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खलीलाबाद में दबंगई: रोडवेज प्रभारी को पीटा, छीन लिया मोबाइल; क्या अब ‘ठेकेदार’ तय करेंगे कानून?

सरेआम सरकारी सेवक से मारपीट: रोडवेज प्रभारी को धमकी, प्रशासन की चुप्पी पर उठ रहे सवाल!

अजीत मिश्रा (खोजी)

खलीलाबाद में ‘गुंडागर्दी’ का नंगा नाच: रोडवेज प्रभारी को सरेआम पीटा, प्रशासनिक संरक्षण का खेल या दबंगों का खौफ?

ब्यूरो रिपोर्ट | बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश

  • ‘जंगलराज’ का ट्रेलर! खलीलाबाद में बस स्टैंड पर गुंडों का कब्जा, वर्दी और पद का भी नहीं रहा खौफ।
  • नगर पालिका का ठेकेदार बना ‘सिस्टम’ का दुश्मन; रोडवेज प्रभारी से हाथापाई, वीडियो बना सबूत।
  • क्या अब रोडवेज प्रभारी को गुंडों से मिलेगी ‘सुरक्षा की भीख’? खलीलाबाद में कानून-व्यवस्था पर शर्मनाक हमला।
  • बस्ती मंडल में कानून का इकबाल खत्म? रोडवेज प्रभारी से मारपीट के बाद मची खलबली, प्रशासन मौन क्यों?

संतकबीरनगर: क्या खलीलाबाद की सड़कों पर अब कानून का शासन नहीं, बल्कि ‘ठेकेदारों की हुकूमत’ चलेगी? ताजा मामला रोडवेज बस डिपो के प्रभारी टी.एन. दूबे के साथ हुई शर्मनाक घटना का है। एक सरकारी कर्मचारी के साथ दिन-दहाड़े की गई मारपीट और जान से मारने की धमकी ने यह साबित कर दिया है कि स्थानीय दबंगों के सिर से पुलिस और प्रशासन का डर पूरी तरह उतर चुका है।

क्या है पूरा मामला?

​खलीलाबाद-बनारस मार्ग पर चलने वाली रोडवेज बस को बाइपास ओवरब्रिज के नीचे चंद मिनट खड़ा करना एक सरकारी अधिकारी के लिए ‘गुनाह’ बन गया। नगर पालिका के कथित ठेकेदार हेमंत तिवारी और उसके गुर्गों ने न केवल बस को रोकने की जुर्रत की, बल्कि ड्यूटी पर तैनात रोडवेज प्रभारी को सरेआम अपमानित किया।

​आरोप है कि जब प्रभारी ने कानूनन अपना पक्ष रखने की कोशिश की, तो ठेकेदार और उसके सहयोगियों ने हाथापाई की, मोबाइल छीना और धक्का देकर जमीन पर गिरा दिया। यह घटना किसी सुनसान इलाके में नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्थान पर हुई, जहाँ भीड़ तमाशबीन बनी देखती रही और सरकारी तंत्र का इकबाल पस्त होता रहा।

प्रशासनिक निष्क्रियता पर उठ रहे सवाल

​पीड़ित प्रभारी ने अपर जिलाधिकारी (ADM) को शिकायती पत्र देकर न्याय की गुहार लगाई है। उनके पास घटना की वीडियो रिकॉर्डिंग मौजूद है, जो इस ‘गुंडागर्दी’ का कच्चा-चिट्ठा खोलने के लिए पर्याप्त है। लेकिन सवाल यह है कि:

  • ​क्या सरकारी कामकाज में बाधा डालने और अधिकारी पर हाथ उठाने वाले दबंगों पर मुकदमा दर्ज करने में प्रशासन को किस बात का इंतजार है?
  • ​क्या नगर पालिका के ठेकेदारों को कानून हाथ में लेने का ‘लाइसेंस’ मिला हुआ है?
  • ​क्या रोडवेज जैसे विभाग का कर्मचारी अपनी ड्यूटी पूरी करने के लिए अब ‘गुंडों’ से अनुमति लेगा?

‘न्याय’ या ‘लीपापोती’?

​बस्ती मंडल के संतकबीरनगर में कानून-व्यवस्था की स्थिति पहले ही सवालों के घेरे में है। यदि ऐसे मामलों में आरोपियों को तत्काल गिरफ्तार नहीं किया गया, तो यह सरकारी कर्मचारियों का मनोबल तोड़ने के लिए काफी होगा। जनता अब प्रशासन की तरफ देख रही है—क्या अधिकारी दोषियों को सलाखों के पीछे भेजेंगे या फिर हमेशा की तरह दबाव में आकर मामले को ‘ठंडे बस्ते’ में डाल दिया जाएगा?

​शहर के जागरूक नागरिक पूछ रहे हैं—क्या यह ‘सुशासन’ है जहाँ सरेराह सरकारी सेवक असुरक्षित महसूस कर रहे हैं?

प्रशासन को अब चुप्पी तोड़नी होगी, वरना सड़क पर ‘जंगलराज’ का कब्जा होते देर नहीं लगेगी।

नोट: इस मामले में दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई न होना, प्रशासन की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा सवालिया निशान है।

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