
सील अस्पताल में चल रहा था ऑपरेशन; प्रशासन की नाक के नीचे ‘यमराज’ की दुकान!
क्या इटवा में कानून मर चुका है? सील अस्पताल में इलाज का खेल देख दंग रह गई पुलिस। स्वास्थ्य विभाग की चेतावनी का मजाक: एफआईआर के बाद भी बेखौफ चल रहा था अस्पताल।
अजीत मिश्रा (खोजी)
स्वास्थ्य विभाग की खुली चुनौती: सील अस्पताल में ऑपरेशन, आखिर किसके संरक्षण में चल रही ‘यमराज की दुकान’?
- ‘बंद’ अस्पताल की ‘खुली’ पोल: रात के अंधेरे में हो रहे थे ऑपरेशन, स्वास्थ्य विभाग को नहीं थी भनक?
- अस्पताल सील, पर माफियाओं का खेल जारी; मरीजों की जान का सौदा किसके संरक्षण में।
- इटवा में स्वास्थ्य व्यवस्था को धता: जनता सेवा हॉस्पिटल सील, संचालक पर कसेगा कानूनी शिकंजा।
- प्रशासनिक सख्ती या खानापूर्ति? अवैध अस्पताल पर छापेमारी के बाद उठे कई बड़े सवाल।
इटवा, सिद्धार्थनगर: क्या इटवा के स्वास्थ्य महकमे का कानून सिर्फ कागजों और नोटिसों तक सीमित रह गया है? यह सवाल शनिवार देर रात जनता सेवा हॉस्पिटल में हुए छापेमारी के बाद हर नागरिक की जुबान पर है। जिस अस्पताल को प्रशासन ने पूर्व में दर्ज एफआईआर के बाद ‘बंद’ करने का आदेश दिया था, उसी अस्पताल में देर रात ऑपरेशन थियेटर की लाइटें जलना प्रशासनिक व्यवस्था पर एक बड़ा तमाचा है।
कागजी सील, धड़ल्ले से इलाज
पूर्व में गंभीर शिकायतों और एफआईआर के बाद स्वास्थ्य विभाग ने अस्पताल पर ताला लगाने का निर्देश दिया था। बाहर बाकायदा ‘अस्पताल बंद है’ का बोर्ड चस्पा था, लेकिन यह महज एक छलावा साबित हुआ। अंदर मरीजों की जान से खिलवाड़ जारी था। 27 जून की देर रात जब स्वास्थ्य विभाग, प्रशासन और पुलिस की संयुक्त टीम ने छापा मारा, तो वहां ऑपरेशन की प्रक्रिया चल रही थी। यह साबित करता है कि कानून का डर संचालक के लिए कोई मायने नहीं रखता।
क्या प्रशासन की नाक के नीचे चल रहा था खेल?
नोडल अधिकारी डॉ. मनिंदर पाल, एसडीएम इटवा और पुलिस बल की मौजूदगी में हुई इस कार्रवाई ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं:
- जब अस्पताल पर प्रशासनिक रोक थी, तो वहां ऑपरेशन के लिए उपकरण, दवाइयां और स्टाफ कहाँ से आया?
- क्या बिजली-पानी की आपूर्ति और अन्य संसाधन किसी के संरक्षण के बिना बहाल थे?
- प्रशासन की ‘कड़ी चेतावनी’ का मजाक उड़ाने की हिम्मत संचालक को कैसे हुई?
मरीजों की जान को दांव पर लगाने का दुस्साहस
जांच टीम ने मौके पर मौजूद मरीजों को तुरंत अन्य अस्पतालों में शिफ्ट कराया, लेकिन यह घटना यह बताने के लिए काफी है कि यहां मरीजों की सुरक्षा प्राथमिक नहीं, बल्कि अवैध कमाई का जरिया थी। अस्पताल को सील तो कर दिया गया है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सील फिर से कुछ दिनों में किसी ‘ऊपरी दबाव’ या ‘जुगाड़’ से खुल जाएगी?
अब कार्रवाई की बारी
अधिकारियों ने संचालक और स्टाफ के खिलाफ कठोर कार्रवाई की बात तो कही है, लेकिन जनता को अब आश्वासनों से ज्यादा ठोस कार्रवाई की दरकार है। क्या स्वास्थ्य विभाग यह पता लगा पाएगा कि इस पूरे गोरखधंधे के पीछे किसका हाथ है?
अस्पताल सील करना तो महज शुरुआत होनी चाहिए। यदि जिम्मेदार अधिकारियों ने इस ‘अवैध कमाई’ के पूरे सिंडिकेट को ध्वस्त नहीं किया, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि इटवा में कानून का शासन नहीं, बल्कि माफियाओं का राज चल रहा है।
क्या आपको लगता है कि इस तरह के अस्पतालों के संचालकों के खिलाफ केवल सील करने की कार्रवाई पर्याप्त है, या उन पर सख्त आपराधिक मुकदमा चलाकर जेल भेजा जाना चाहिए?

















