बस्ती के स्वास्थ्य विभाग में मची खुली लूट: ‘प्रमोद’ बाबू और सिंडिकेट का साम्राज्य, हजार-दो हजार नहीं, लाखों की अवैध वसूली
"साहब, पहले लगा मदद कर रहे हैं। बाद में पता चला कि मदद के नाम पर सौदा कर रहे हैं। बोले - अरे ये काम हजार में नहीं होगा, इसमें तो लाख लगेगा, तभी होगा।"
अजीत मिश्रा (खोजी)
भ्रष्टाचार का नया सिंडिकेट – छोटे घूस को तो देखते भी नहीं, रेट लिस्ट लाखों में | पीड़ितों ने खोली पोल, प्रशासन की चुप्पी पर सवाल
- बस्ती सीएमओ कार्यालय में भ्रष्टाचार और लूटपाट का साम्राज्य
- सांसद-विधायक के नाम का धौंस दिखाकर फाइलों और तबादलों में खेल
- सीएमओ आवास को बनाया गोदाम: जरूरत से ज्यादा और फर्जी खरीद का खेल बेनकाब
- शिकायतों के बावजूद कौन दे रहा है भ्रष्ट बाबुओं को संरक्षण?
बस्ती, 2 अगस्त। जनपद में इन दिनों एक ही नाम की सबसे ज्यादा चर्चा है – प्रमोद कुमार मिश्र। चर्चा विकास की नहीं, वसूली की है। आरोपों के मुताबिक बस्ती में इनका एक ऐसा सिस्टम चल रहा है जहाँ हजार-पांच सौ की बात करना बेइज्जती समझी जाती है। यहाँ सीधा हिसाब है – लाख दो, तो लाख का काम पकड़ो।जिले के स्वास्थ्य विभाग में इन दिनों भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अराजकता का एक ऐसा अध्याय लिखा जा रहा है, जो हर जिम्मेदार नागरिक को झकझोर देने के लिए काफी है। गोरखपुर से बस्ती सीएमओ कार्यालय में स्थानांतरित होकर आए प्रमोद कुमार मिश्र और उनके सिंडिकेट पर विभागीय व्यवस्था को बंधक बनाने के गंभीर आरोप सामने आए हैं।
हजार-दो हजार नहीं, सीधे लाखों पर नजर
अखबार में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, प्रमोद मिश्र जैसे शातिर बाबू छोटे-मोटे मामलों में दो-चार हजार रुपये झपटने वाले बाबुओं में से नहीं हैं। उनकी सुई वहीं अटकती है जहाँ कम से कम एक-दो लाख रुपये मिलने की पूरी संभावना हो। आरोप है कि मृतक आश्रित की नियुक्ति हो या अन्य प्रशासनिक कार्य, बिना दो लाख रुपये की मांग किए फाइलों पर हस्ताक्षर तक नहीं किए जाते हैं।
सीएमओ कार्यालय पर कब्जा और सिंडिकेट का जाल
विभाग के भीतर चर्चा है कि प्रमोद मिश्र को बस्ती लाने के पीछे एक सोची-समझी साजिश थी ताकि फर्जी सामानों के भुगतान का रास्ता साफ किया जा सके। इस पूरे खेल में सीएमएसडी स्टोर प्रभारी डॉ. बृजेश शुक्ल, एनएचएम के संदीप राय और चीफ फार्मासिस्ट अजय मिश्र जैसे चेहरे भी शामिल बताए जा रहे हैं। हालत यह है कि इस गिरोह ने मिलकर पूरे सीएमओ कार्यालय को ही अपने कब्जे में ले रखा है।
आपके हाथ में जो तस्वीर है, वह इसी काले खेल की एक झलक मात्र है। कैसे चलता है ये खेल ? खबर के तथ्यों के अनुसार प्रमोद कुमार मिश्र खुद को बड़ा रसूखदार बताते हैं। उनका दावा होता है कि जिले के हर महकमे में उनकी पकड़ है।
मोडस ऑपरेंडी बिल्कुल साफ है –
- पहला जाल: पहले शिकार को भरोसे में लेना। खुद को जनहितैषी और जुगाड़ू बताना।
- दूसरा दांव: फिर धीरे से अपने राजनीतिक और अफसरशाही संपर्कों का जिक्र करना। बताया जाता है कि कई मौकों पर इन्होंने बड़े नेताओं का नाम लेकर लोगों पर रौब गांठने की कोशिश की है। हालांकि जब इस बारे में कुछ नेताओं से पूछा गया तो उन्होंने दो टूक कहा – “हमारा इनसे कोई लेना-देना नहीं है, ये अपना नाम इस्तेमाल कर रहे हैं।”
- तीसरा और आखिरी दांव – वसूली: काम कराने के नाम पर मोटी रकम की मांग। सूत्रों का कहना है कि ये हजार-दो हजार के लिए हाथ भी गंदा नहीं करते। इनका रेट लाखों से शुरू होता है। पीड़ितों का आरोप है कि पैसा नहीं दो तो काम लटका दो, और पैसा दो तो हर अटका काम फटाफट करा दो।
कौन हैं ये ‘प्रमोद’ मिश्र ?
स्थानीय लोगों के अनुसार प्रमोद कुमार मिश्र ने खुद को मीडिया और समाजसेवा की आड़ में एक प्रभावशाली व्यक्ति के रूप में स्थापित कर रखा है। लेकिन असलियत में इनका काम बिचौलिये से ज्यादा कुछ नहीं है। आरोप है कि सरकारी दफ्तरों में इनका आना-जाना एक दलाल के तौर पर होता है। एक पीड़ित ने नाम न छापने की शर्त पर बताया –
“साहब, पहले लगा मदद कर रहे हैं। बाद में पता चला कि मदद के नाम पर सौदा कर रहे हैं। बोले – अरे ये काम हजार में नहीं होगा, इसमें तो लाख लगेगा, तभी होगा।”
रेलवे से लेकर कलेक्ट्रेट तक फैला है जाल ?
विश्वस्त सूत्रों के अनुसार इनकी गतिविधियाँ सिर्फ एक विभाग तक सीमित नहीं हैं। इनके तार कई विभागों से जुड़े होने की चर्चा है। एक जगह से कमीशन लो, दूसरी जगह सेटिंग करो – यही इनका फुल टाइम बिजनेस बन गया है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतनी खुली लूट के बाद भी जिम्मेदार अफसर कार्रवाई क्यों नहीं कर रहे हैं? क्या इनके पीछे किसी बड़े सफेदपोश का हाथ है, जो इन्हें बचा रहा है?
राजनीतिक धौंस और तबादलों का अवैध बाजार
प्रमोद मिश्र पर यह भी आरोप है कि वह स्थानीय नेताओं और जनप्रतिनिधियों (सांसद-विधायक) का धौंस जमाकर या उनके नाम का इस्तेमाल कर सीएमओ कार्यालय के फैसलों को प्रभावित करते हैं। डॉक्टरों और फार्मासिस्टों के तबादलों में भी इस लूटपाट गिरोह की मुख्य भूमिका रहती है; बिना इनकी मर्जी और चढ़ावे के कोई भी कर्मचारी अपनी जगह से हिल नहीं सकता। पैसों के लेन-देन के आधार पर मिनटों में प्रशासनिक आदेशों तक को बदल दिया जाता है, जिसका ताज़ा उदाहरण साल्ताैआ के एमओआईसी की नियुक्ति और तुरंत बदले गए आदेश से मिलता है।
फर्जी खरीद और नियमों की धज्जियां
विभागीय नियमों को ताक पर रखकर ऐसी सामग्रियों की लगातार खरीदारी दिखाई जा रही है जिनकी कोई जरूरत ही नहीं है। जो सामान नियमतः हर तीन साल में खरीदा जाना चाहिए, उसकी खरीद हर महीने धड़ल्ले से हो रही है। स्थिति यह है कि सीएमओ आवास को एक तरह का गोदाम बना दिया गया है, जहाँ 40 प्रतिशत तक अधिक कीमत वाले सामानों की खरीद कर सरकारी धन को चूना लगाया जा रहा है।
जनता पूछ रही है – जांच कब ?
बस्ती की जनता अब आर-पार के मूड में है। लोगों का कहना है कि अगर समय रहते ऐसे लोगों पर नकेल नहीं कसी गई तो ईमानदार व्यवस्था का दम घुट जाएगा।
अब गेंद जिला प्रशासन के पाले में है। क्या प्रशासन इस ‘लाख दो लाख पकड़ते’ वाले कथित खेल की जांच कराएगा? क्या प्रमोद कुमार मिश्र के आय के स्रोतों और उनकी संपत्ति की जांच होगी?
आखिर इस संरक्षण का राज क्या है?
विभाग के भीतर और आम जनता के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि आखिर इतने पुख्ता सबूतों और लगातार शिकायतों के बावजूद न तो प्रमोद मिश्र का प्रभार हटाया जा रहा है और न ही उनका तबादला किया जा रहा है। जब तक भ्रष्टाचार के इस नेटवर्क पर प्रशासनिक हंटर नहीं चलेगा, तब तक स्वास्थ्य सेवाओं का भगवान ही मालिक है।
यह खबर सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस सिस्टम पर चोट है, जो भ्रष्टाचार को फलने-फूलने देता है।
नोट: यह समाचार प्राप्त तथ्यों, दस्तावेजों और पीड़ितों के आरोपों के आधार पर जनहित में प्रकाशित किया गया है। संबंधित पक्ष का पक्ष जानने के लिए संपर्क का प्रयास किया गया।


















