
शुभाशुभ फल की प्राप्ति हेतू प्रतिपदा मे देवी को केश पवित्र (चंदन लेप व त्रिफला) तथा कंघी अर्पण करें

गडहनी। आश्विन शुक्लपक्ष प्रतिपदा से शारदीय नवरात्र का प्रारंभ होता है।यह अनुष्ठान इस वर्ष 3 अक्टूबर 2024 दिन गुरुवार से प्रारंभ हो रहा है।इस दिन कलश स्थापन सुबह से ही प्रारंभ होगा।कलश स्थापन के साथ देवी भगवती का षोडषोपचार पूजन पाठ और नवरात्र व्रतारम्भ शुरू होगा। 10 अक्टूबर दिन गुरूवार को अष्टमी महागौरी देवी का पूजन होगा उसी दिन ही अष्टमी अनुष्ठान रखा जायेगा और रात्री 11:41 पर महानिशा पूजा होगा। 11 अक्टूबर दिन शुक्रवार को नवमी मे सिद्धिदात्री देवी का पूजन पाठ होगा।नवमी तिथि प्रातः में 5:47 तक है इसलिए ‘यावन्नवमी होमादिकम् चरेत’ के अनुसार हवन हो जायेगा।12 अक्टूबर दिन शनिवार को दशमी तिथि रात्री 4:19 तक है और श्रवणा नक्षत्र 12:52 तक है अत: श्रवणायाम विसर्जयेत’ के साथ पाठ का समापन और प्रतिमा, कलश विसर्जन आदि किया जायेगा साथ ही नवरात्र व्रत का पारणा भी होगा।उसी दिन नीलकंठ दर्शन के साथ दशहरा अर्थात विजया दशमी का त्योहार मनाया जायेगा।वहीं संध्याकाल मे रावण वध का आयोजन किया जायेगा।
डोली पर सवार होकर आयेंगी देवी दुर्गा और मुर्गे की सवारी कर करेंगी प्रस्थान
पण्डित अमरेन्द्र कुमार मिश्र बताते है कि इस वर्ष गुरुवार से शारदीय नवरात्र प्रारंभ होने से दूर्गा देवी का आगमन दोला (डोली) पर हो रहा है जो कि शुभ नहीं है।इसलिए सचेष्ट होकर देवी की उपासना करनी है और बार-बार क्षमायाचना करते रहना होगा।वहीं देवी को प्रसन्न करने व शुभ फल की प्राप्ति हेतू प्रतिपदा मे देवी को केश पवित्र (चंदन लेप व त्रिफला) तथा कंघी अर्पण करें।विजयादशमी शनिवार को पड रहा है इसलिए देवी का प्रस्थान ‘मुर्गे की वाहन’ पर होगा जो व्याकुलता व्याग्रता का परिचायक है’।उन्होने बताया कि आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक शारदीय नवरात्रि का पर्व होता है। यदि कोई पूरे नवरात्रि का उपवास-व्रत न कर सकता है तो सप्तमी, अष्टमी और नवमी तीन दिन उपवास करके देवी की पूजा करने से वह संपूर्ण नवरात्रि के उपवास के फल को प्राप्त करता है।श्रीमद् देवी भागवत’ में आता है कि यह व्रत महासिद्धि को देने वाला, धन-धान्य प्रदान करने वाला, सुख व संतान बढ़ाने वाला, आयु एवं आरोग्य वर्धक तथा स्वर्ग और मोक्ष तक देने में समर्थ है। यह व्रत शत्रुओं का दमन व बल की वृद्धि करने वाला है महान से महान पापी भी यदि नवरात्रि व्रत कर ले तो संपूर्ण पापों से उसका उद्धार हो जाता है।
नवरात्रि जागरण का महत्व
नवरात्रि का उत्तम जागरण वह है कि जिसमें- शास्त्र ज्ञान की चर्चा हो, प्रज्जवलित दीपक रखा हो, देवी का भक्तिभाव युक्त कीर्तन हो, वाद्य, ताल सहित का सात्त्विक संगीत हो, मन में प्रसन्नता हो, सात्त्विक नृत्य हो, डिस्को या ऐसे दूसरे किसी नृत्य का आयोजन न हो, सात्त्विक नृत्य, कीर्तन के समय भी जगदम्बा माता के सामने दृष्टि स्थिर रखें, किसी को बुरी नजर से न देखें।नवरात्रि के दिनों में गरबे गाने की प्रथा है। पैर के तलुओ एवं हाथ की हथेलियों में शरीर की सभी नाड़ियों के केन्द्रबिन्दु हैं, जिन पर गरबे में दबाव पड़ने से ‘एक्यूप्रेशर’ का लाभ मिल जाता है एवं शरीर में नयी शक्ति – स्फूर्ति जागती है।

