अजीत मिश्रा (खोजी)
विशेष रिपोर्ट: बस्ती में ‘खाकी’ की ढाल तले ‘खाक’ होती जवानी; कप्तान के आदेश भी नशा माफिया के आगे बेअसर
ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश)
- खाकी की ‘छाया’ में खाक हो रही जवानी: चिलमा बाजार बना नशे का कैपिटल, व्हाट्सएप पर ऑर्डर और UPI से पेमेंट!
- कप्तान सख्त, थानेदार पस्त: आखिर क्यों नशा माफिया वीरू सिंह पर हाथ डालने से कतरा रही दुबौलिया पुलिस?
- सिस्टम फेल या माफिया से मेल? कप्तान के संज्ञान के बाद भी चिलमा बाजार में जारी है मौत की पुड़िया का खेल!
- डिजिटल हुआ मौत का सौदागर: बेरोजगारों और महिलाओं को ‘मोहरा’ बना माफिया वीरू सिंह उजाड़ रहा चिलमा के घर!
- बस्ती का ‘नशा माफिया’ वीरू: बेबस जिंदगियों की बलि और वसूलीबाज सिपाहियों की सरपरस्ती, कब जागेगा प्रशासन?
बस्ती। उत्तर प्रदेश में जहाँ एक तरफ योगी सरकार अपराधियों और माफियाओं के आर्थिक साम्राज्य को नेस्तनाबूद करने का दावा कर रही है, वहीं जनपद का दुबौलिया थाना क्षेत्र इन दावों की धज्जियां उड़ा रहा है। यहाँ ‘अपराध मुक्त प्रदेश’ का नारा नशा माफिया की ऊंची पहुँच और पुलिस की ‘वसूली’ के आगे दम तोड़ता नजर आ रहा है। आलम यह है कि खुद जिले के पुलिस कप्तान (SP) द्वारा मामले का संज्ञान लेने के बावजूद, दुबौलिया थानेदार नशा माफिया वीरू सिंह पर हाथ डालने में पूरी तरह विफल रहे हैं।नशा माफिया वीरू सिंह के खिलाफ जिला पुलिस कप्तान (SP) के सख्त रुख और मामले को संज्ञान में लेने के बावजूद, दुबौलिया थानेदार और उनकी टीम की निष्क्रियता ने विभाग की साख पर बट्टा लगा दिया है। सवाल यह है कि जब जिले का सर्वोच्च पुलिस अधिकारी सख्त कार्रवाई का निर्देश दे चुका है, तो आखिर ऐसी कौन सी अदृश्य शक्ति है जो चिलमा बाजार के ‘मौत के सौदागर’ को सुरक्षा कवच प्रदान कर रही है?
कैबिनेट और कप्तान के आदेशों को ठेंगा
उत्तर प्रदेश सरकार जहाँ ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति के तहत अपराधियों के आर्थिक साम्राज्य को ध्वस्त करने का दावा कर रही है, वहीं दुबौलिया थाने में यह दावे हवा-हवाई साबित हो रहे हैं। कप्तान के निर्देश के हफ्तों बीत जाने के बाद भी वीरू सिंह का हाईटेक नेटवर्क (WhatsApp/UPI) पहले की तरह ही सक्रिय है।
- चुप्पी का राज: सूत्रों की मानें तो थाने के कुछ ‘खास’ कारिंदे अब भी माफिया के संपर्क में हैं, जो छापेमारी की सूचना पहले ही लीक कर देते हैं।
- दिखावे की गश्त: चिलमा बाजार में पुलिस की जीप सायरन बजाते हुए निकल तो जाती है, लेकिन गांजे की उन गुमटियों पर आंच तक नहीं आती जहाँ से जवानी खाक हो रही है।
माफिया का बढ़ता हौसला: “पुलिस हमारी जेब में”
स्थानीय लोगों के अनुसार, कार्रवाई न होने से वीरू सिंह के हौसले इतने बुलंद हैं कि अब उसके गुर्गे खुलेआम शिकायतकर्ताओं को धमका रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि थानेदार की ढुलमुल कार्यप्रणाली ने माफिया को यह संदेश दे दिया है कि “ऊपर चाहे जो हो, नीचे सब मैनेज है।”
“जब कप्तान साहब ने संज्ञान लिया था, तो हमें लगा था कि अब चिलमा बाजार साफ हो जाएगा। लेकिन यहाँ तो थानेदार साहब ने माफिया को मानो अभयदान दे रखा है।”— एक पीड़ित ग्रामीण (नाम गोपनीय)
1. चिलमा बाजार: बस्ती का नया ‘नशा कैपिटल’
दुबौलिया का चिलमा बाजार अब किसी पहचान का मोहताज नहीं रहा। यह इलाका अब व्यापार के लिए नहीं, बल्कि नशे के सबसे बड़े केंद्र के रूप में कुख्यात हो चुका है। नशा माफिया वीरू सिंह ने यहाँ अपनी ऐसी समानांतर सत्ता स्थापित कर ली है, जहाँ कानून की नहीं, बल्कि ‘पुड़िया’ की चलती है।
2. कॉर्पोरेट स्टाइल में ‘मौत का सौदा’: WhatsApp और UPI
पुराने जमाने के छिपकर होने वाले नशा कारोबार को वीरू सिंह ने ‘डिजिटल’ और ‘हाईटेक’ बना दिया है। इस नेटवर्क की कार्यप्रणाली चौंकाने वाली है:
- डिजिटल बुकिंग: गांजे और अन्य नशीले पदार्थों के ऑर्डर सीधे व्हाट्सएप के जरिए बुक किए जाते हैं।
- कैशलेस ट्रांजेक्शन: पुलिस की रेड और नोटों के झंझट से बचने के लिए धड़ल्ले से UPI (PhonePe/Google Pay) का इस्तेमाल किया जा रहा है।
- सुरक्षित ठिकाने: सब्जी की दुकानों, पान की गुमटियों और किराना स्टोर्स को ‘सेफ हाउस’ बनाया गया है, जहाँ से नशे की होम डिलीवरी की जा रही है।
3. बेबस लोगों को बनाया ‘मोहरा’
वीरू सिंह खुद पर्दे के पीछे रहकर एक ऐसी फौज चला रहा है जिस पर कानूनी कार्रवाई पेचीदा हो जाए। उसने ₹200 से ₹500 की दिहाड़ी पर:
- बेरोजगार युवाओं,
- मजबूर महिलाओं,
- और यहाँ तक कि दिव्यांगों को गांजा बेचने के काम में लगा रखा है।
माफिया की तिजोरियां भर रही हैं, लेकिन इलाके के गरीब परिवार पूरी तरह तबाह हो रहे हैं।
4. कप्तान के आदेश को ठेंगा: आखिर थानेदार क्यों हैं मेहरबान?
सबसे बड़ा सवाल दुबौलिया पुलिस की कार्यशैली पर है। जब यह मामला जनपद के पुलिस कप्तान (SP) के संज्ञान में आया, तो उम्मीद जगी थी कि माफिया का अंत होगा। लेकिन कप्तान के कड़े रुख के बावजूद धरातल पर स्थिति जस की तस बनी हुई है।
सूत्रों का बड़ा दावा: आरोप है कि चिलमा बाजार के इस काले कारोबार से पुलिस के कुछ ‘वसूलीबाज’ सिपाहियों और थाने के कारिंदों की मासिक आय (मंथली) बंधी हुई है। यही कारण है कि जब भी ऊपर से कार्रवाई का दबाव बनता है, माफिया को पहले ही इसकी भनक लग जाती है।
5. विनाश की कगार पर भविष्य
नशे के इस मकड़जाल ने चिलमा बाजार और आसपास के गांवों की पूरी पीढ़ी को अपनी चपेट में ले लिया है। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि शिकायत करने पर पुलिस माफिया के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय शिकायतकर्ता को ही प्रताड़ित करती है या माफिया के गुर्गों द्वारा उसे धमकी दिलवाई जाती है।
दुबौलिया थानेदार की विफलताओं का कच्चा चिट्ठा
- डिजिटल ट्रेल की अनदेखी: UPI ट्रांजेक्शन और व्हाट्सएप कॉल डिटेल्स के जरिए नशा माफिया को पकड़ना सबसे आसान है, लेकिन पुलिस ने अभी तक इस दिशा में कोई तकनीकी जांच शुरू नहीं की।
- नेटवर्क का विस्तार: पुलिस की सुस्ती का फायदा उठाकर माफिया ने अब आसपास के गांवों में भी नए ‘कैरियर’ (बेरोजगार युवक और महिलाएं) भर्ती कर लिए हैं।
- जवाबदेही का अभाव: क्या कप्तान के आदेशों की अवहेलना करने पर दुबौलिया थानेदार पर कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी?
जवाबदेही तय होना जरूरी
“क्या दुबौलिया थानेदार को चिलमा बाजार में खुलेआम बिक रहे जहर की गंध नहीं आती? या फिर जानबूझकर धृतराष्ट्र की भूमिका निभाई जा रही है?” यह सवाल अब पूरे जनपद में गूंज रहा है।
निष्कर्ष: नशा माफिया वीरू सिंह का बेखौफ घूमना न केवल पुलिस की विफलता है, बल्कि शासन के इकबाल को खुली चुनौती है। यदि तत्काल प्रभाव से इस सिंडिकेट को ध्वस्त नहीं किया गया और संरक्षण देने वाले पुलिसकर्मियों पर गाज नहीं गिरी, तो वह दिन दूर नहीं जब दुबौलिया का हर घर कब्रिस्तान और जेल की दहलीज पर खड़ा होगा। चिलमा बाजार में नशे की गिरफ्त में जा चुके युवाओं के परिजन अब इंसाफ की उम्मीद छोड़ रहे हैं। अगर समय रहते वीरू सिंह के सिंडिकेट को ध्वस्त नहीं किया गया और ‘वसूलीबाज’ सिपाहियों पर गाज नहीं गिरी, तो बस्ती का यह इलाका अपराध का ऐसा गढ़ बन जाएगा जिसे संभालना मुश्किल होगा।
अब जनता की नजरें सीधे पुलिस महानिरीक्षक (IG) और पुलिस कप्तान पर टिकी हैं—क्या वे अपने ही मातहतों की लापरवाही और माफिया के इस गठजोड़ को तोड़ पाएंगे?
ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल
सच्चाई की खोज, निष्पक्ष आवज।
अब देखना यह है कि क्या पुलिस के उच्चाधिकारी अपने मातहतों की इस ‘सुस्ती’ और माफिया के ‘गठजोड़’ पर कोई कड़ा प्रहार करते हैं, या चिलमा बाजार में जवानी यूँ ही खाक होती रहेगी।







