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बढ़ता शहरीकरण बढ़ता वायु प्रदूषण घटता मानव जीवन

भारत में शहरीकरण और बढ़ता प्रदूषण: एनसीआर, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान के विशेष संदर्भ में

भारत शहरीकरण की एक नई दिशा में तेजी से बढ़ रहा है, जहां शहरों की चमक-दमक और अवसरों की तलाश में लोग ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर उमड़ रहे हैं। साल 2025 में देश की अनुमानित जनसंख्या लगभग 146 करोड़ है, जिसमें दिल्ली-मेट्रोपोलिटन (लगभग 3.46 करोड़) और संपूर्ण एनसीआर (करीब 7 करोड़) का बड़ा हिस्सा है। हरियाणा में 3.08 करोड़ से अधिक लोग रहते हैं, जिनमें सिर्फ गुरुग्राम की आबादी लगभग 17 लाख के पार पहुँच चुकी है। राजस्थान जैसे बड़े राज्य की आबादी भी 8.5 करोड़ के करीब है, जिनके जयपुर, जोधपुर, कोटा, उदयपुर जैसे शहर आज शहरीकरण और प्रदूषण की नई हदों को छू रहे हैं। यह आंकड़े सिर्फ जनगणना या विकास का प्रतीक नहीं, बल्कि पर्यावरण पर बढ़ते दबाव और लोगों के स्वास्थ्य से जुड़ी गंभीर चेतावनी भी हैं।

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र जिसमें दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद, फरीदाबाद, गुरुग्राम जैसे तेजी से बढ़ते शहर आते हैं—शहरीकरण की अगुवाई में हैं। आबादी का घनत्व, लाखों वाहनों की आवाजाही, अनियंत्रित निर्माण कार्य, और नजदीकी दूर दराज गाव वासियों के मजदूर वर्ग ,रोजगार परक युवाओं के पलायन से इन शहरी केंद्रों पर चौतरफा दबाव है। दिल्ली-NCR की वायु गुणवत्ता अक्सर खतरनाक स्तर तक गिर जाती है। रिकॉर्ड बताते हैं कि दिल्ली के कुल वायु प्रदूषण में 40% से अधिक योगदान सिर्फ वाहनों का है। वहीं, उद्योग और निर्माण कार्यों से धूल-कणों (PM2.5/PM10) का स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन की मान्यताओं से पाँच से छः गुना ज़्यादा पार कर जाता है। फरीदाबाद, नोएडा और विशेष तौर पर गुरुग्राम जैसे उच्चस्तरीय शहर भी प्रदूषण के इसी संकट से गुजर रहे हैं।राजस्थान के शहरी केंद्रों का हाल भी कुछ अलग नहीं है। जयपुर (जनसंख्या लगभग 44 लाख) सहित जोधपुर, अजमेर ,बीकानेर ,कोटा, उदयपुर जैसे नगर तेजी से फैले हैं। पुराने हरे-भरे इलाके और जल स्रोत लगातार कंक्रीट के विस्तार में तब्दील होते जा रहे हैं। अंतराष्ट्रीय जनसंख्या विज्ञान संस्थान मुंबई विश्विद्यालय के एलुमनाई डॉ नयन प्रकाश गांधी का मानना है कि जलवायु परिवर्तन, तीव्र औद्योगिकीकरण, और बढ़ती हुई रिहायशी कॉलोनियाँ ,गगनचुंबी इमारतें इन शहरों के पर्यावरण बेलेंस को गहरा आघात पहुँचा रही हैं।प्रदूषण सिर्फ एक शब्द नहीं,आज हर नागरिक की सांस, जल, मिट्टी और ध्वनि तक को प्रभावित करने वाली समस्या है।

प्रदूषण के कारण आज घर के बुजुर्गों की जीवन लीला असमय समाप्त हो रही है ,वहीं कई घर में बुजुर्गों से पूर्व युवा सदस्य ,महिला की असमय उपजे नए नए प्रभारों में उभरे कैंसर ,ब्रेन ट्यूमर,साइलेंट अटैक आदि से मौतें दिनों दिन हो रही है आज हर रोज हर शहर कस्बे में एक न एक मौत का कारण अकस्मात अटैक को ही बताया जाता है ,यह सब मानव द्वारा विभिन्न स्तरों पर फैलाया जा रहा प्रदूषण है ,न की बढ़ती जनसंख्या ।बढ़ती जनसंख्या भारत देश के लिए वरदान है इसलिए हमारी आर्थिक व्यवस्था मजबूत है परंतु व्यवसायिक गतिविधियों द्वारा हो रहे प्रदूषण को कम करने और उसका दुष्प्रभाव खत्म करने के लिए नित नई तकनीक को उपयोग में लेना होगा ,कब प्रदूषण वाले ईंधनों पर सोचना होगा ,पब्लिक ट्रांसपोर्टेशन को बढ़ावा देना होगा ताकि व्यतिगत वाहनों के धुएं के प्रदूषण को कम किया जा सके ।वाहनों का अत्यधिक प्रयोग, औद्योगिकीकरण का बेलगाम विस्तार, प्लास्टिक-कूड़े का बढ़ता बोझ और नदियों की सफाई-संकट अपने चरम पर हैं। गौर किया जाए तो अकेले एनसीआर क्षेत्र में वायु, जल और भूमि प्रदूषण सभी मापदंडों पर गंभीर है।

दिल्ली, नोएडा और गुरुग्राम में हर साल सांस की बीमारियाँ, हृदय संबंधी समस्याएँ, कैंसर और मानसिक तनाव के मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं, जिनमें बच्चों और बुजुर्गों की स्थिति सबसे नाजुक है।इन समस्याओं के समाधान के लिए शासन, उद्योग और आम नागरिकों को सामूहिक जिम्मेदारी निभानी होगी। सर्वप्रथम, पर्यावरण-शिक्षा को स्कूलों, कॉलेजों और सार्वजनिक मंचों तक पहुँचाना अत्यंत आवश्यक है, ताकि जनजागरूकता और स्थानीय भागीदारी पैदा हो। शहरीकरण की बड़ी चुनौतियों से निपटने के लिए हरित ऊर्जा जैसे सौर एवं पवन-स्रोतों का प्रयोग बढ़ाना ज़रूरी हो गया है। स्मार्ट-पब्लिक ट्रांसपोर्ट, इलेक्ट्रिक व्हीकल, और ट्रैफिक-कंट्रोल जैसे आधुनिक कदम बढ़ाए जाने चाहिएं। सिंगल-यूज प्लास्टिक और ठोस-कचरे पर कानूनी प्रतिबंध, साथ ही पेड़-पौधों का संरक्षण, वृक्षारोपण अभियान और हरित पट्टियों को पुनर्जीवित करना आज की अनिवार्यता है। साथ ही सभी विकास कार्यों में पर्यावरण-संवर्द्धन को पहली प्राथमिकता देनी होगी। आजकल गाड़िया खरीदना और उसे घर के सामने रखने का ट्रेंड चल गया है ,थोड़ी सी उचित गंतव्य स्थल पर अकेला व्यक्ति दिखावे ,फैशनपरस्ती के चक्कर में नित नई गाड़िया शोक के लिए खरीद रहा है और प्रदूषण के लिए जिम्मेदार है ही है ,प्राइवेट वाहनों का उपयोग उचित तभी है जब सपरिवार आप जा रहे है अन्यथा पब्लिक या स्पोर्ट व्हीकल का उपयोग करना चाहिए या दुर्गम स्थान जहां उचित हो वहा प्राइवेट व्हीकल का उपयोग करना चाहिए। हालांकि ई व्हीकल वायु प्रदूषण को कम करने में कारगर है ,परंतु अभी इसे किफायती और ड्यूरेबल बनाने में समय है ,तभी भारत का ई व्हीकल मार्केट और तेज गति पकड़ पाएगा ।यह दौर सिर्फ आर्थिक विकास या तकनीकी प्रगति का नहीं है, बल्कि ‘हरित संतुलन’ और ‘स्वस्थ शहरी जीवन’ की चुनौती को स्वीकारने का भी है। यदि दिल्ली, एनसीआर, गुरुग्राम और राजस्थान के नगर अब भी सही नीतियाँ नहीं अपनाते, तो हवा, पानी, भूमि और आने वाली पीढ़ियों के लिए खतरा बढ़ता ही जाएगा। पर्यावरण-अनुकूलता और जन-भागीदारी के साथ आज से ही हर नागरिक को छोटे-छोटे सतत् प्रयासों को अपनाना होगा।

आज नहीं तो कल, यह संकट हमारी सांसों की कीमत पर हमें ही भुगतना पड़ेगा। समय की मांग है कि शहरीकरण की गति के साथ पर्यावरण-संरक्षण भी उतनी ही मजबूती से आगे बढ़े, तभी भारत का शहर और गाँव, दोनों स्वस्थ और सुरक्षित भविष्य की ओर अग्रसर हो सकेंगे।

✍️डॉ. नयन प्रकाश गांधी

 

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