उत्तर प्रदेशबस्ती

बस्ती में आबकारी विभाग पूरी तरह शिथिल: अवैध वसूली में व्यस्त, सूचना देने पर भी नहीं होती कार्रवाई!

सच्चाई यह है कि बस्ती में आबकारी विभाग अब नियामक नहीं, वसूली का अड्डा बन गया है। छोटा पाउच बेचने वाला पकड़ा जाता है, बड़ा माफिया महीना पहुंचाता है।

अजीत मिश्रा (खोजी)

खाकी के कड़े तेवर और आबकारी की नींद: बस्ती में अवैध शराब के खिलाफ आर-पार की लड़ाई

  • छावनी पुलिस के कड़े तेवर से शराब माफियाओं के हौसले पस्त; आम जनता में बढ़ा पुलिस के प्रति भरोसा।
  • पत्रकारिता की आड़ में अवैध धंधों को संरक्षण देने वालों में मची खलबली, वर्षों पुराना नेटवर्क टूटा।
  • घघौवा पुलिस चौकी क्षेत्र में तेजी से बढ़ रहा अवैध शराब का कारोबार; विक्रमजोत के कारोबारियों का भी बना नया ठिकाना।
  • चौकी प्रभारी की ‘कृपा’ से घघौवा में बेखौफ फल-फूल रहा धंधा, उच्चाधिकारियों के हस्तक्षेप की मांग।

बस्ती जनपद में अवैध नशे के कारोबार को लेकर एक बार फिर प्रशासनिक सुस्ती और मिलीभगत पर सवाल खड़े हो गए हैं। जहाँ एक तरफ आबकारी विभाग अपनी जिम्मेदारियों से पूरी तरह मुंह फेरे हुए अवैध वसूली में मस्त नजर आ रहा है, वहीं दूसरी तरफ खाकी (पुलिस) ने मोर्चा संभालकर अवैध शराब माफियाओं की नींद उड़ा दी है। यह स्थिति न सिर्फ प्रशासनिक तंत्र की कार्यशैली पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि कैसे कुछ तथाकथित संरक्षणदाता और पत्रकारिता की आड़ में पलने वाले दलाल इस कार्रवाई से बौखलाए हुए हैं।

​आबकारी विभाग की शिथिलता और पुलिस की सक्रियता

  • आबकारी विभाग की नाकामी: नियमों के तहत कच्ची शराब और अवैध नशे के कारोबार पर नकेल कसने की मुख्य जिम्मेदारी आबकारी विभाग की है। लेकिन धरातल पर स्थिति यह है कि विभाग या तो गहरी नींद में सोया है या फिर अपनी तिजोरी भरने में व्यस्त है। सूचनाएं देने के बावजूद विभागीय स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई न होना इनकी नीयत पर सीधा सवाल खड़ा करता है।
  • छावनी पुलिस बनी ढाल: जहाँ आबकारी विभाग नदारद दिखा, वहीं छावनी पुलिस ने आगे बढ़कर सराहनीय कदम उठाया है। लगातार दबिश, छापेमारी और भारी मात्रा में अवैध शराब की बरामदगी से माफियाओं के हौसले पस्त हो चुके हैं। इस कार्रवाई से आम जनता के बीच पुलिस के प्रति भरोसा मजबूत हुआ है, वहीं अवैध धंधों से अपनी रोटियां सेकने वाले कथित ‘हितैषियों’ में खलबली मची हुई है।

​घघौवा चौकी क्षेत्र: अवैध कारोबार का नया सेफ जोन?

​एक तरफ जहाँ पुलिस के कड़े तेवर दिख रहे हैं, वहीं घघौवा पुलिस चौकी क्षेत्र की कार्यप्रणाली इस मुहिम पर पानी फेरती नजर आ रही है।

  • ​यहाँ अवैध शराब का कारोबार दिन-प्रतिदिन तेजी से पैर पसार रहा है।
  • ​स्थिति यह है कि अब पुराने कारोबारियों के साथ-साथ विक्रमजोत के धंधेबाजों ने भी घघौवा को अपना नया ठिकाना बना लिया है।
  • ​स्थानीय स्तर पर चर्चा आम है कि जब तक चौकी प्रभारी महोदय की ‘कृपा दृष्टि’ बनी रहेगी, तब तक किसी भी दबाव या शिकायत के बावजूद यहाँ अवैध कारोबार के खिलाफ कोई बड़ी कार्रवाई होना असंभव है।

​संरक्षणदाताओं और दलालों में बौखलाहट

​वर्षों से अवैध शराब और गांजा कारोबारियों को संरक्षण देने वाला नेटवर्क अब पहली बार टूटता नजर आ रहा है। इस कार्रवाई से उन चेहरों की नींद उड़ गई है जो पत्रकारिता या अन्य पदों की आड़ में इन अवैध धंधों को फलने-फूलने का मौका दे रहे थे। जब कानून का शिकंजा कसता है, तो ऐसे तत्व अक्सर पुलिस की कार्रवाई पर ही सवाल उठाने लगते हैं—जो उनकी हताशा और बौखलाहट का स्पष्ट प्रमाण है।

स्रोत और तथ्य खुद गवाही देते हैं कि यह विभाग कार्रवाई नहीं, खानापूर्ति करता है।

  •  माझा इलाका – आबकारी के नक्शे से गायब
    सरयू तट के किनारे बसा माझा इलाका बस्ती में कच्ची शराब की राजधानी बन गया है। एबीपी की रिपोर्ट के अनुसार “बस्ती जनपद में आबकारी विभाग की उदासीनता की वजह से लगातार माझा इलाके में अवैध शराब का धंधा बड़े पैमाने पर फलफूल रहा है”।

हकीकत यह है कि “आबकारी विभाग के अधिकारी ऑफिस से बाहर निकलना भी उचित नहीं समझते। जिसका फायदा सीधे तौर पर शराब माफिया उठा रहे हैं”। जब एसपी के आदेश पर पुलिस दबिश देती है, तब जाकर 200 लीटर अर्धनिर्मित और 400 लीटर अपमिश्रित जहरीली शराब बरामद होती है, नहीं तो आबकारी की फाइलों में सब शांत है।

सवाल सीधा है – पुलिस को जो दिख जाता है, आबकारी को क्यों नहीं दिखता? जवाब है मिलीभगत। “कच्ची का धंधा आबकारी के अधिकारियों की मिलीभगत से कतई भी फल फूल नहीं सकता” – यह सवाल खुद मीडिया उठा चुका है।

  •  लाइसेंसी दुकानों की लूट – सुबह 6 बजे से जहर
    अवैध भट्टियों की बात छोड़िए, सरकार की लाइसेंसी दुकानें खुद नियमों को ठेंगा दिखा रही हैं।

ताजा मामला पचपेड़वा चौराहा, पैकोलिया का है। यहाँ “सरकारी देशी शराब की दुकान पर निर्धारित समय से पहले ही शराब बेची जा रही है। आरोप है कि सुबह 6 बजे से ही अतिरिक्त पैसे लेकर शराब की बिक्री की जा रही है”। इसी मार्ग से स्कूली बच्चे जाते हैं। शिकायत पर एसडीएम को जांच का आदेश देना पड़ा, जबकि जिला आबकारी अधिकारी ने फोन उठाना तक मुनासिब नहीं समझा।

यही हाल गौर के चकचई चौराहे पर मिला। जहाँ महाकाल फास्ट फूड की आड़ में सुबह 6 बजे से देर रात तक अवैध देसी शराब बेची जा रही थी। स्थानीय लोगों का आरोप था कि शराब में गांजा, पेट्रोल तक मिलाया जा रहा था। सोचिए, फास्ट फूड में फास्ट मौत परोसी जा रही थी और आबकारी विभाग को “कई दिनों से मिल रही सूचनाओं” के बाद ही होश आया।

  •  कार्रवाई का ढोंग – 1800 किलो लहन नष्ट, माफिया मस्त
    विभाग हर होली-दीवाली पर 1800 लीटर लहन नष्ट करने और 45 लीटर शराब पकड़ने का प्रेस नोट जारी कर देता है, ताकि अखबार में फोटो छप जाए। लेकिन माझा के असली माफिया, भट्ठियां और टैंकर आज भी सलामत हैं।

सच्चाई यह है कि बस्ती में आबकारी विभाग अब नियामक नहीं, वसूली का अड्डा बन गया है। छोटा पाउच बेचने वाला पकड़ा जाता है, बड़ा माफिया महीना पहुंचाता है।

जब तक हर बस्ती की नदी किनारे की भट्ठी, हर चौराहे की सुबह 6 बजे खुलने वाली दुकान और हर फास्ट फूड में छिपे ठेके का ऑडिट कर, संबंधित आबकारी इंस्पेक्टर की संपत्ति और कॉल डिटेल नहीं खंगाली जाएगी, तब तक यह नशे का गठजोड़ नहीं टूटेगा।

बस्ती को नशा मुक्त करने के लिए पहले आबकारी विभाग को माफिया मुक्त करना होगा।

निष्कर्ष:

बस्ती में अवैध नशे के खिलाफ चल रही इस जंग में यह साफ हो गया है कि जनता अब सुस्त और भ्रष्ट तंत्र के बजाय निष्पक्ष कार्रवाई चाहती है। जहाँ छावनी पुलिस ने एक नजीर पेश की है, वहीं घघौवा चौकी जैसे क्षेत्रों में व्याप्त लापरवाही पर उच्चाधिकारियों को तत्काल संज्ञान लेने की जरूरत है ताकि जनपद को पूरी तरह नशामुक्त बनाया जा सके।

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