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बस्ती में गौसेवा का ‘शव’ : मंत्री के जिले में भूख से तड़प रही गौ माता, प्रशासन की आंखों पर बंधी पट्टी!

कागजों पर चारा, हकीकत में तड़पती गौ माता; बस्ती में 'सफ़ेद हाथी' साबित हो रही सरकारी गौशालाएं! मंत्री जी के गृह जनपद में गौवंश की दुर्दशा: क्या बेजुबानों की आह पर खड़ा होगा विकास का महल?

अजीत मिश्रा (खोजी)

विशेष रिपोर्ट: आस्था की ओट में सिसकती गौ माता; मंत्री के गृह जनपद में ही ‘गोवंश’ बेहाल!

बस्ती मंडल | ब्यूरो रिपोर्ट

  • बस्ती का ‘कलंक’: गौशालाओं में तड़पते बेजुबान, जिम्मेदार अफसरों को नहीं आती शर्म!
  • आस्था की ओट में भ्रष्टाचार का खेल: बस्ती में दम तोड़ती गायें, गहरी नींद में सोता प्रशासन!
  • वाह रे सिस्टम! मंत्री के शहर में ही सिसक रही गौ माता, बजट डकार रहे ‘सरकारी गिद्ध’।
  • गौशाला या ‘कत्लगाह’? बस्ती में भूख और प्यास से जंग लड़ रही गौ माता, जनता में भारी उबाल।

बस्ती। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार का स्पष्ट निर्देश है— ‘गौ सेवा सर्वोपरि’। लेकिन मुख्यमंत्री के इन आदेशों को बस्ती जिले में किस कदर ठेंगा दिखाया जा रहा है, इसकी बानगी यहाँ की बदहाल गौशालाएँ हैं। विडंबना देखिए, जिस जिले से सूबे के एक कद्दावर दर्जा प्राप्त मंत्री आते हैं, उसी जिले में गौ माता चारे और पानी की बूंद-बूंद को तरस रही हैं। प्रशासन की ‘बेखबरी’ और अधिकारियों की लापरवाही ने आज बस्ती के आम नागरिकों को आक्रोश की अग्नि में झोंक दिया है।

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कागजों पर ‘हरा चारा’, जमीन पर सिर्फ ‘हड्डियों का ढांचा’

​सरकारी फाइलों में इन गौशालाओं के नाम पर लाखों का बजट हर महीने ‘डकार’ लिया जाता है। दावों में गौवंश को पौष्टिक आहार और चिकित्सीय सुविधाएं दी जा रही हैं, लेकिन हकीकत यह है कि गौशालाओं में गायें भूख से दम तोड़ रही हैं। कई गौशालाओं में गायों की स्थिति इतनी वीभत्स है कि वे केवल हड्डियों का ढांचा मात्र रह गई हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि मृत गायों को सम्मानजनक समाधि देने के बजाय उन्हें खुले में फेंक दिया जाता है, जो प्रशासन की संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है।

मंत्री जी का क्षेत्र, फिर भी अंधेरा क्यों?

​बस्ती के निवासी इस बात से सबसे ज्यादा आहत हैं कि जिले का प्रतिनिधित्व करने वाले दर्जा प्राप्त मंत्री की नाक के नीचे यह सब हो रहा है। सवाल यह उठता है कि:

  • ​क्या स्थानीय प्रशासन ने मंत्री जी की आंखों पर पट्टी बांध रखी है?
  • ​क्या गौ संरक्षण के नाम पर आने वाला बजट भ्रष्ट तंत्र की भेंट चढ़ रहा है?
  • ​बस्ती के जिम्मेदार अधिकारी एसी कमरों से बाहर निकलकर इन बेजुबानों का हाल क्यों नहीं देखते?

जनता में भारी उबाल: “वोट के लिए गाय, सेवा के समय मौन?”

​आम जनता में इस दुर्दशा को लेकर भारी गुस्सा है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि चुनाव के समय जो गाय श्रद्धा का केंद्र होती है, आज वह प्रशासनिक भ्रष्टाचार के कारण नारकीय जीवन जीने को मजबूर है। लोगों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही गौशालाओं की स्थिति में सुधार नहीं हुआ और लापरवाह अधिकारियों पर गाज नहीं गिरी, तो बस्ती की जनता सड़कों पर उतरने को मजबूर होगी।

प्रशासन की चुप्पी और ‘सब ठीक है’ का रटा-रटाया राग

​जब भी इस संबंध में जिम्मेदार अधिकारियों से बात की जाती है, तो उनका एक ही जवाब होता है— “जांच की जा रही है।” आखिर यह जांच कब पूरी होगी? क्या प्रशासन तब जागेगा जब गौशालाएं गायों की कब्रगाह बन जाएंगी?

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निष्कर्ष: बस्ती में गौवंश की यह हालत केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि एक नैतिक पतन भी है। मुख्यमंत्री के विजन को पलीता लगा रहे इन अधिकारियों पर कार्रवाई अब अनिवार्य हो गई है। बस्ती की जनता अब आश्वासन नहीं, समाधान चाहती है।

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