बस्ती का स्वास्थ्य विभाग: मौत के बाद भी नहीं जगी संवेदना
बस्ती में स्वास्थ्य सेवाओं का बुरा हाल: मरीजों की जान पर भारी पड़ रही अस्पतालों की मनमानी और प्रशासन की चुप्पी इलाज के नाम पर मौत का खेल: मुंडेरवा से लेकर शहर तक, कई मौतों के बावजूद कार्रवाई के नाम पर केवल खानापूर्ति
अजीत मिश्रा (खोजी)
स्वास्थ्य व्यवस्था का ‘आईसीयू’: क्या मरीजों की जान की कोई कीमत नहीं?
- नवजात की जान से खिलवाड़: फर्जी रिपोर्ट देने वाले डॉक्टर पर मेहरबान प्रशासन, महज 25 हजार के जुर्माने में सिमटी जिम्मेदारी
- स्वस्थ बच्चे को बताया ‘दिल का बीमार’, स्टेशन रोड के डॉक्टर की करतूत उजागर; अब डिग्री की होगी जांच
- अस्पताल सील, संचालक फरार, जांच बेनतीजा: क्या बस्ती का स्वास्थ्य विभाग अपराधियों को दे रहा है संरक्षण?
बस्ती में स्वास्थ्य विभाग और निजी अस्पतालों की मिलीभगत का एक ऐसा काला अध्याय खुल रहा है, जो किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को झकझोर कर रख देने के लिए काफी है। जिले में इलाज के नाम पर ‘मौत का खेल’ चल रहा है और प्रशासन मूकदर्शक बना हुआ है।बस्ती जिले में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति अत्यंत चिंताजनक बनी हुई है। निजी अस्पतालों में इलाज के नाम पर हो रही लापरवाही और मौतों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है, और इन मामलों में प्रशासनिक कार्रवाई की गति बेहद धीमी है।
विभिन्न अस्पतालों में लापरवाही के मामले
जिले के कई निजी अस्पताल गंभीर सवालों के घेरे में हैं:
- मुंडेरवा स्थित अस्पताल: एक महिला की मौत के मामले में एक महीने से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी जांच टीम किसी ठोस निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाई है। हालांकि अस्पताल सील है और दो कर्मचारी जेल भेजे जा चुके हैं, लेकिन मुख्य संचालक अभी भी फरार हैं और चिकित्सकों ने अपना बयान दर्ज नहीं कराया है।
- जिगिना अस्पताल: यहां के भी आईपीडी और ओपीडी सील कर दिए गए हैं, लेकिन इसके अतिरिक्त कोई ठोस कानूनी कार्रवाई नहीं हुई है।
- अन्य अस्पताल: मालवीय रोड, पचेडिया, गड़गोड़िया और कटरा स्थित अस्पतालों में भी मरीजों की मौत के मामले सामने आए हैं, जिन पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है।
- बरदहिया: एक क्लीनिक में ऑपरेशन के बाद महिला की मौत का मामला भी जांच और कार्रवाई की प्रतीक्षा कर रहा है।
साजिश या लापरवाही?
मुंडेरवा स्थित अस्पताल में एक महिला की मौत को एक महीना बीत चुका है, लेकिन जांच अभी भी किसी नतीजे पर नहीं पहुंची है। अस्पताल सील है, कर्मचारी जेल में हैं, लेकिन असली गुनहगार—अस्पताल के संचालक—खुलेआम घूम रहे हैं। सवाल यह है कि यदि संचालक नामजद हैं, तो उनकी गिरफ्तारी अब तक क्यों नहीं हुई? क्या सिस्टम का ‘सॉफ्ट कॉर्नर’ केवल रसूखदारों के लिए है?
जुर्माना या लीपापोती?
नवजात के इलाज में लापरवाही और उसे गलत रिपोर्ट देकर डराने का मामला सामने आता है। एक तथाकथित ‘हृदय रोग विशेषज्ञ’ बच्चे के दिल में सुराख होने की झूठी रिपोर्ट देता है, जो लखनऊ में गलत साबित होती है। हद तो तब हो गई जब प्रशासन ने जांच के नाम पर महज 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली। क्या एक मासूम के जीवन के साथ खिलवाड़ और मानसिक प्रताड़ना की कीमत मात्र 25 हजार रुपये है?नवजात के साथ धोखाधड़ी और जांच का खेल
दिसंबर 2025 का एक मामला विशेष रूप से हैरान करने वाला है:
- घटना का विवरण: मो. इमरान ने अपने नवजात बेटे को बीमारी के कारण ‘दक्षिण दरवाजा’ स्थित अस्पताल में भर्ती कराया था। वहां एक स्टाफ ने डॉक्टर के बजाय बच्चे को ‘स्वस्थ’ लिख दिया, जबकि बाद में डॉक्टर ने जांच में बच्चे की स्थिति खराब बताई।
- फर्जी रिपोर्ट का आरोप: इलाज के दौरान नवजात को ‘स्टेशन रोड’ स्थित एक डॉक्टर के पास भेजा गया, जिसने स्वयं को हृदय रोग विशेषज्ञ बताकर बच्चे के दिल में ‘सुराख’ होने की रिपोर्ट दी।
- लखनऊ में खुली पोल: लखनऊ के राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान में जांच कराने पर पता चला कि बच्चे के दिल में कोई सुराख नहीं है, और स्थानीय डॉक्टर की रिपोर्ट गलत थी।
जिम्मेदारी से भागता स्वास्थ्य महकमा
मालावीय रोड, पचेडिया, गड़गौड़िय और कटरा स्थित अस्पतालों में मरीजों की मौत के मामले आज भी फाइलों में धूल फांक रहे हैं। इन पर कोई ठोस कार्रवाई न होना यह दर्शाता है कि स्वास्थ्य विभाग या तो अपनी जिम्मेदारी निभाने में पूरी तरह विफल है या फिर वह इन निजी अस्पतालों के अनैतिक व्यापार को संरक्षण दे रहा है।
- जुर्माना: डीएम के निर्देश पर जिला अस्पताल की टीम द्वारा की गई जांच में ‘दक्षिण दरवाजा’ स्थित अस्पताल पर 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया।
- डॉक्टर की डिग्री पर सवाल: स्टेशन रोड के जिस डॉक्टर ने गलत रिपोर्ट दी थी, उसकी डिग्री की जांच कराने के निर्देश दिए गए हैं।
- सीएमओ का पक्ष: सीएमओ डॉ. राजीव निगम का कहना है कि दक्षिण दरवाजा स्थित अस्पताल की जांच पूरी हो चुकी है, जिसमें डॉक्टर को दोषमुक्त करते हुए केवल प्रशासनिक खामियों के लिए जुर्माना लगाया गया है।
निष्कर्ष
जब डॉक्टर खुद को विशेषज्ञ बताकर फर्जी रिपोर्ट जारी करने लगें और प्रशासन उन पर कड़ी कार्रवाई करने के बजाय केवल जुर्माने का खानापूर्ति करे, तो आम आदमी जाए तो कहां जाए? यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि मानवता के खिलाफ अपराध है। अब समय आ गया है कि स्वास्थ्य विभाग कागजी कार्रवाई छोड़कर इन ‘मौत के सौदागरों’ पर नजीर पेश करने वाली कठोर कार्रवाई करे। अन्यथा, आने वाले समय में जनता का सिस्टम पर से भरोसा पूरी तरह उठ जाएगा।








