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गौवंश की उपेक्षा बनी जानलेवा – 30 घंटे तड़पती रही गौमाता, नहीं मिला इलाज

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गौवंश की उपेक्षा बनी जानलेवा – 30 घंटे तड़पती रही गौमाता, नहीं मिला इलाज

बलौदाबाजार, 15 अक्टूबर:
दीपावली और गोवर्धन पूजा का पर्व नजदीक है, लेकिन बलौदाबाजार जिले में गौवंश की दर्दनाक स्थिति इस बात की ओर इशारा करती है कि जिन गौमाताओं की पूजा हम शास्त्रों और परंपराओं में करते हैं, उनकी जमीनी हकीकत भयावह और उपेक्षित है।

नेशनल हाईवे पर दुर्घटनाग्रस्त एक गौमाता 30 घंटे तक तड़पती रही, मगर प्रशासन से लेकर संबंधित विभाग तक कोई ठोस सहायता नहीं पहुँची। यह स्थिति न सिर्फ प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है, बल्कि संवेदनहीनता की पराकाष्ठा भी दर्शाती है।

प्रशासनिक इंतजाम केवल कागजों तक सीमित?

जिला प्रशासन द्वारा गौवंश की सुरक्षा और देखरेख के लिए कई विभागों को जिम्मेदारी दी गई है, टोल-फ्री नंबर और समाधान नंबर भी जारी किए गए हैं, प्राधिकृत चिकित्सकों की नियुक्ति और गश्ती दल की बात भी कही गई, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट नजर आ रही है।

जब हाईवे जैसे मुख्य मार्ग पर किसी मवेशी की स्थिति की जानकारी मिलने के बावजूद 30 घंटे तक उपचार नहीं हो सका, तो गांव-देहात की स्थिति की कल्पना भयावह हो सकती है।

गोवर्धन पूजा पर उठते सवाल

एक ओर दीपावली पर लक्ष्मी पूजन की तैयारी है, वहीं गौपूजन के लिए जिस गोवंश को सजाया जाना चाहिए था, वह तड़प-तड़पकर अपनी जान गंवा रहा है। यह दृश्य सिर्फ हृदयविदारक नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक असंवेदनशीलता का प्रमाण बन गया है।

कौन है जिम्मेदार?

इस घटना के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि —

  • अगर गौवंश की मौत होती है, तो जिम्मेदार कौन होगा?

  • क्या कोई अधिकारी या विभागीय कर्मचारी इसके लिए उत्तरदायी ठहराया जाएगा?

  • कानूनी कार्यवाही किस पर होगी?

  • या फिर यह एक और दर्दनाक घटना बनकर फाइलों में दफन हो जाएगी?

जनता और प्रशासन से अपील

यह समय है जब केवल त्योहार मनाने से नहीं, गौमाता की वास्तविक सेवा करने का संकल्प लेने की जरूरत है।
प्रशासन को चाहिए कि वह दिखावे से ऊपर उठकर जमीनी क्रियान्वयन पर ध्यान केंद्रित करे और ऐसे मामलों में त्वरित कार्रवाई और जवाबदेही सुनिश्चित करे।

साथ ही, समाज और गोसेवा से जुड़ी संस्थाओं को भी केवल नारों से आगे बढ़कर मौके पर मौजूद रहना होगा ताकि कोई गौवंश अगली बार 30 घंटे तड़पकर न मरे।

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