
बस्ती का स्वास्थ्य तंत्र या ‘डिग्री का धंधा’? क्या अब भी बख्शे जाएंगे ‘कातिल’ डॉक्टर!
- बस्ती: गलत मेडिकल रिपोर्ट मामले में अब डॉक्टर की डिग्री की होगी गहन पड़ताल, मंडलायुक्त ने दिए सख्त आदेश।
- स्वास्थ्य विभाग की बड़ी कार्रवाई: ताहिरा हॉस्पिटल के डॉक्टर के शैक्षणिक दस्तावेजों की जांच शुरू।
बस्ती। क्या बस्ती का स्वास्थ्य विभाग केवल फाइलों को इधर से उधर करने के लिए बना है? क्या अस्पतालों में मरीजों की जान की कीमत महज एक गलत ‘रिपोर्ट’ भर है? शहर के ताहिरा हॉस्पिटल और लाइफ लाइन अस्पताल से जुड़ा मामला अब एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ केवल अस्पताल की खामियाँ ही नहीं, बल्कि ‘डॉक्टर साहब’ की साख और उनकी तथाकथित डिग्री पर भी बड़ा सवालिया निशान लग गया है।
मंडलायुक्त की सख्ती, विभाग की नींद खुली
मोहम्मद इमरान के परिवार ने जब अपने बच्चे के गलत इलाज और फर्जी रिपोर्ट की व्यथा सुनाई, तो यह केवल एक परिवार का दर्द नहीं था, बल्कि उन हजारों लोगों की चीख थी जो अक्सर ऐसे ‘सफेदपोश’ लुटेरों के जाल में फंसते हैं। युवा भाजपा नेता सचिन सिंह द्वारा इस मामले को मंडलायुक्त अखिलेश सिंह के दरबार तक ले जाना यह दर्शाता है कि प्रशासनिक गलियारों में भी अब इस ‘मेडिकल माफिया’ के खिलाफ गुस्सा उबल रहा है। मंडलायुक्त के आदेश के बाद दोबारा शुरू हुई जांच ने यह साबित कर दिया है कि पिछली जांचें या तो ‘दबाव’ में थीं या फिर ‘लेन-देन’ की भेंट चढ़ गईं।
क्या डॉक्टर की डिग्री भी ‘मैनेज’ की गई है?
सबसे डरावना पहलू यह है कि अब जांच डॉक्टर सुहेल की डिग्री पर टिकी है। यदि किसी डॉक्टर की डिग्री ही संदिग्ध है, तो सोचिए कि वह डॉक्टर कितने मासूमों की जान से खेल रहा होगा? यह महज लापरवाही नहीं, बल्कि अपराध है। यदि डिग्री फर्जी निकलती है, तो जिम्मेदारी कौन लेगा? उन अधिकारियों की गर्दन कौन नापेगा, जिन्होंने अब तक इन अस्पतालों को फलता-फूलता देखा और ‘अंधा’ बनकर अपनी फाइलें बंद करते रहे?
स्वास्थ्य विभाग की साख दांव पर
एडी हेल्थ डॉ. नीरज कुमार पांडेय कह रहे हैं कि “जांच के बाद कार्रवाई होगी।” लेकिन सवाल यह है कि ‘जांच’ कब खत्म होगी? कहीं यह जांच रिपोर्ट भी ठंडे बस्ते में जाने के लिए तो नहीं बनाई जा रही? बस्ती की जनता देख रही है। अगर इस बार भी दोषियों को संरक्षण दिया गया, तो यह मान लिया जाएगा कि बस्ती में इलाज के नाम पर ‘मौत का सौदा’ करने वाले इन माफियाओं को सत्ता और प्रशासन का खुला संरक्षण प्राप्त है।
निष्कर्ष: अब आर-पार की लड़ाई
यह मामला अब सिर्फ एक हॉस्पिटल का नहीं रह गया है। यह बस्ती के उन तमाम लोगों के सम्मान और सुरक्षा का प्रश्न है, जो डॉक्टर को भगवान मानकर अपनी तिजोरी खाली करते हैं। यदि डॉक्टर की डिग्री फर्जी है, तो उन पर केवल विभागीय कार्रवाई नहीं, बल्कि ‘गैर-इरादतन हत्या’ का मुकदमा दर्ज होना चाहिए और अस्पतालों पर ताले पड़ने चाहिए।
बस्ती को अब दिखावे की जांच नहीं, ठोस परिणाम चाहिए। क्या प्रशासन में इतना साहस है?
इस प्रकरण में आगे की कार्रवाई और दोषी पाए जाने पर प्रशासन द्वारा लिए जाने वाले कड़े निर्णयों पर हमारी नजर बनी रहेगी।






