

🟥 संपादकीय विशेष: सहारनपुर की व्यथा – टूटी सड़कों, सड़ी नालियों और राजनीतिक स्वार्थों के बीच कराहता लहूलुहान शहर 🟥
सहारनपुर, जिसे कभी अपनी ऐतिहासिक धरोहरों, धार्मिक सौहार्द और सांस्कृतिक विविधता के लिए जाना जाता था, आज अव्यवस्था और भ्रष्टाचार की बेड़ियों में जकड़ा कराह रहा है। यह शहर, जो उत्तर भारत की शान माना जाता रहा, अब टूटी सड़कों, जाम नालियों, जलभराव, गंदगी और राजनीतिक उपेक्षा के कारण लहूलुहान दिखाई देता है। नगर निगम की निष्क्रियता और प्रशासन की बेरुखी ने इस शहर को एक ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया है, जहां जनता त्राहिमाम कर रही है। सहारनपुर की गलियां टूटी-फूटी सड़कों और सड़ी नालियों की दुर्गंध से भरी पड़ी हैं, जगह-जगह जलभराव और गंदगी के ढेर से शहर की सांसें थम गई हैं। प्रशासन और स्थानीय निकाय के जिम्मेदार लोग इन हालात से आंखें मूंदे बैठे हैं, मानो उन्हें जनता की समस्याओं से कोई सरोकार ही न हो। “स्मार्ट सिटी” के नाम पर किए गए वादे केवल कागजों में ही सिमट गए और जमीनी हकीकत में शहर का बुनियादी ढांचा खंडहर में तब्दील हो चुका है।
राजनीति और सत्ता संघर्ष ने सहारनपुर को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। यहां के नेता, चाहे विधायक हों, पार्षद हों या ठेकेदार, सबने अपने स्वार्थों की खातिर इस शहर का दोहन किया है। कोई सत्ता के खेल में मशगूल रहा, कोई ठेकों की बंदरबांट में लगा रहा और कोई आंकड़ों की बाजीगरी में। परिणाम यह हुआ कि जनता की समस्याएं कभी उनकी प्राथमिकताओं में शामिल ही नहीं रहीं। चौक-चौराहों की सजावट गायब हो गई, विकास कार्य ठप हो गए और यहां तक कि शहर की पहचान बने शेर की प्रतिमा तक उखाड़ दी गई। जनता रोजाना गंदगी, जाम और बीमारियों से लड़ रही है, जबकि निगम मस्त और प्रशासन उदासीन है।
सहारनपुर की जनता बरसों से उम्मीद करती रही है कि कोई ऐसा नेतृत्व आएगा जो उसके घावों पर मरहम लगाएगा और उसे उसकी खोई हुई पहचान लौटाएगा। लेकिन हर चुनाव के समय वही वादे, वही घोषणाएं और वही खोखले आश्वासन दिए जाते हैं। चुनाव खत्म होते ही जनता फिर उसी गर्त में धकेल दी जाती है। अब यह शहर खुद को महाभारत के भीष्म पितामह की तरह बाणों की शैया पर लेटा हुआ महसूस करता है, जिसे बस किसी अर्जुन की तलाश है जो उसे उसकी पीड़ा से मुक्ति दिला सके।
शहर की दुर्दशा का सबसे बड़ा शिकार गरीब जनता बनी है। टूटी सड़कों, नालियों के गंदे पानी और जलभराव के बीच गरीब वर्ग रोजमर्रा की जिंदगी जीने को मजबूर है। भ्रष्टाचार और टैक्स की मार ने उनका जीना दूभर कर दिया है, जबकि अमीर वर्ग इस अव्यवस्था के बीच और ताकतवर होता जा रहा है। सहारनपुर की राजनीति ने गरीब और अमीर के बीच की खाई को और गहरा कर दिया है।
हर चुनाव में सहारनपुर को संवारने और सजाने के वादे किए जाते हैं। राजनीतिक मंचों पर शहर के सुनहरे भविष्य की तस्वीरें दिखाई जाती हैं, लेकिन चुनाव बीतते ही जनता के हिस्से आती है केवल गंदगी, अव्यवस्था और टूटी हुई उम्मीदें। यह शहर चुनावी वादों और नेताओं की महत्वाकांक्षाओं का शिकार होकर रह गया है।
आज सहारनपुर की पुकार यही है कि अब जनता को जागना होगा और उन लोगों को सबक सिखाना होगा जिनके दिलों में संवेदनाएं नहीं, जिनकी नीयत में जनता और विकास नहीं बल्कि केवल सत्ता और धन की भूख है। यह शहर अभी भी उम्मीद करता है कि कोई ईमानदार और दूरदर्शी नेतृत्व सामने आएगा, जो उसके घावों पर मरहम लगाएगा और उसे उसकी असली पहचान लौटाएगा। सहारनपुर की यह कराहती आवाज़ हम सबको झकझोरती है कि अब समय आ गया है कि शहर की असल समस्याओं पर ध्यान दिया जाए और इसे फिर से जीवन्त और गर्व का प्रतीक बनाया जाए।
🖊️ रिपोर्ट: एलिक सिंह
संपादक – वंदे भारत लाइव टीवी न्यूज़
उत्तर प्रदेश महामंत्री – भारतीय पत्रकार अधिकार परिषद
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