बस्ती: छावनी थाने में न्याय की गुहार बेअसर, गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज करने के बजाय पुलिस कर रही लीपापोती।
बस्ती जनपद के छावनी थाने की इस कार्यशैली ने यह साबित कर दिया है कि यहां पीड़ितों की सुनवाई कागजों तक ही सीमित है। जब एक आम नागरिक थाने में न्याय मांगने जाता है, तो उसकी तहरीर को कचरे के डिब्बे में डाल दिया जाता है या फिर मामले को हल्के धाराओं में रफा-दफा कर दिया जाता है।
अजीत मिश्रा (खोजी)
बस्ती जनपद के छावनी थाने में न्याय की आस अधूरी: गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज करने के बजाय खानापूर्ति, पुलिस की कार्यशैली पर खड़े हुए बड़े सवाल
- बाघानाला कांड: शराब की दुकान पर मुफ्त शराब मांगने, गाली-गलौज और लाठी-डंडों से मारपीट के मामले में पुलिस की कार्यशैली पर उठे गंभीर सवाल।
- खानापूर्ति का खेल: संगीन धाराओं में मुकदमा लिखने के बजाय आरोपी पर केवल शांतिभंग की कार्रवाई कर इतिश्री कर रही छावनी पुलिस।
- पीड़ित की पुकार अनसुनी: थाने की चौखट पर न्याय मांगने पहुंचे दुकानदार रोहित की तहरीर को किया गया दरकिनार, दबंगों के हौसले बुलंद।
बस्ती: जनपद के छावनी थाना क्षेत्र के अंतर्गत पुलिस की मनमानी और लीपापोती का एक और मामला सामने आया है। एक तरफ जहां थाने की चौखट पर न्याय की गुहार लगाने पहुंचे पीड़ित की गंभीर शिकायतों को दरकिनार कर दिया जाता है, वहीं दूसरी तरफ पुलिस अपने महकमे के रसूख और लीपापोती के दम पर मामलों को हल्का करने में जुट जाती है। छावनी थाने की कार्यप्रणाली अब गंभीर सवाल के घेरे में है, जहां दबंगों द्वारा मारपीट, गाली-गलौज और जानलेवा हमले जैसी घटनाओं में भी एफआईआर दर्ज करने से गुरेज किया जा रहा है।
क्या है पूरा मामला?
प्राप्त जानकारी और पीड़ित द्वारा दिए गए प्रार्थना पत्र के अनुसार, छावनी थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले ग्राम टिकरिया के रहने वाले रोहित (पुत्र जंगबहादुर सिंह) की बाघानाला में देसी शराब की दुकान है, जहां उनका भाई विपिन सेल्समैन का काम करता है। आरोप है कि बाघानाला गांव निवासी गोलही (पुत्र रामचेत) दुकान पर पहुंचा और बिना पैसे दिए जबरन शराब की मांग करने लगा।
जब सेल्समैन ने इसका विरोध किया, तो आरोपी ने मां-बहन की गंदी गालियां दीं और जान से मारने की धमकी देते हुए वहां से भाग निकला। इसके बाद जब पीड़ित रोहित इस बात की शिकायत करने और पूछने के लिए उसके घर गया, तो आरोपी गोलही और आरती (पत्नी गोलही) ने मिलकर रोहित पर लाठी-डंडों से हमला कर दिया। इस मारपीट में पीड़ित को गंभीर चोटें आईं और उसे जान से मारने की धमकी भी दी गई।

थाने में प्रार्थना पत्र, लेकिन एफआईआर के नाम पर शून्य
घटना के तुरंत बाद पीड़ित रोहित ने थाना प्रभारी, छावनी (जनपद बस्ती) को लिखित तहरीर देकर न्याय की गुहार लगाई और सुसंगत धाराओं में मुकदमा दर्ज कर सख्त कार्रवाई की मांग की। लेकिन हैरानी इस बात की है कि पीड़ित की इस गंभीर शिकायत पर पुलिस ने संगीन धाराओं में एफआईआर दर्ज करने जहमत तक नहीं उठाई।
अखबारों की सुर्खियां और पुलिस की लीपापोती
दिलचस्प पहलू यह है कि जब मीडिया में यह मामला उछला, तो खाकी अपनी पीठ थपथपाने और लीपापोती करने के लिए तुरंत सक्रिय हो गई। अखबारों में छपी खबरों के मुताबिक, पुलिस ने इस गंभीर घटना का रुख ही मोड़ दिया और केवल “शांतिभंग” (147/151 या संबंधित निरोधात्मक कार्रवाई) में चालान कर इतिश्री कर ली।
- गंभीर धाराओं से बचाव: जहां एक तरफ पीड़ित ने घर में घुसकर लाठी-डंडों से मारपीट, गाली-गलौज और जान से मारने की धमकी देने का गंभीर आरोप लगाया, वहीं पुलिस ने इसे महज़ एक मामूली विवाद बना दिया।
- सिपाही से धक्का-मुक्की बनाम आम जनता पर अत्याचार: पुलिस अपनी खाल बचाने के लिए खबरों में इसे “सिपाही से धक्का-मुक्की” का रंग देकर आरोपियों पर केवल खानापूर्ति की कार्रवाई कर रही है, जबकि थाने में दी गई मूल तहरीर में एक आम नागरिक और दुकानदार के साथ हुई बर्बरता का स्पष्ट जिक्र है।
जनता सवाल पूछती है—क्या खाकी के राज में दबंगों को खुली छूट है?
बस्ती जनपद के छावनी थाने की इस कार्यशैली ने यह साबित कर दिया है कि यहां पीड़ितों की सुनवाई कागजों तक ही सीमित है। जब एक आम नागरिक थाने में न्याय मांगने जाता है, तो उसकी तहरीर को कचरे के डिब्बे में डाल दिया जाता है या फिर मामले को हल्के धाराओं में रफा-दफा कर दिया जाता है।
क्या बस्ती पुलिस अधीक्षक इस मामले का संज्ञान लेंगे? क्या छावनी थाने की इस लचर और संदेहास्पद कार्यप्रणाली की निष्पक्ष जांच होगी, या फिर दबंगों और अपराधियों के हौसले यूं ही बुलंद होते रहेंगे? यह सवाल आज हर उस आम आदमी की जुबान पर है जो कानून व्यवस्था पर भरोसा करके थाने की सीढ़ियां चढ़ता है।















