“ढेलहूपुर में खनन माफिया का नंगा नाच: प्रशासन की नाक के नीचे धरती का सीना चीर रहे अपराधी, विभाग ‘मौन'”
"खनन माफिया के आगे नतमस्तक क्यों है प्रशासन? ढेलहूपुर में जारी अवैध खनन पर सरकार की चुप्पी पर उठे सवाल"
अजीत मिश्रा (खोजी)
खनन माफिया के आगे नतमस्तक प्रशासन: क्या यही है योगी सरकार का ‘जीरो टॉलरेंस’?
- “योगी के ‘जीरो टॉलरेंस’ को ढेलहूपुर में चुनौती: अवैध खनन की कमाई में विभागीय अधिकारियों का हिस्सा कितना?”
- “पर्यावरण का विनाश, माफिया का राज: परसरामपुर में विभाग की मिलीभगत से फल-फूल रहा अवैध खनन का काला कारोबार”
- “ढेलहूपुर: खनन माफिया के आगे प्रशासनिक तंत्र हुआ पंगु, आईजीआरएस शिकायतें भी बेअसर”
परसरामपुर, बस्ती: एक तरफ उत्तर प्रदेश की योगी सरकार पर्यावरण संरक्षण और अवैध खनन के खिलाफ सख्त रुख अपनाने का दावा करती है, वहीं दूसरी तरफ परसरामपुर थाना क्षेत्र की ग्राम पंचायत ढेलहूपुर में खनन माफियाओं ने पूरी व्यवस्था को ठेंगा दिखा रखा है। यहाँ ‘बाबा के बुलडोजर’ का डर नहीं, बल्कि उन माफियाओं का खौफ है जो खुलेआम धरती का सीना चीरकर प्रदेश के राजस्व को चूना लगा रहे हैं और विभाग ‘तमाशा’ देख रहा है।
पर्यावरण का चीरहरण और मौन प्रशासन
ढेलहूपुर की उपजाऊ भूमि पर खनन माफियाओं का कब्जा है। दिन-रात चल रहे अवैध मिट्टी खनन से न केवल पर्यावरण का विनाश हो रहा है, बल्कि जलवायु संतुलन भी बिगड़ रहा है। लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि जिले का खनन विभाग और स्थानीय प्रशासन पूरी तरह ‘कुंभकर्णी नींद’ में सोया हुआ है। क्या अधिकारियों के कान पर जूं तक नहीं रेंगती? या फिर उनकी आँखों पर भ्रष्टाचार की पट्टी इतनी मोटी है कि उन्हें यह अवैध कारोबार दिखाई ही नहीं देता?
मिल-बांटकर चल रहा ‘बंदरबांट’
स्थानीय सूत्रों की मानें तो यह खनन किसी छिपे हुए तरीके से नहीं, बल्कि पूरी मिलीभगत से हो रहा है। चर्चा है कि खनन माफिया विभागीय अधिकारियों के साथ ‘बखिरा’ (हिस्सा-बांट) कर रहे हैं। ऐसा लगता है कि अधिकारी माफियाओं के वेतनभोगी कर्मचारी बन गए हैं, जहाँ कानून का पालन करने के बजाय फाइलों की बंदरबांट को प्राथमिकता दी जा रही है।
ग्रामीणों का आक्रोश और आईजीआरएस की फाइलों में दफन सच्चाई
ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कई बार संबंधित अधिकारियों से शिकायत की, लेकिन नतीजा शून्य रहा। शिकायतकर्ताओं ने मुख्यमंत्री पोर्टल (IGRS) पर नामजद शिकायत दर्ज कराई है, जिसमें ढेलहूपुर के चार स्थानीय लोगों को माफिया के रूप में चिन्हित किया गया है।
बावजूद इसके, अब तक किसी भी माफिया के खिलाफ कोई प्रभावी कार्रवाई न होना, प्रशासन की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े करता है। क्या मुख्यमंत्री का पोर्टल केवल कागजी कार्रवाई तक ही सीमित रह गया है?
क्या जागेगा प्रशासन?
सवाल यह उठता है कि क्या शासन-प्रशासन तब जागेगा जब ढेलहूपुर का अस्तित्व ही मिट्टी में मिल जाएगा? या फिर ये खनन माफिया इतने ताकतवर हो चुके हैं कि इनके आगे योगी सरकार के अधिकारी नतमस्तक हो गए हैं?
प्रदेश की जनता अब उस कार्यवाही की प्रतीक्षा कर रही है जो इन माफियाओं के हौसलों को पस्त करे और यह साबित करे कि उत्तर प्रदेश में कानून का शासन है, न कि माफियाओं का। अब देखना दिलचस्प होगा कि क्या शासन इन भ्रष्ट अधिकारियों और माफियाओं के गठजोड़ पर बुलडोजर चलवाता है या फिर यह खेल इसी तरह बदस्तूर जारी रहेगा।








