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पहले पत्रकारों को संवैधानिक अधिकार तो दिलवा दो,फिर पत्रकार सुरक्षा कानून मांगना

27 Aug 2026, 08:42 PM • Vande Bharat Live TV News
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*पहले पत्रकारों को संवैधानिक अधिकार तो दिलवा दो, फिर पत्रकार सुरक्षा कानून मांगना?*

 

संपादकीय- राजेन्द्र सिंह जादौन

 

देश में पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर अचानक बड़ी चिंता पैदा हो गई है। पत्रकार संगठन सक्रिय हैं, बैठकें हो रही हैं, ज्ञापन दिए जा रहे हैं, मंच सज रहे हैं और पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग जोर पकड़ रही है। मांग जायज है, पत्रकारों की सुरक्षा जरूरी है, पत्रकारों पर हमले गंभीर विषय हैं और पत्रकारिता करने वाले व्यक्ति को केवल इसलिए निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए क्योंकि उसने सत्ता, व्यवस्था या किसी प्रभावशाली व्यक्ति से सवाल पूछ दिया। लेकिन सवाल थोड़ा उल्टा है जिन्हें यह तक स्पष्ट नहीं कि संविधान में पत्रकार को अलग से “चौथा स्तंभ” का संवैधानिक दर्जा मिला ही नहीं है, वे पत्रकार सुरक्षा कानून की लड़ाई आखिर किस संवैधानिक जमीन पर लड़ रहे हैं?

 

लोकतंत्र में प्रेस को चौथा स्तंभ कहा जाता है। यह उसकी लोकतांत्रिक भूमिका का सम्मान है, संवैधानिक पदवी नहीं। संविधान में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बाद पत्रकारिता को चौथे स्तंभ के रूप में कोई अलग संवैधानिक अध्याय नहीं मिला है। पत्रकार की स्वतंत्रता का मूल आधार संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) है, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। यानी पत्रकार को कोई जादुई संवैधानिक कवच नहीं मिला हुआ है कि प्रेस कार्ड दिखाते ही कानून की सारी धाराएं उसके सामने नतमस्तक हो जाएं। यही बात कुछ पत्रकार संगठनों को पहले समझनी चाहिए।

 

आज हालत यह है कि पत्रकारों के नाम पर संगठन तो दर्जनों हैं, लेकिन पत्रकारों के संवैधानिक अधिकारों को लेकर गंभीर अध्ययन कितनों ने किया है, यह बड़ा सवाल है। पत्रकार सुरक्षा कानून मांगने से पहले यह तो बताया जाए कि पत्रकार के मौलिक अधिकार क्या हैं? पत्रकार की स्वतंत्रता की संवैधानिक सीमा क्या है? सरकार के सामने पत्रकार का अधिकार क्या है? पुलिस, प्रशासन और न्यायपालिका के सामने पत्रकार की कानूनी स्थिति क्या है? पत्रकार और मीडिया संस्थान के अधिकारों में अंतर क्या है? डिजिटल पत्रकार कौन है? स्वतंत्र पत्रकार कौन है? स्ट्रिंगर कौन है? कैमरा जर्नलिस्ट कौन है? क्या हर प्रेस कार्डधारी पत्रकार है और क्या बिना प्रेस कार्ड वाला व्यक्ति पत्रकार नहीं है?

 

इन सवालों के जवाब के बिना पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग कहीं-कहीं ऐसी लगती है जैसे घर की नींव देखे बिना छत पर पानी की टंकी रखने की तैयारी।

 

पत्रकार सुरक्षा कानून होना चाहिए या नहीं, इस पर बहस हो सकती है। होना चाहिए तो किस स्वरूप में होना चाहिए, इस पर भी बहस होनी चाहिए। पत्रकार पर हमला करने वाले के खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए, इसमें कोई दो राय नहीं। पत्रकार को धमकी देने, उसकी रिपोर्टिंग रोकने, उपकरण छीनने, झूठे मुकदमों में फंसाने या उसे पेशेवर काम से रोकने की कोशिशों के खिलाफ प्रभावी कानूनी सुरक्षा होनी चाहिए। लेकिन कानून बनाने से पहले पत्रकारिता की वास्तविकता को समझना भी जरूरी है।

 

आज पत्रकारिता का सबसे बड़ा संकट केवल हमला नहीं है। उससे बड़ा संकट पत्रकार की पहचान और उसकी स्वतंत्रता का है। कितने पत्रकार संस्थानों में बिना नियुक्ति पत्र काम कर रहे हैं? कितनों को महीनों वेतन नहीं मिलता? कितने पत्रकार विज्ञापन और प्रबंधन के दबाव में काम करते हैं? कितने पत्रकारों को खबर के बदले विज्ञापन जुटाने की जिम्मेदारी दी जाती है? कितनों के पास सामाजिक सुरक्षा नहीं है? कितने पत्रकारों को किसी घटना की रिपोर्टिंग करने भेज दिया जाता है लेकिन दुर्घटना या मृत्यु की स्थिति में परिवार के लिए संस्था के पास कोई व्यवस्था नहीं होती? क्या पत्रकार सुरक्षा कानून में इन सवालों का जवाब होगा?

 

या फिर कानून बन जाएगा, प्रेस कार्ड जारी होगा, संगठन का बैनर लगेगा और पत्रकार फिर वही रहेगा नौकरी की चिंता में दबा हुआ, विज्ञापन के दबाव में झुका हुआ और सत्ता के सामने सवाल पूछने से पहले दस बार सोचने वाला?

 

आज पत्रकार संगठनों को सबसे पहले पत्रकारों को उनके संवैधानिक अधिकारों की शिक्षा देनी चाहिए। केवल सम्मेलन कराकर मंच से “पत्रकार चौथा स्तंभ है” बोल देने से कोई संवैधानिक अधिकार पैदा नहीं होता। संविधान भाषण से नहीं चलता, उसकी धाराएं पढ़नी पड़ती हैं, न्यायालयों के फैसले समझने पड़ते हैं और अधिकारों के लिए कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ती है।

 

अगर पत्रकार वास्तव में लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है तो उसे सबसे पहले अपने अधिकारों की नींव मजबूत करनी होगी। उसे यह समझना होगा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कोई सरकारी कृपा नहीं है। सत्ता बदलने के साथ पत्रकार का अधिकार बदल नहीं सकता। सरकार पसंद करे तो खबर स्वतंत्र और सरकार नाराज हो तो वही खबर अपराध यह लोकतंत्र की स्वस्थ तस्वीर नहीं हो सकती।

 

लेकिन पत्रकारिता के नाम पर किसी को कानून से ऊपर रखने की मांग भी लोकतंत्र के हित में नहीं हो सकती। पत्रकार को भी कानून का पालन करना है। उसे तथ्य और अफवाह के बीच फर्क करना है। आरोप और प्रमाण के बीच फर्क करना है। खबर और प्रचार के बीच अंतर समझना है। पत्रकारिता की स्वतंत्रता के साथ उसकी जिम्मेदारी भी जुड़ी है।

 

इसलिए पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग से पहले पत्रकार सुरक्षा की बुनियादी अवधारणा स्पष्ट होनी चाहिए। सुरक्षा केवल पुलिस सुरक्षा नहीं है। सुरक्षा का अर्थ है स्वतंत्र रूप से काम करने का वातावरण, खबर प्रकाशित करने की आजादी, प्रतिशोध से बचाव, कानूनी सहायता, संस्थागत सुरक्षा, आर्थिक शोषण से संरक्षण और पत्रकार के परिवार के लिए संकट की स्थिति में सामाजिक सुरक्षा। और सबसे महत्वपूर्ण पत्रकार संगठन खुद कितने स्वतंत्र हैं?

 

जो संगठन पत्रकारों की सुरक्षा की बात करते हैं, उन्हें यह भी बताना चाहिए कि वे पत्रकारों के हित में कितनी बार सरकार से टकराए हैं। कितनी बार उन्होंने विज्ञापन नीति पर सवाल उठाया? कितनी बार पत्रकारों के वेतन और रोजगार की बात की? कितनी बार फर्जी पत्रकारों के खिलाफ आवाज उठाई? कितनी बार पत्रकारों को धमकाने वाले राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव के खिलाफ खड़े हुए? कितनी बार उन्होंने अपने ही संगठन में लोकतांत्रिक व्यवस्था लागू की?

 

कहीं ऐसा तो नहीं कि पत्रकार सुरक्षा कानून भी एक और ऐसा नारा बन जाए जिसे मंच पर जोर से बोला जाए और मंच से नीचे उतरते ही सब भूल जाएं?

 

पत्रकारों को सुरक्षा चाहिए, लेकिन उससे पहले पत्रकारों को अपने अधिकारों की समझ चाहिए। पत्रकारों को कानून चाहिए, लेकिन उससे पहले कानून की समझ चाहिए। पत्रकारों को संगठन चाहिए, लेकिन उससे पहले संगठन की नीयत और स्वतंत्रता चाहिए।

 

क्योंकि पत्रकारिता केवल “चौथा स्तंभ” लिख देने से चौथा स्तंभ नहीं बनती। चौथा स्तंभ बनने के लिए लोकतंत्र के बाकी तीनों स्तंभों के सामने खड़े होकर सवाल पूछने का साहस चाहिए।

 

इसलिए पत्रकार संगठनों से मेरी सीधी अपील नहीं, सीधा सवाल है पहले पत्रकारों को उनके संवैधानिक अधिकारों का पाठ पढ़ाओ, उनके मौलिक अधिकारों की लड़ाई लड़ो, पत्रकारिता की स्वतंत्रता की मजबूत कानूनी जमीन तैयार करो, फिर पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग करो।

 

वरना कल इतिहास यही पूछेगा कि जिन पत्रकार संगठनों को यह भी ठीक से मालूम नहीं था कि “चौथा स्तंभ” संवैधानिक पद नहीं बल्कि लोकतांत्रिक अवधारणा है, वे पत्रकारों के लिए कौन-सा नया संविधान लिखने निकले थे?

 

पत्रकार को केवल सुरक्षा नहीं चाहिए, उसे स्वतंत्रता चाहिए। और स्वतंत्रता केवल कानून मांगने से नहीं मिलतीउसे समझIMG 20260827 WA0039ना, बचाना और उसके लिए लड़ना पड़ता है।

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