

बलौदाबाजार। ग्राम कुकदा निवासी जगदीश मिरी के मकान को प्रशासन द्वारा तोड़े जाने के मामले में न्यायालय ने सख्त रुख अपनाते हुए तत्काल प्रभाव से रोक लगाने का आदेश दिया है। न्यायालय ने प्रशासनिक कार्रवाई को प्रथम दृष्टया अवैध मानते हुए वाद भूमि पर यथास्थिति बनाए रखने के निर्देश दिए हैं। साथ ही प्रशासन और अन्य पक्षकारों को भूमि पर किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप से प्रतिबंधित कर दिया गया है।
यह मामला केवल एक व्यक्ति के मकान टूटने का नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी जनकल्याणकारी योजना की विश्वसनीयता और प्रशासनिक निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े कर रहा है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, जगदीश मिरी भूमिहीन परिवार से संबंध रखते हैं। शासन की ओर से किए गए सर्वे और जनपद पंचायत की अनुशंसा के बाद उन्हें प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत अन्य 107 हितग्राहियों के साथ आबादी भूमि पर वैध रूप से आवास आवंटित किया गया था। यह मकान उन्हें विधिवत सरकारी प्रक्रिया के तहत मिला था, जिसमें शासन की सहायता राशि भी स्वीकृत की गई थी।
लेकिन गांव के कुछ लोगों—शिवप्रसाद, दुकालू, राधेश्याम, देवदास, विश्वनाथ, मोहनलाल, कृष्णकुमार, सियाराम और सुंदरलाल—को यह आवंटन स्वीकार नहीं हुआ। आरोप है कि 23 जुलाई 2025 की रात इन लोगों ने एकजुट होकर जगदीश मिरी के घर पर हमला किया, दरवाजे और दीवार तोड़ दिए, गाली-गलौज की, और घर में रखी नकदी, जेवर तथा अनाज भी लूट लिया।
पीड़ित परिवार ने थाने में शिकायत दर्ज कराई, लेकिन आरोप है कि प्रशासनिक स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। इसके उलट, अनुविभागीय अधिकारी भाटापारा ने कथित तौर पर ग्रामीणों के दबाव में आकर उक्त मकान को अवैध कब्जा घोषित कर उसे तोड़ने का आदेश जारी कर दिया, जिसके बाद तहसीलदार द्वारा बेदखली वारंट भी जारी कर दिया गया।
सबसे हैरानी की बात यह है कि उसी आबादी भूमि पर बने अन्य मकानों को नहीं छुआ गया, जबकि केवल जगदीश मिरी के मकान पर कार्रवाई की गई। इससे प्रशासनिक भेदभाव और पक्षपातपूर्ण रवैये के आरोप और मजबूत हो गए हैं।
इतना ही नहीं, प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मिली सरकारी सहायता राशि से बना मकान तोड़े जाने से शासकीय धन की भी क्षति हुई, जिससे यह मामला और गंभीर हो गया है। सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि आवंटन अवैध था, तो फिर शासन ने आवास निर्माण के लिए सहायता राशि क्यों स्वीकृत की? और यदि आवंटन वैध था, तो फिर मकान तोड़ने की कार्रवाई किस आधार पर की गई?
न्याय की आस में अंततः जगदीश मिरी ने अपने अधिवक्ता सतीश चन्द्र श्रीवास्तव के माध्यम से सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 80 के तहत नोटिस भेजकर न्यायालय की शरण ली। मामले की सुनवाई करते हुए व्यवहार न्यायाधीश कु. रिद्धि बुराड ने प्रशासन की कार्रवाई को प्रथम दृष्टया अवैध मानते हुए स्थगन आदेश पारित कर दिया।
न्यायालय ने स्पष्ट आदेश दिया कि वाद भूमि पर जगदीश मिरी के कब्जे में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा, साथ ही संबंधित ग्रामीणों एवं प्रशासनिक अधिकारियों—अनुविभागीय अधिकारी और तहसीलदार—को भी हस्तक्षेप से रोका गया है।
इस मामले ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या प्रशासनिक कार्रवाई निष्पक्ष थी, या किसी दबाव में गरीब हितग्राही के आशियाने पर बुलडोजर चलाया गया?
जब सरकार गरीबों को आवास देने के लिए योजनाएं चला रही है, तब उसी योजना के तहत बने मकान को तोड़े जाने की घटना व्यवस्था की संवेदनहीनता और प्रशासनिक विसंगति को उजागर करती है।
अब सबकी निगाहें आगामी न्यायिक प्रक्रिया और प्रशासनिक जवाबदेही पर टिकी हैं, क्योंकि यह मामला केवल जगदीश मिरी के घर का नहीं, बल्कि गरीबों के अधिकार और न्याय व्यवस्था में विश्वास का बन चुका है।





