
कटनी
जिले के पिपरौध क्षेत्र में करोड़ों की बेशकीमती आदिवासी जमीन को खुर्द-बुर्द करने का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। इस पूरे खेल में एक महिला जनपद नेता, नामी दाल मिल संचालक और तहसील कार्यालय के ‘धुरंधरों’ की मिलीभगत उजागर हुई है। डोडानी नामक रसूखदारों को लाभ पहुंचाने के लिए न केवल राजस्व नियमों को ठेंगा दिखाया गया, बल्कि उस कानून की भी बलि चढ़ा दी गई जो आदिवासियों के हितों की रक्षा करता है।
सबसे बड़ी मुद्दे की बात यह है कि धारा 165(6) को किया गया दरकिनार
नियमानुसार, आदिवासियों की कृषि भूमि को गैर-आदिवासी को बेचने या हस्तांतरित करने के लिए भू-राजस्व संहिता की धारा 165(6) के तहत जिला कलेक्टर की अनुमति अनिवार्य होती है। लेकिन पिपरौध के इस मामले में ‘सक्षम सहमति’ की जरूरत ही नहीं समझी गई। करोड़ों की जमीन को डोडानी नामक व्यापारी के पक्ष में करने के लिए ‘पारिवारिक बंटवारे’ का सहारा लेकर फर्जी तरीके से नामांतरण (Mutation) कर दिया गया।
अधिकारी का ‘यू-टर्न’: पहले आपत्ति, फिर स्वीकृति
इस पूरे घोटाले में सबसे चौंकाने वाली भूमिका तहसील के अधिकारियों की रही है। सूत्र बताते हैं कि:
एक साल पहले: जिस अधिकारी ने फाइल पर नोट लिखा था कि कलेक्ट्रेट की अनुमति के बिना यह नामांतरण संभव नहीं है”, उसी ने अब हरी झंडी दे दी।
निजी हित सर्वोपरि:चर्चा है कि ‘निजी लाभ’ और ऊंचे संपर्कों के दबाव में आकर उस नोट को दरकिनार किया गया और आनन-फानन में जमीन रसूखदारों के नाम कर दी गई।
सिंडिकेट का जाल: नेता, व्यापारी और अफसर
यह केवल एक जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि एक सुनियोजित सिंडिकेट का काम लग रहा है। इसमें शामिल मुख्य किरदार हैं:
महिला जनपद नेता: राजनीतिक रसूख का इस्तेमाल कर प्रशासनिक बाधाएं दूर की गईं।
दाल मिल संचालक व व्यापारी: पर्दे के पीछे रहकर निवेश और सौदेबाजी को अंजाम दिया।
राजस्व अमला: नियमों की व्याख्या को अपनी सुविधा के अनुसार बदलकर भ्रष्टाचार को रास्ता दिया।
कटनी ब्यूरो चीफ सुरेन्द्र कुमार शर्मा
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