49 लाख के फर्जी आर्डर और भुगतान का मामला पकड़ा, तत्कालीन सीएमओ डॉ. चंद्रशेखर और प्रेमबहादुर सिंह को दोषी करार
यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले लक्ष्मी ट्रेडिंग के घनश्याम मिश्र के साथ वही हुआ जो आयुष कंस्ट्रक्शन के मनोज कुमार के साथ हुआ। यह फर्जीवाड़ा पिछले 2021 से चल रहा है। शिकायतें होती हैं, जांच होती है, जांच में गबन पाया जाता है, लेकिन जब कार्रवाई की बारी आती है तो लीपापोती हो जाती है।
भ्रष्टाचार की ‘प्रेम गाथा’: प्रेम बहादुर सिंह के कारनामों की पोल खोलती एक तथ्यात्मक रिपोर्ट
- दोषियों पर विधिक और प्रशासनिक कार्रवाई की संस्तुति के बावजूद फाइल रद्दी की टोकरी में डाली गई
- आयुष कांस्ट्रक्शन और अन्य फर्मों के नाम पर करोड़ों का फर्जीवाड़ा, कागजों में एक-एक कमरे की पांच-पांच बार मरम्मत दिखाई गई
- बिना पंजीकरण और बिना अनुबंध वाले अपात्रों को किया गया मालामाल, असली ठेकेदार हुए प्रताड़ित
- एक करोड़ से अधिक का बंदरबांट और लगभग 30 लाख की जीएसटी व आईटी चोरी का सनसनीखेज खुलासा
आदर्शों के विपरीत प्रशासनिक विडंबना
बस्ती के सीएमओ कार्यालय में तैनात प्रेम बहादुर सिंह के माता-पिता ने शायद कभी यह कल्पना नहीं की होगी कि उनका बेटा ईमानदारी के मार्ग पर चलने के बजाय भ्रष्टाचार के नए आयाम स्थापित करेगा। बिना घूस लिए काम न करने और शासकीय धन के दुरुपयोग का यह मामला आज जिले के प्रशासनिक तंत्र पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है।
क्या है पूरा मामला? – साक्ष्यों के साथ
खबर में प्रकाशित तथ्यों के अनुसार, यह कोई आरोप नहीं, बल्कि जांच में पकड़ा गया मामला है:
साक्ष्य 1: 49 लाख और 65 लाख का दोहरा गबन
पहले 49 लाख के फर्जी ऑर्डर और भुगतान करने का मामला पकड़ा गया। जिसके लिए तत्कालीन सीएमओ डॉ. चंद्रशेखर और प्रेम बहादुर सिंह को दोषी करार देते हुए विधिक और प्रशासनिक कार्रवाई की संस्तुति की गई थी। इसी मामले में 65 लाख के गबन का मामला सामने आया।
स्रोत: प्रकाशित जांच रिपोर्ट का हवाला
साक्ष्य 2: DM तक पहुंचा मामला, फिर सौदेबाजी
जब यह मामला तत्कालीन DM के पास कार्रवाई के लिए पहुंचा तो कार्रवाई करने के बजाय सौदा हो गया और जांच रिपोर्ट को रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया। हालांकि तत्कालीन सीएमओ डॉ. ए.आर. दुबे ने प्रेम बहादुर सिंह से स्पष्टीकरण भी मांगा था।
स्रोत: समाचार पत्र में उल्लिखित DM कार्यालय की कार्यवाही
साक्ष्य 3: 1 करोड़ 49 लाख का खेल – टेंडर किसी का, काम किसी और को
सबसे बड़ा सवाल: जब अनुबंध आयुष कंस्ट्रक्शन के मनोज कुमार के नाम सिविल कार्य का था तो कैसे और क्यों उस कार्य को कंडीशन के आधार पर दीवाकर कंस्ट्रक्शन, रोज इंटरप्राइजेज, एलाइड इंटरप्राइजेज जैसी अन्य फर्मों को 10-10 लाख के ऑर्डर के जरिए कार्य और भुगतान कर दिया गया? जबकि टेंडर आयुष कंस्ट्रक्शन के नाम था।
बताया जाता है, 1 करोड़ 49 लाख में से लाख-दो लाख का भी कार्य नहीं हुआ होगा। एक-एक कमरे को पांच-पांच बार मरम्मत और निर्माण दिखाया गया। यह फर्जीवाड़ा बेला अस्पताल, महिला अस्पताल, टीम्स एवं सीएमओ कार्यालय में किया गया।
साक्ष्य 4: बिना रजिस्ट्रेशन वाले ठेकेदारों को मालामाल
जिस ठेकेदार के नाम अनुबंध था, वह देखता रह गया और जिसके नाम अनुबंध नहीं था, उसे नर्जर आर्डर पर आर्डर दिए गए। जिन ठेकेदारों का पंजीकरण ही नहीं, हैसियत और चरित्र प्रमाण-पत्र नहीं, पंजीकरण तक नहीं, उसे मालामाल कर दिया और जिसके नाम अनुबंध है, उसे भिखारी बना दिया।
इस पूरे मामले में 1 करोड़ से अधिक का बंदरबांट हुआ, लगभग 30 लाख की जीएसटी और आईटी की चोरी की गई। इस चोरी को तत्कालीन सीएमओ और प्रेम बहादुर सिंह एवं ठेकेदारों ने मिलकर किया।
साक्ष्य 5: पैटर्न 2021 से जारी
यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले लक्ष्मी ट्रेडिंग के घनश्याम मिश्र के साथ वही हुआ जो आयुष कंस्ट्रक्शन के मनोज कुमार के साथ हुआ। यह फर्जीवाड़ा पिछले 2021 से चल रहा है। शिकायतें होती हैं, जांच होती है, जांच में गबन पाया जाता है, लेकिन जब कार्रवाई की बारी आती है तो लीपापोती हो जाती है। सीधा किसी छोटे-मोटे अधिकारी स्तर से नहीं बल्कि जिले के सबसे बड़े अधिकारी स्तर से होता है। इस पूरे मामले में वह ठेकेदार ठगा जाता है जिसके नाम अनुबंध होता है और जिसके नाम अनुबंध नहीं होता, उसे प्रेम बहादुर सिंह जैसे लोग अमीर बना देते हैं।
नतीजा क्या हुआ?
खबर के अनुसार, इस पूरे प्रकरण के बाद प्रेम बहादुर सिंह को जेल जाना पड़ा। जेल जाने से बचने के लिए ही सौदा हुआ। अकेले ठेकेदारी के हिस्से में 60 लाख से अधिक आया।
जब इतने बड़े घोटाले का पता तत्कालीन सीएमओ डॉ. चंद्रशेखर को चला तो वह बिना चार्ज दिए जिले से नजर हो गए। इसलिए कहा जाता है कि अगर DM की ओर से एफआईआर दर्ज करा दिया जाता तो तत्कालीन सीएमओ और प्रेम बहादुर सिंह आज…
बायो-मेडिकल वेस्ट (BMW) की चोरी करना, दिखावा करना सबसे बड़ा अपराध माना जाता है लेकिन सांठगांठ करने वाले अधिकारियों को जब चढ़ावा मिल जाता है तो उसे भी अनदेखी कर देते हैं। यही कारण है कि प्रेम बहादुर सिंह और फर्जी ठेकेदारों का मनोबल बढ़ता जा रहा है।
प्रमुख साक्ष्य एवं भ्रष्टाचार के खुलासे
- 49 लाख के फर्जी आर्डर और गबन का मामला: तत्कालीन सीएमओ डॉ. चंद्रशेखर और प्रेम बहादुर सिंह को इस मामले में दोषी करार देते हुए विधिक और प्रशासनिक कार्रवाई की संस्तुति की गई थी।
- कार्रवाई के नाम पर लीपापोती और फाइल गायब: जब 65 लाख के गबन का यह मामला डीएम के पास कार्रवाई के लिए पहुंचा, तो कार्रवाई करने के बजाय कथित तौर पर ‘सौदा’ हो गया और जांच रिपोर्ट को रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया। हालांकि, तत्कालीन सीएमओ डॉ. आर.एस. दुबे ने प्रेम बहादुर सिंह से स्पष्टीकरण भी मांगा था।
- फर्जीवाड़े का अनोखा खेल (टेंडर किसी का, काम कोई और करे):
- अनुबंध ‘आयुष कांस्ट्रक्शन’ (मनोज कुमार) के नाम पर सिविल कार्य का था, लेकिन कार्य को कोटेशन के आधार पर ‘रोज इंटरप्राइजेज’, ‘एलाइड इंटरप्राइजेज’ जैसे अन्य फर्मों को 10-10 लाख के आर्डर के जरिए दे दिया गया।
- एक करोड़ 49 लाख में से दो लाख का भी कार्य ज़मीन पर नहीं हुआ। एक-एक कमरे की पांच-पांच बार मरम्मत और निर्माण दिखाकर भारी फर्जीवाड़ा किया गया।
- यह फर्जीवाड़ा जिला अस्पताल, महिला अस्पताल, टीबी एवं सीएमओ कार्यालय में किया गया। जिस ठेकेदार के नाम अनुबंध था, वह देखता रह गया और जिसके नाम अनुबंध नहीं था, उसे फर्जी आर्डर पर आर्डर दे दिए गए।
- पात्र को भिखारी और अपात्र को मालामाल बनाना: जिस ठेकेदार का पंजीकरण नहीं था, जिसकी हैसियत और चरित्र प्रमाण-पत्र नहीं था, उसे मालामाल कर दिया गया; जबकि जिसके नाम अनुबंध था, उसे दर-दर भटकाया गया। मां लक्ष्मी ट्रेडिंग के घनश्याम मिश्र के साथ भी यही हुआ जो आयुष कांस्ट्रक्शन के मनोज कुमार के साथ हुआ था।
- एक करोड़ से अधिक का बंदरबांट और आईटी चोरी: इस पूरे प्रकरण में एक करोड़ से अधिक का बंदरबांट हुआ, लगभग 30 लाख के जीएसटी और आईटी (आईटी) की चोरी की गई, जिसे तत्कालीन सीएमओ और प्रेम बहादुर सिंह ने ठेकेदारों के साथ मिलकर अंजाम दिया।
- जांच और संरक्षण का चक्र: जब सियो नीता यादव ने आयुष कांस्ट्रक्शन की शिकायत पर जांच की तो एक करोड़ 49 लाख के फर्जी आर्डर और भुगतान का मामला पकड़ा गया। शिकायत होती, जांच होती, और जब कार्रवाई की बारी आती तो सौदा तय हो जाता। यह सौदा किसी छोटे-मोटे स्तर पर नहीं बल्कि जिले के सबसे बड़े अधिकारी स्तर से होता था।
जीएसटी की चोरी करना सबसे बड़ा अपराध माना जाता है, लेकिन जब सौदा करने वाले अधिकारियों को जब बढ़ावा (चढ़ावा) मिल जाता है, तो वे इसकी अनदेखी कर देते हैं। यदि समय रहते डीएम की ओर से एफआईआर दर्ज करवा दी जाती तो तत्कालीन सीएमओ डॉ. चंद्रशेखर को बिना चार्ज दिए जिले से फरार होने का मौका न मिलता। इसी संरक्षण और प्रशासनिक ढिलाई के कारण प्रेम बहादुर सिंह जैसे लोगों का मनोबल लगातार बढ़ता जा रहा है।
















