना यह बताता है कि या तो हमारी खुफिया जानकारी कमजोर है या तस्करों का नेटवर्क बहुत गहरा।

⭐दुरुपयोग का चक्र: सीमावर्ती इलाकों में नकदी की यह संदिग्ध आवाजाही केवल व्यापार तक सीमित नहीं है। क्या यह पैसा गलत हाथों में जाकर देश विरोधी गतिविधियों को वित्तपोषित (Finance) तो नहीं कर रहा?

🔥अब समय ठोस कार्रवाई का है

प्रशासन और पुलिस की अपीलें और नागरिकों को जागरूक करना अपनी जगह सही है, लेकिन अपराधियों के हौसले अपील से नहीं, बल्कि सख्त कानूनी नकेल से पस्त होते हैं। यह समय केवल ‘निगरानी’ रखने का नहीं, बल्कि बॉर्डर पर तकनीकी निगरानी बढ़ाने और उन नेटवर्क को जड़ से उखाड़ने का है जो इस ‘खुली सीमा’ का फायदा उठाकर भारत की आर्थिक स्थिरता के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं।

खुली सीमा का मतलब ‘अराजकता’ नहीं हो सकता। समय रहते नहीं चेते, तो यह ‘कैश का फेरबदल’ आने वाले समय में देश के लिए एक बड़ी सुरक्षा चुनौती बन जाएगा।

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