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जे.जे. हॉस्पिटल का ‘कातिलाना’ खेल: पुरुष मरीज की रिपोर्ट में महिला अंगों का विवरण, इलाज के नाम पर जानलेवा मज़ाक!

बस्ती में स्वास्थ्य सेवा पर शर्मनाक धब्बा: जे.जे. हॉस्पिटल की लापरवाही से पुरुष मरीज की रिपोर्ट में महिला के गर्भाशय का ब्यौरा!

​अजीत मिश्रा (खोजी)

जे.जे. हॉस्पिटल का ‘कातिलाना’ कारनामा: पुरुष मरीज की रिपोर्ट में महिला अंगों का विवरण, डॉक्टर की ‘गुंडागर्दी’ से मचा हड़कंप

बस्ती, उत्तर प्रदेश

  • अस्पताल है या ‘मौत का कुआं’? जे.जे. हॉस्पिटल में मरीजों की जिंदगी से हो रहा भद्दा खिलवाड़!
  • डॉक्टर की डिग्री का दुरुपयोग या प्रशासनिक मिलीभगत? जे.जे. हॉस्पिटल में बिना सोनोलॉजिस्ट के चल रहा अल्ट्रासाउंड सेंटर!
  • गलती बताओ तो धमकी का सामना: जे.जे. हॉस्पिटल में इलाज कराने गए मरीज को मिली जान से मारने की चेतावनी!
  • बस्ती का जे.जे. हॉस्पिटल सवालों के घेरे में: क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट की उड़ाई धज्जियां, प्रशासन मौन!

​बस्ती जनपद के कैली रोड स्थित जे.जे. हॉस्पिटल फिर से सवालों के घेरे में है। यहाँ एक ऐसी चिकित्सा लापरवाही सामने आई है, जिसने स्वास्थ्य विभाग के दावों की पोल खोलकर रख दी है। एक पुरुष मरीज की अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट में महिला के गर्भाशय (Uterus) का विवरण दर्ज कर दिया गया। यह मामला केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि मेडिकल जगत में व्याप्त भ्रष्टाचार और अयोग्यता की पराकाष्ठा है।

​रिपोर्ट में ‘लिंग’ से लेकर ‘अंग’ तक सब फर्जी

​पीड़ित सुनील कुमार पाल, जो जनपद के थाना लालगंज अंतर्गत ग्राम चौबाह के निवासी हैं, 30 अप्रैल 2026 को स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को लेकर डॉ. अनिल कुमार चौधरी के पास पहुंचे थे। डॉक्टर ने उन्हें जांच के लिए जे.जे. हॉस्पिटल भेजा। अस्पताल की अयोग्यता का आलम यह रहा कि 10 बजे सुबह हुई जांच की रिपोर्ट में न केवल लिंग गलत दर्ज था, बल्कि उसमें महिला जननांगों (गर्भाशय) का ब्यौरा भी दे दिया गया। एक पुरुष मरीज को यह रिपोर्ट थमाकर अस्पताल ने न केवल उसकी स्थिति का मजाक उड़ाया, बल्कि उसके स्वास्थ्य को गंभीर खतरे में डाल दिया।

​बिना हस्ताक्षर और मोहर के कैसे जारी हुई रिपोर्ट?

​सबसे बड़ा सवाल यह है कि एक डायग्नोस्टिक सेंटर से बिना रेडियोलॉजिस्ट के हस्ताक्षर और बिना आधिकारिक मोहर के रिपोर्ट कैसे जारी हो गई? पीड़ित ने जब इस घोर अनियमितता पर सवाल उठाए, तो अस्पताल प्रशासन का असली चेहरा सामने आया। रिपोर्ट पर न तो किसी अधिकृत डॉक्टर के नाम का उल्लेख था और न ही रजिस्ट्रेशन नंबर। यह सीधे तौर पर क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट (2010) और उत्तर प्रदेश क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट नियमावली (2012) का उल्लंघन है।

​डॉक्टर की सफाई: ‘सैलरी काटी है’—क्या यही है न्याय?

​जब मामले ने तूल पकड़ा, तो डॉ. अनिल कुमार चौधरी ने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए एक बेतुका बयान दिया कि “संबंधित कर्मी की एक महीने की सैलरी रोक दी गई है।” प्रश्न यह उठता है कि क्या किसी की जान से खिलवाड़ करने की सजा सिर्फ सैलरी काटना है? डॉ. चौधरी के इस बयान से यह भी साफ हो गया है कि अस्पताल में योग्य डॉक्टरों की देखरेख के बजाय, बिना किसी डिग्री या प्रमाणन के अकुशल लोगों द्वारा अल्ट्रासाउंड किए जा रहे हैं।

​गुंडागर्दी: गलती बताओ तो मिलती है जान से मारने की धमकी

​पीड़ित सुनील कुमार पाल ने आरोप लगाया है कि जब उन्होंने दोबारा अस्पताल जाकर रिपोर्ट की गलतियों को सुधाराने की मांग की, तो उन्हें वहां मौजूद डॉक्टर और अन्य कर्मचारियों द्वारा घेर लिया गया। पीड़ित को न केवल गाली-गलौज दी गई, बल्कि जान से मारने की धमकी भी दी गई। एक चिकित्सा संस्थान में इस तरह की गुंडागर्दी प्रशासन की लचर व्यवस्था को दर्शाती है।

​पीसीपीएनडीटी एक्ट और स्वास्थ्य विभाग की चुप्पी

​क्या बस्ती का स्वास्थ्य विभाग सो रहा है? पीसीपीएनडीटी (PCPNDT) एक्ट के तहत अल्ट्रासाउंड केंद्रों के लिए सख्त नियम हैं। नियमों के अनुसार, रिपोर्ट पर सोनोलॉजिस्ट का नाम, पंजीकरण संख्या और हस्ताक्षर अनिवार्य हैं। बिना इसके रिपोर्ट जारी करना कानूनन अपराध है।

​इस पूरे प्रकरण में निम्नलिखित कड़े सवाल खड़े होते हैं:

  1. अवैध संचालन: क्या जे.जे. हॉस्पिटल के पास अल्ट्रासाउंड करने के लिए कोई वैध लाइसेंसधारी सोनोलॉजिस्ट मौजूद है?
  2. जोखिमपूर्ण उपचार: गलत रिपोर्ट के आधार पर मरीज को दी गई दवाएं क्या उसकी जान के लिए खतरा नहीं थीं?
  3. प्रशासनिक संरक्षण: क्या इस अस्पताल को किसी का संरक्षण प्राप्त है जो शिकायत के बावजूद अभी भी बेखौफ काम कर रहा है?

​प्रशासन से न्याय की मांग

​पीड़ित ने जिलाधिकारी, एसएसपी और मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) को शिकायती पत्र सौंपकर मांग की है कि जे.जे. हॉस्पिटल और डॉ. अनिल कुमार चौधरी के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता (BNS) की सुसंगत धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की जाए। पीड़ित ने मांग की है कि ऐसे अस्पतालों को सील किया जाए जो मरीजों की जिंदगी को ‘फार्मास्युटिकल जुआ’ बना चुके हैं।

बस्ती का नागरिक समाज अब सड़कों पर उतरने की तैयारी में है। देखना यह है कि क्या प्रशासन इस ‘हॉस्पिटल माफिया’ पर कार्रवाई करेगा या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?

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