राजनीति का नया व्याकरण: पसीना बहाने वाले ‘वर्कर’, मलाई खाने वाले ‘पैराशूट’
कुर्सी की दौड़ और कार्यकर्ताओं का 'त्याग': राजनीति का कड़वा सच राजनीति: विचारधारा का युग बीत गया, अब 'नेटवर्किंग' का दौर है
अजीत मिश्रा (खोजी)
राजनीति का बदलता व्याकरण: पसीना बनाम पैराशूट
- संगठन की नींव और पैराशूट की उड़ान: राजनीति में योग्यता का संकट
- ‘वजह’ बनाम ‘अवसर’: क्या बदल गई है राजनीति की परिभाषा?
- जमीन से जुड़ाव या दिखावे का शोर: राजनीति का अस्तित्व किसमें है?
भारतीय राजनीति इन दिनों एक गहरे संक्रमण काल से गुजर रही है। दशकों से जिस राजनीति को ‘सेवा और संघर्ष’ का माध्यम माना जाता था, वह अब ‘नेटवर्किंग और प्रबंधन’ के चश्मे से देखी जा रही है। राजनीति में सक्रिय दो वर्गों के बीच की खाई—जमीन पर पसीना बहाने वाला कार्यकर्ता और एसी कमरों में रणनीति बनाने वाला ‘रणनीतिकार’—आज पहले से कहीं अधिक चौड़ी और कड़वी हो गई है।
पसीना बहाने वाला ‘बुनियादी ढांचा’
राजनीति की असली इबारत उन लोगों ने लिखी है जो धूप, सर्दी और बरसात की परवाह किए बिना जमीन पर खड़े रहे हैं। पोस्टर चिपकाना, झंडा ढोना और नारे लगाना केवल शारीरिक मेहनत नहीं, बल्कि किसी विचारधारा के प्रति उनके समर्पण की अभिव्यक्ति है। ये वे लोग हैं जिन्होंने संगठन को अपनी जवानी और ऊर्जा दी है। ये राजनीति की वे ‘ईंटें’ हैं जो नींव में दबकर भी इमारत को मजबूती प्रदान करती हैं।
पैराशूट संस्कृति और अवसरवाद
दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि जैसे ही फसल काटने का समय आता है, ‘पैराशूट’ उतरने लगते हैं। ऐसे लोग जो चुनाव से पहले तक राजनीतिक शब्दावली से भी अपरिचित होते हैं, वे रातों-रात पदों और टिकटों पर काबिज हो जाते हैं। यह स्थिति न केवल निष्ठावान कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ती है, बल्कि राजनीति में ‘चापलूसी’ को एक योग्यता के रूप में स्थापित करती है। जब पार्टी के प्रति समर्पित व्यक्ति को ‘त्याग’ की घुट्टी पिलाकर शांत रखा जाता है, तो अंततः उस पार्टी की वैचारिक जड़ें खोखली होने लगती हैं।
सेल्फी और दिखावे की राजनीति
आज की राजनीति का एक बड़ा हिस्सा ‘कैमरा एंगल’ पर टिका है। टीवी डिबेट्स में बूथ मैनेजमेंट का पाठ पढ़ाने वाले बहुत से लोग ऐसे होते हैं जिन्होंने कभी जमीन पर एक पर्चा तक नहीं बांटा होता। राजनीति अब विचारधारा का मंच न रहकर एक ‘नेटवर्किंग ऐप’ में तब्दील होती जा रही है, जहाँ संघर्ष के इतिहास से अधिक संपर्क (Contacts) की कॉल हिस्ट्री मायने रखती है। ऐसे लोग राजनीति में किसी ‘मिशन’ के लिए नहीं, बल्कि अपनी मौजूदगी दर्ज कराने और चमक-धमक वाली तस्वीरों के लिए आते हैं।
कुर्सी बनाम विश्वास
राजनीति का सबसे बड़ा व्यंग्य यही है कि ‘वजह’ वाले लोगों को हाशिए पर धकेल दिया गया है और ‘अवसर’ वाले लोग मलाई काट रहे हैं। लेकिन इतिहास गवाह है कि किसी भी पार्टी या आंदोलन का असली आधार वही लोग रहे हैं जो बिना किसी पद की लालसा के खड़े रहे। जो लोग राजनीति में शादी के बारातियों की तरह आते हैं—जिनका न तो कोई रिश्ता होता है और न ही कोई जिम्मेदारी, सिर्फ थाली पर नजर होती है—वे कभी भी जन-आंदोलन खड़ा नहीं कर सकते।
निष्कर्ष
राजनीति में भीड़ तो बहुत है, लेकिन ‘वजह’ वाले लोगों की कमी आज भी खलती है। जिस दिन पार्टियाँ ‘पसीना’ बहाने वाले और ‘पैराशूट’ से उतरने वालों के बीच का अंतर भूल जाएंगी, उस दिन वे जनता से अपना संपर्क खो देंगी। राजनीति में कुर्सी से बड़ी चीज ‘विश्वास’ है और जमीन से जुड़ाव ही वह एकमात्र सूत्र है जो किसी नेता को भीड़ से अलग करता है।
राजनीति को वापस उस ‘संघर्ष’ की ओर लौटना होगा, जहाँ योग्यता का पैमाना ‘संपर्क’ नहीं, बल्कि ‘समर्पण’ हो। वरना, यह राजनीति केवल फोटो फ्रेम और स्क्रीनशॉट की दुनिया बनकर रह जाएगी।








