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मुंडेरवा थाना: रक्षक ही बने भक्षक, प्रशासनिक आदेशों की धज्जियां उड़ाते हुए आरोपी दरोगा ने खुद को ही बरी किया

सवालिया घेरे में पुलिसिया जांच: गंभीर आरोपों के बाद भी उसी दरोगा को सौंपी जांच, जिसे ठहराया गया था जिम्मेदार

अजीत मिश्रा (खोजी)

मुंडेरवा थाना क्षेत्र में पुलिसिया जांच पर उठे सवाल: आरोपी दरोगा ने खुद ही की जांच, खुद को दी ‘क्लीन चिट’

  • प्रशासनिक निर्देशों की अनदेखी: वीडियो प्रकरण में आरोपी दरोगा का ‘स्व-निर्णय’, अब कोर्ट जाने की तैयारी में शिकायतकर्ता।
  • बस्ती में पुलिस व्यवस्था पर उठ रहे सवाल: जांच की निष्पक्षता पर लगा ग्रहण, शिकायतकर्ता को न्याय का इंतजार। 

बनकटी/बस्ती: उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के मुंडेरवा थाना क्षेत्र में जांच प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। एक मामले में जिस उपनिरीक्षक (एसआई) पर गंभीर आरोप लगे थे, उसी को मामले की जांच सौंपी गई और स्वाभाविक रूप से उसने स्वयं को ‘क्लीन चिट’ दे दी। इस घटना ने प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गहरा अविश्वास पैदा कर दिया है।

​घटना का विवरण और पृष्ठभूमि

​मामले की जड़ 23 अप्रैल 2026 की एक सोशल मीडिया घटना है। उस दिन एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें एक मंदिर के पुजारी से संबंधित कुछ कथित संदिग्ध गतिविधियों का जिक्र था। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए, 24 अप्रैल को आईजीआरएस (IGRS) पोर्टल के जरिए मुख्यमंत्री कार्यालय को औपचारिक शिकायत भेजी गई। नियमानुसार, इस मामले की प्रारंभिक जांच मुंडेरवा थाने के उपनिरीक्षक जावेद खान को सौंपी गई थी।

​जांच में लापरवाही और पक्षपात के गंभीर आरोप

​समाजसेवी गंगाराम यादव ने इस पूरे प्रकरण में लालगंज थाना प्रभारी निरीक्षक विनय कुमार पाठक की भूमिका को कटघरे में खड़ा किया है। श्री यादव का आरोप है कि थाना प्रभारी ने जांच में न केवल लापरवाही बरती, बल्कि उनका रवैया पूरी तरह से पक्षपातपूर्ण था। उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों के आदेशों की भी कथित तौर पर अनदेखी की।

​शिकायतकर्ता का दावा है कि बिना किसी साक्ष्य की बारीकी से जांच किए, मामले को ‘निराधार’ बताकर रिपोर्ट उच्चाधिकारियों को भेज दी गई। जब इस रिपोर्ट पर असंतोष जताया गया, तो मामला ‘संपूर्ण समाधान दिवस’ (तहसील दिवस) तक पहुँचा।

​प्रशासनिक आदेशों की अनदेखी

​तहसील दिवस पर शिकायत पर संज्ञान लेते हुए एसडीएम सदर ने लालगंज थाना प्रभारी को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि वे स्वयं मामले की निष्पक्ष जांच करें और आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करें। हालांकि, आरोप है कि प्रशासन के इन निर्देशों का पालन करने के बजाय, जांच प्रक्रिया को गंभीरता से नहीं लिया गया और मामले को फिर से उसी एसआई जावेद खान को सौंप दिया गया, जिन पर पहले से ही पक्षपात का आरोप था। एसआई खान ने इस बार भी मामले को ‘निराधार’ बताकर बंद कर दिया, जिससे जांच की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लग गए हैं।

​शिकायतकर्ता की नाराजगी और अगली रणनीति

​शिकायतकर्ता गंगाराम यादव ने आरोप लगाया है कि उन्होंने मामले से संबंधित वीडियो साक्ष्य, दस्तावेज और ग्रामीणों के हस्ताक्षर युक्त सबूत सौंपे थे, जिन्हें नजरअंदाज कर दिया गया। उन्होंने यह भी बताया कि 25 मई 2026 को उन्होंने पुलिस अधीक्षक से मिलने का प्रयास किया, लेकिन मुलाकात संभव नहीं हो सकी।

​श्री यादव का कहना है कि सीडीओ (CDO) और एसडीएम के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद मामले को बार-बार एक ही तरह की रिपोर्ट लगाकर दबाया जा रहा है। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि जिला प्रशासन और पुलिस विभाग द्वारा मामले की निष्पक्ष जांच नहीं की जाती है, तो उनके पास न्यायालय की शरण में जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा।

​स्थानीय चर्चा और प्रशासन की चुप्पी

​वर्तमान में, यह पूरा प्रकरण स्थानीय स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है। पुलिस और प्रशासन की ओर से अभी तक इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। लोगों का कहना है कि यदि जांच करने वाला स्वयं आरोपी हो, तो न्याय की उम्मीद कैसे की जा सकती है? यह मामला प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगाता है।

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