बस्ती का ‘मातृ वंदना’ महाघोटाला: 96 लाख डकार गए ‘सिस्टम के सफेदपोश’!
गरीब माताओं के हक पर 'डिजिटल डाका', ओटीपी के खेल ने खोली विभाग की पोल!
अजीत मिश्रा (खोजी)
😇सिस्टम की कोख से पैदा हुआ 96 लाख का ‘भ्रष्टाचार’: गरीबों के हक पर डाका, साहबों को सिर्फ ‘निचले स्तर’ पर शक!😇
- भ्रष्टाचार की ‘डिलीवरी’: लाभार्थियों के नाम पर अफसरों ने पाल लिए 1000 फर्जी खाते!
- जांच रिपोर्ट में सिर्फ ‘प्यादा’ फंसा, वजीर अब भी महफूज; 96 लाख के गबन का असली मास्टरमाइंड कौन?
- निचले स्तर पर ठीकरा फोड़कर क्या ‘बड़े मगरमच्छों’ को बचाने की हो रही है तैयारी?
- साइबर फ्रॉड या सरकारी साजिश? मातृ वंदना योजना में 96 लाख की सेंधमारी से हड़कंप!
ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश तिथि: 07 अप्रैल, 2026
बस्ती। प्रधानमंत्री की सबसे महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक ‘प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना’ (PMMVY), जिसका उद्देश्य गर्भवती महिलाओं और नवजातों को सुरक्षा कवच देना है, अब खुद भ्रष्टाचार के आईसीयू में वेंटिलेटर पर है। बस्ती जिले में हुए 96 लाख रुपये के महाघोटाले की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट ने विभाग के दावों की धज्जियां उड़ा दी हैं।
जांच कमेटी ने बड़े ही ‘सलीके’ से सारा ठीकरा ‘निचले स्तर’ के कर्मचारियों पर फोड़ते हुए अपनी खाल बचाने की कोशिश की है। लेकिन सवाल यह है कि क्या एक हजार से अधिक फर्जी खातों में रकम का ट्रांजेक्शन बिना ऊंची पहुंच और तकनीकी मिलीभगत के संभव है?
🎯ओटीपी का खेल और ‘अदृश्य’ लाभार्थी
दिसंबर 2025 के ऑडिट में जो सच सामने आया था, उसने शासन की चूलें हिला दीं। करीब 1000 से अधिक फर्जी बैंक खातों में जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा ट्रांसफर कर दिया गया। जांच में खुलासा हुआ कि यह पूरा खेल ओटीपी (OTP) के जरिए खेला गया।
🔥कड़वा सच: जिस मोबाइल नंबर पर ओटीपी जा रहा था, उसे लाभार्थी नहीं बल्कि घोटाले के ‘मास्टरमाइंड’ ऑपरेट कर रहे थे। एक ही आईपी एड्रेस से सैकड़ों आवेदन होना इस बात का प्रमाण है कि यह कोई चूक नहीं, बल्कि एक सुनियोजित ‘डिजिटल डकैती’ है।
- कागजों पर ‘जच्चा-बच्चा’ सुरक्षित, पर असलियत में बजट ‘साफ’; बस्ती में हुआ 96 लाख का ‘ऑपरेशन’!
- साहबों की नाक के नीचे होता रहा खेल, अब ओटीपी और साइबर सेल के पीछे छिप रहा विभाग!
- योजना पीएम की, डाका अपनों का: बस्ती मंडल में भ्रष्टाचार का ‘डिजिटल मॉडल’ उजागर!
🎯रुधौली बना घोटाले का ‘एपिसेंटर’
रिपोर्ट के मुताबिक, सबसे अधिक फर्जी भुगतान रुधौली क्षेत्र में पाए गए हैं। आईजीआरएस और आंतरिक ऑडिट ने पहले ही संकेत दे दिए थे कि लाभार्थियों की सूची में भारी विसंगतियां हैं। अब जब मामला पूरी तरह खुल चुका है, तो जांच कमेटी ने मामले को साइबर सेल को ट्रांसफर करने की सिफारिश की है। क्या यह मामले को ठंडे बस्ते में डालने की कोशिश है या वाकई सच्चाई तक पहुंचने की मंशा?
✍️सवाल: छोटे कर्मचारी ही क्यों बने बलि का बकरा?
जांच दल ने एएनएम अंजलि और आशा कार्यकर्ता रीता को दोषी मानकर कार्रवाई की संस्तुति की है। एएनएम की वेतन वृद्धि रोक दी गई और स्थानांतरण कर दिया गया। लेकिन बड़ा सवाल यह है:
- क्या आशा और एएनएम के पास इतना तकनीकी एक्सेस है कि वे पोर्टल पर डेटा के साथ इतनी बड़ी छेड़छाड़ कर सकें?
- विभाग के वे ‘जिम्मेदार’ अधिकारी कहां थे जिनके डिजिटल सिग्नेचर और अप्रूवल के बिना भुगतान संभव नहीं होता?
- क्या 96 लाख की फाइलें धूल फांक रही थीं या जानबूझकर आंखें मूंद ली गई थीं?
🎯सामाजिक सरोकार: न्याय की उम्मीद या सिर्फ कागजी खानापूर्ति?
सीडीओ सार्थक अग्रवाल ने अब कुछ ‘अन्य जिम्मेदारों’ की भूमिका पर फिर से जांच के आदेश दिए हैं। लेकिन बस्ती की जनता पूछ रही है कि क्या उन गरीब महिलाओं को उनका हक वापस मिलेगा जिनके नाम पर यह बंदरबांट हुई?
यह रिपोर्ट केवल वित्तीय अनियमितता का दस्तावेज नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था पर तमाचा है जो तकनीक के युग में भी पारदर्शिता के नाम पर शून्य है। अगर अब भी बड़े मगरमच्छों पर गाज नहीं गिरी, तो समझ लीजिए कि यह जांच रिपोर्ट भी केवल फाइलों का पेट भरने के काम आएगी।








