उत्तर प्रदेशबस्ती

वन विभाग की बड़ी लापरवाही: पौधरोपण अभियान के तहत नर्सरी से मंगाए गए पौधे सड़क किनारे फेंके मिले और वे सूख चुके हैं।

माँ के नाम पर पौधा लगाना आस्था है, लेकिन माँ के नाम पर आस्था से खिलवाड़ करना अपराध है। जब नर्सरी से पौधा लाकर सड़क पर फेंक दिया जाए, तो यह वन विभाग की लापरवाही नहीं, पर्यावरण के साथ आपराधिक कृत्य है।

अजीत मिश्रा (खोजी)

“एक पेड़ मां के नाम”: हरियाली का दावा या कागजी ढकोसला और प्रशासनिक लापरवाही?

  • निर्धारित लक्ष्य: वन विभाग को विजवलिया से अमरौना गांव तक सड़क के बगल में लगभग 4,000 पौधे लगाने थे।
  • मामले की जानकारी और लीपापोती: वन विभाग के कप्तानगंज रेंज के अंतर्गत आने वाले इस मामले की जानकारी होते ही विभाग ने मौके से सूखे पौधों को हटा दिया।

​देश भर में पर्यावरण संरक्षण और हरित आवरण को बढ़ाने के लिए जोर-शोर से “एक पेड़ मां के नाम” जैसे अभियानों का ढिंढोरा पीटा जाता है। माँ के आंचल सी ममता और पवित्रता से जुड़े इस भावुक नाम के सहारे जनता को पौधे लगाने के लिए प्रेरित किया जाता है। लेकिन, जब इन अभियानों का सच ज़मीन पर उतरता है, तो सरकारी तंत्र की संवेदनहीनता और दावों की कलई खुलकर सामने आ जाती है।

​बस्ती जिले के रुधौली क्षेत्र से सामने आई एक खबर इस तथाकथित हरित क्रांति के खोखलेपन और प्रशासनिक लापरवाही का जीता-जागता और तीखा उदाहरण है।

​सड़कों की पटरियों पर दम तोड़ते पौधे और कागजी लक्ष्य

​वन विभाग के कप्तानगंज रेंज के अंतर्गत कुदहा ब्लॉक क्षेत्र में विजवलिया से गौराघाट जाने वाली प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क को पौधरोपण के लिए चुना गया था। योजना के तहत विजवलिया से अमरौना गांव तक करीब 4,000 पौधे रोपित किए जाने का बड़ा और भव्य लक्ष्य रखा गया था। इसके तहत एक माह पूर्व सड़क की दोनों पटरियों पर गड्ढे भी खोदे गए थे।

​लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त इसके बिल्कुल विपरीत निकली। अधिकारियों की उदासीनता देखिए कि नर्सरी से मंगाए गए पौधे गड्ढों में रोपे जाने के बजाय सड़क की पटरियों पर लावारिस फेंक दिए गए, जो देखते ही देखते सूखकर बेजान हो गए। अमरौना-माधपुर मोड़ से लेकर रोवागोवा नलकूंप तक जगह-जगह सागौन के पौधे बड़ी संख्या में सूखे और फेंके हुए पाए गए।

​लीपापोती और ज़िम्मेदारी से भागता तंत्र

​जब इस घोर लापरवाही और हरियाली के मज़ाक की भनक जिम्मेदार अधिकारियों तक पहुँची, तो सुधार करने के बजाय लीपापोती का खेल शुरू हो गया।

  • ​जब ग्रामीणों ने सूखे और फेंके गए पौधों की शिकायत वन विभाग से की, तो ज़िम्मेदार अधिकारियों ने अपनी खाल बचाने के लिए मौके से उन सूखे पौधों को ही गायब करवा दिया
  • ​विभाग के कारनामों पर पर्दा डालने के लिए बाद में कुछ जगहों पर दूसरे सागौन के पेड़ जरूर लगवाए गए, लेकिन तब तक अभियान की नीयत और कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हो चुके थे।

बस्ती में आंकड़ों का मायाजाल, जमीन पर सूख

यह घटना कोई अपवाद नहीं, बल्कि बस्ती जिले में हरियाली के नाम पर चल रहे आंकड़ों के खेल की एक बानगी है।

  • वर्षाकाल 2026 के लिए अकेले बस्ती जिले में 53.66 लाख पौधे लगाने का लक्ष्य तय किया गया है। वन विभाग ने इस वर्ष 16 लाख 95 हजार पौधों के वितरण और 600 हेक्टेयर भूमि पर पौधरोपण का लक्ष्य रखा है।
  • 2026-27 के लिए जिले की 1136 ग्राम पंचायतों में 14,52,879 पौधे लगाने का District Greening Plan भी घोषित है। विश्व पर्यावरण दिवस पर जिले में कुल 5.99 लाख पौधे लगवाने का दावा भी प्रशासन कर चुका है।
  • सवाल यह है कि जब विजवलिया-गौराघाट जैसी सड़क पर 4,000 पौधों की देखभाल नहीं हो पाई, तो 53 लाख पौधों का क्या होगा? कितने कागजों पर जिंदा रहेंगे और कितने जमीन पर?

जिम्मेदार कौन? जनता को क्या संदेश?

​जब मीडिया और स्थानीय लोगों ने इस बदइंतजामी पर सवाल उठाया, तो क्षेत्रीय वन दरोगा राजा राम चौहान का अजीबोगरीब बयान सामने आया। उनका कहना था कि “पौधे लगाने के लिए रखे गए थे, कहीं कोई पौधा फेंका नहीं गया”। साफ है कि आंखों देखी सच्चाई से मुंह मोड़ने और अपनी नाकामी छिपाने की यह पुरानी आदत सरकारी तंत्र का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है।

​सवाल यह उठता है कि जब विभाग के नुमाइंदे ही पौधों की कीमत, पर्यावरण की जरूरत और इस राष्ट्रीय महत्व के अभियान की गंभीरता को नहीं समझ पा रहे, तो आम जनता को क्या संदेश दिया जा रहा है? मां के नाम पर पेड़ लगाने के नाम पर जनता की भावनाओं से खिलवाड़ करने का यह सिलसिला कब थमेगा?

​यदि हरियाली के नाम पर केवल कागजों में आंकड़े गढ़े जाते रहेंगे और ज़मीन पर पौधे यूं ही सड़कों के किनारे दम तोड़ते रहेंगे, तो आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ हवा और हरा-भरा पर्यावरण मिलने के सपने महज छलावा ही साबित होंगे।

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