दलित महिला के उत्पीड़न पर गरमाया मामला: कप्तानगंज थाने के एसएचओ आलोक कुमार श्रीवास्तव और सिपाही पंकज सिंह पर लगे गंभीर आरोप, पीड़िता शकुन्तला देवी ने एसपी से लगाई न्याय की गुहार।
भले ही पुलिस अधीक्षक ने मामले में जांच कर कार्रवाई का निर्देश दिया हो, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या खाकी के इन लापरवाह और संवेदनहीन नुमाइंदों पर समय रहते शिकंजा कसा जाएगा, या फिर गरीबों की आह यूं ही फाइलों के नीचे दबकर रह जाएगी? कप्तानगंज थाने का यह कृत्य वर्दी के माथे पर एक ऐसा कलंक है, जिस पर त्वरित और कठोर प्रशासनिक कार्रवाई बेहद जरूरी है।
न्याय की आस में सिसकता कानून: कप्तानगंज थाने की कार्यशैली पर गंभीर सवाल
- न्याय की आस में खाकी की मनमानी: मारपीट और जातिसूचक गालियों का मुकदमा दर्ज करने के बजाए पुलिस ने उल्टा पीड़िता पर बनाया जबरन सुलह का दबाव।
- मानवता हुई शर्मसार: कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे पीड़ित पति संतोष कुमार और 2 साल के मासूम बच्चे को घंटों थाने के लॉकअप में रखने का सनसनीखेज मामला आया सामने।
- दलालों का अड्डा बनता थाना: कप्तानगंज थाने में बिना पैसे और दलालों के काम न होने का आरोप; पीड़िता ने थाने के सीसीटीवी फुटेज की उच्चस्तरीय जांच की मांग की।
- एसपी डॉ. यशवीर सिंह का सख्त रुख: मामले का संज्ञान लेते हुए पुलिस अधीक्षक ने निष्पक्ष जांच कर त्वरित कार्रवाई के दिए निर्देश।
बस्ती: जनपद के कप्तानगंज थाने में तैनात थाना प्रभारी आलोक कुमार श्रीवास्तव और हल्का सिपाही पंकज सिंह की कार्यशैली एक बार फिर खाकी को दागदार करती नजर आ रही है। एक तरफ शासन और पुलिस के उच्च अधिकारी जीरो टॉलरेंस और निष्पक्ष न्याय का दावा करते हैं, वहीं दूसरी तरफ कप्तानगंज थाने को दलालों का अड्डा बनाकर पीड़ितों का शोषण करने के गंभीर आरोप लग रहे हैं।
मामला सिर्फ लापरवाही का नहीं, बल्कि मानवता और कानून के सभी नियमों को ताक पर रखने का है।
क्या यही है ‘सबका साथ, सबका न्याय’?
ग्राम करचोलिया की रहने वाली दलित महिला शकुन्तला देवी, जो अपने परिवार के भरण-पोषण और हक की लड़ाई लड़ रही है, उसे न्याय के मंदिर कहे जाने वाले थाने से सिर्फ प्रताड़ना और अपमान मिला। आरोप है कि जमीन पर अवैध कब्जे और मारपीट की शिकायत लेकर जब पीड़िता थाने पहुंची, तो पुलिस ने दबंगों पर शिकंजा कसने के बजाय पीड़िता और उसके परिवार को ही दबाने का कुचक्र रच डाला।
हद तो तब पार हो गई जब थानाध्यक्ष ने न्याय देने के स्थान पर आरोपियों से कथित सांठगांठ कर पीड़िता पर जबरन सुलह का दबाव बनाया।
संवेदनहीनता की पराकाष्ठा: कैंसर पीड़ित पति और 2 साल के मासूम को लॉकअप में बंद करना
इस पूरे प्रकरण का सबसे वीभत्स और झकझोर देने वाला पहलू पुलिस की अमानवीयता है। शकुन्तला देवी के पति संतोष कुमार गंभीर रूप से कैंसर की बीमारी से जूझ रहे हैं। इसके बावजूद, पुलिस ने उन्हें और उनके दो साल के मासूम बच्चे को घंटों थाने के लॉकअप में बंद रखा।
- पीड़िता गिड़गिड़ाती रही कि उसके पति को समय पर कैंसर की दवा और इलाज की जरूरत है, लेकिन खाकी के नुमाइंदों का दिल नहीं पसीजा।
- उल्टे, गंभीर बीमारी से लड़ रहे पीड़ित पति को ही डराया-धमकाया गया और उसी दिन धारा 151 के तहत उनका चालान कर दिया गया।
- दलित समाज से आने वाली इस महिला के साथ हुए इस व्यवहार ने यह साबित कर दिया है कि थाने में अब न्याय पैसों और रसूख के तराजू पर तौला जाता है।
भ्रष्टाचार और मनमानी के गंभीर आरोप
सूत्रों और स्थानीय चर्चाओं के अनुसार, कप्तानगंज थाने में बिना दलालों के कोई पत्ता भी नहीं हिलता। थानाध्यक्ष पिछले एक साल से अधिक समय से इस थाने पर जमे हुए हैं, जिसके चलते उनका दुस्साहस सातवें आसमान पर है। आरोप है कि पैसे लेकर मुकदमों को तुरंत दर्ज किया जाता है और गरीबों की शिकायतों को या तो कचरे के डिब्बे में डाल दिया जाता है या जांच के नाम पर लीपापोती कर दी जाती है।
यदि इस पूरे मामले की सच्चाई बाहर लानी है, तो थाने में लगे सीसीटीवी फुटेज की निष्पक्ष जांच अनिवार्य है। फुटेज सामने आते ही स्पष्ट हो जाएगा कि किस प्रकार एक कैंसर मरीज और उसके मासूम बच्चे को थाने में प्रताड़ित किया गया।
पुलिस अधीक्षक से न्याय की उम्मीद
पीड़ित दलित महिला शकुन्तला देवी ने अब पुलिस अधीक्षक डॉ. यशवीर सिंह से गुहार लगाई है और पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कर दोषी थानाध्यक्ष आलोक कुमार श्रीवास्तव तथा सिपाही पंकज सिंह के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई की मांग की है।
भले ही पुलिस अधीक्षक ने मामले में जांच कर कार्रवाई का निर्देश दिया हो, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या खाकी के इन लापरवाह और संवेदनहीन नुमाइंदों पर समय रहते शिकंजा कसा जाएगा, या फिर गरीबों की आह यूं ही फाइलों के नीचे दबकर रह जाएगी? कप्तानगंज थाने का यह कृत्य वर्दी के माथे पर एक ऐसा कलंक है, जिस पर त्वरित और कठोर प्रशासनिक कार्रवाई बेहद जरूरी है।
















