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सुकरौली ब्लॉक परिसर का कुआं बना कूड़ेदान

प्रशासनिक लापरवाही से ऐतिहासिक धरोहर बदहाल

सुकरौली ब्लॉक परिसर का कुआं बना कूड़ेदान: प्रशासनिक लापरवाही से ऐतिहासिक धरोहर बदहाल


सुकरौली बाजार कुशीनगर , हाटा तहसील क्षेत्र के अंतर्गत सुकरौली खंड विकास कार्यालय परिसर में स्थित एक प्राचीन कुआं आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। सुकरौली एडीओ पंचायत कार्यालय के ठीक बगल में बना यह कुआं, जो कभी गांव की आस्था और परंपराओं का केंद्र था, अब कूड़ेदान में तब्दील हो चुका है। पूरे ब्लॉक परिसर की सफाई के बाद निकलने वाला कचरा इसी कुएं में डाला जा रहा है, जिससे यह पूरी तरह भर गया है।

कभी आस्था का केंद्र था यह कुआं | ग्रामीणों और स्थानीय व्यापारियों ने इस स्थिति पर गहरी नाराजगी जताई है। सुकरौली व्यापार संगठन के अध्यक्ष दीपक गुप्ता ने बताया कि एक समय था जब इस कुएं का पानी शादी-विवाह और धार्मिक अनुष्ठानों में प्रयोग होता था। गांव की कई परंपराएं इसी कुएं से जुड़ी थीं। लेकिन आज यह कचरे का अंबार बन चुका है। उन्होंने आश्चर्य व्यक्त किया कि ब्लॉक कार्यालय परिसर में स्थित होने के बावजूद अधिकारियों की नजर इस पर पड़ती है, फिर भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं की जा रही।

बदबू से दूषित हो रहा वातावरण
स्थानीय निवासी सोनू मद्धेशिया ने बताया कि उन्होंने अपने बचपन में इस कुएं का निर्मल जल देखा है। यहां पूजा-पाठ, कथा-वार्ता और अन्य धार्मिक कार्यक्रम आयोजित होते थे। उनका कहना है कि बरसात के दिनों में जब कुएं में पानी भरता है, तो सड़ते कचरे से उठने वाली दुर्गंध आसपास के वातावरण को दूषित कर देती है, जिससे लोगों को परेशानी होती है।
मरम्मत के बाद भी नहीं बदली तस्वीर
पूर्व ग्राम प्रधान राजेश जायसवाल ने बताया कि एक बार कुएं की मरम्मत कराई गई थी और उसमें पानी भी भर गया था, लेकिन समय के साथ फिर से उसमें कचरा डाला जाने लगा। उन्होंने कहा कि यदि संबंधित अधिकारी गंभीरता दिखाएं तो इस ऐतिहासिक धरोहर को पुनर्जीवित किया जा सकता है।
पूर्वांचल की पहचान थे कुएं
पूर्वांचल क्षेत्र में कभी कुएं गांव की समृद्धि और सामाजिक एकता के प्रतीक माने जाते थे। पीने के पानी, सिंचाई और अग्निशमन जैसे कार्यों के साथ-साथ शादी-ब्याह की रस्में—मटकोड़वा और फुलसेरूवा—भी कुएं पर ही संपन्न होती थीं। बदलते समय और जागरूकता के अभाव में आज ऐसे पारंपरिक जलस्रोत विलुप्ति की कगार पर हैं।
अब आवश्यकता है कि प्रशासन और ग्रामीण मिलकर इस धरोहर के संरक्षण की दिशा में ठोस कदम उठाएं, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी अपनी सांस्कृतिक विरासत की महत्ता को समझ सकें।

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