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बस्ती में ‘इलाज’ नहीं ‘कत्ल’: निजी अस्पताल ने महिला को लगाया मौत का इंजेक्शन, तड़पते देख बाइक पर लादकर भगाया

मासूमों की चीख से दहला मुंडेरवा: अस्पताल की लापरवाही ने छीनी मां, खुजली मिटाने गई रोशनी की बुझ गई जिंदगी

अजीत मिश्रा (खोजी)

बस्ती: इलाज के नाम पर ‘मौत’ का इंजेक्शन! निजी अस्पताल की संवेदनहीनता ने उजाड़ा हंसता-खेलता परिवार

ब्यूरो, बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश)

  • खाकी के साये में ‘डेथ सेंटर’: इंजेक्शन लगते ही निकला मुंह से झाग, स्टाफ फरार; क्या बस्ती का स्वास्थ्य विभाग सो रहा है?
  • निजी अस्पताल की क्रूरता: एम्बुलेंस तक नहीं दी, रास्ते में तोड़ा दम; परिजनों का भारी हंगामा, पुलिस तैनात
  • सफेद कोट वाले ‘यमदूतों’ का कहर: इलाज के नाम पर उजाड़ा परिवार, मौत के बाद अस्पताल पर ताला लगा भागे कर्मचारी

बस्ती। जनपद में स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर मौत का व्यापार धड़ल्ले से जारी है। ताजा मामला मुंडेरवा थाना क्षेत्र का है, जहां खुजली जैसी सामान्य बीमारी का इलाज कराने गई एक 27 वर्षीय युवती को ‘लापरवाही के इंजेक्शन’ ने हमेशा के लिए खामोश कर दिया। मानवता को शर्मसार करने वाली बात यह है कि हालत बिगड़ने पर अस्पताल ने एम्बुलेंस तक मुहैया नहीं कराई और तड़पती महिला को जबरन बाइक पर लादकर विदा कर दिया।

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खुजली का इलाज या जिंदगी से खिलवाड़?

लोहदर गांव निवासी अनिल चौधरी की पत्नी रोशनी (27) को क्या पता था कि जिस अस्पताल में वह राहत की उम्मीद लेकर जा रही हैं, वही उसकी अंतिम यात्रा का पड़ाव बन जाएगा। परिजनों का सीधा आरोप है कि बस्ती-कांटे मार्ग पर स्थित निजी अस्पताल के अनट्रेंड कर्मचारियों ने रोशनी को एक के बाद एक कई इंजेक्शन ठोक दिए। परिणाम? शरीर की खुजली तो शांत नहीं हुई, लेकिन कुछ ही मिनटों में रोशनी के मुंह से झाग निकलने लगा और सांसें उखड़ने लगीं।

अस्पताल बना ‘बूचड़खाना’, तड़पती महिला को बाइक पर भेजा

जब खेल बिगड़ता दिखा, तो अस्पताल के तथाकथित ‘मसीहा’ अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते नजर आए। आरोप है कि महिला की हालत नाजुक होने के बावजूद अस्पताल प्रबंधन ने एम्बुलेंस देने की जहमत नहीं उठाई। तड़पती रोशनी को जबरन मोटरसाइकिल पर बस्ती ले जाने को कहा गया। ओड़वारा पहुंचते-पहुंचते रोशनी की मौत हो गई। यह महज एक मौत नहीं, बल्कि स्वास्थ्य तंत्र की सरेआम हत्या है।

“अस्पताल की लापरवाही ने दो मासूमों के सिर से मां का साया छीन लिया। 5 साल की राधा और 2 साल का हर्ष अब कभी अपनी मां की गोदी में नहीं खेल पाएंगे। क्या इन मासूमों के आंसुओं का हिसाब ये ‘लुटेरे’ अस्पताल दे पाएंगे?”

फरार कर्मचारी और पुलिसिया कार्रवाई

शुक्रवार सुबह जब ग्रामीणों का गुस्सा फूटा और अस्पताल का घेराव हुआ, तो सफेद कोट पहने ‘यमदूत’ मौके से भाग खड़े हुए। हालांकि, पुलिस ने एक कर्मचारी को हिरासत में लिया है, लेकिन सवाल वही है— क्या एक छोटे कर्मचारी की गिरफ्तारी से इंसाफ मिल जाएगा?

बड़ा सवाल: क्या यह अस्पताल मानकों पर खरा था?

  • प्रशासनिक ढील: स्वास्थ्य विभाग की नाक के नीचे ऐसे ‘डेथ सेंटर’ कैसे फल-फूल रहे हैं?
  • कार्रवाई का इंतजार: क्या सीएमओ बस्ती इस अवैध क्लिनिक पर बुलडोजर चलवाएंगे या मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?

निष्कर्ष:

बस्ती में निजी अस्पतालों की मनमानी और बिना डिग्री वाले झोलाछाप कर्मचारियों का आतंक चरम पर है। अगर समय रहते स्वास्थ्य विभाग ने इन ‘वधशालाओं’ पर लगाम नहीं कसी, तो रोशनी जैसी न जाने कितनी और बेटियां सिस्टम की भेंट चढ़ती रहेंगी। पुलिस बल की तैनाती केवल शांति व्यवस्था के लिए नहीं, बल्कि दोषियों को सलाखों के पीछे भेजने के लिए होनी चाहिए।

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