लावारिस बैग में 17 लाख का जहर: क्या बस्ती स्टेशन तस्करों का ‘सेफ कॉरिडोर’ बन चुका है?
बस्ती रेलवे स्टेशन का 'नशा कनेक्शन': 17 किलो गांजे के साथ बेखौफ तस्कर, सुरक्षा एजेंसियां बनीं मूकदर्शक!
अजीत मिश्रा (खोजी)
बस्ती रेलवे स्टेशन बना नशेडियों का अड्डा: जनरल कोच में 17 किलो गांजा लावारिस मिला, तो तस्करों की ‘सेफ पैसेज’ पर सवाल
ब्यूरो रिपोर्ट | बस्ती
- रेलवे की ‘सुरक्षा’ फेल: जनरल कोच से 17 किलो गांजा बरामद, तस्करों की पहुंच पर उठे सवाल!
- 17 किलो गांजा, 17 लाख कीमत, और शून्य गिरफ्तारी: क्या ऐसे नशा मुक्त होगा बस्ती?
- बस्ती रेलवे स्टेशन पर तस्करों का आतंक: सघन चेकिंग के दावों के बीच खुलेआम चल रहा मादक पदार्थों का धंधा!
बस्ती: रेलवे कोच बना तस्करी का अड्डा, 17 किलो गांजा बरामद।सुरक्षा घेरा तोड़कर पहुंची 17 किलो गांजे की खेप, पुलिस के हाथ सिर्फ ‘लावारिस बैग’। तस्करी के गढ़ में तब्दील हो रहा बस्ती रेलवे स्टेशन?
बस्ती रेलवे स्टेशन अब यात्रियों की सुरक्षा का केंद्र कम और मादक पदार्थों की तस्करी का ‘सेफ कॉरिडोर’ अधिक नजर आने लगा है। शुक्रवार रात आरपीएफ और जीआरपी की संयुक्त टीम ने ट्रेन संख्या 15565 के जनरल कोच से 17 किलो गांजा बरामद कर अपनी पीठ तो थपथपा ली, लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिर 17 लाख रुपये की यह खेप स्टेशन तक पहुंची कैसे? क्या सुरक्षा एजेंसियों की नाक के नीचे से तस्करों का यह नेटवर्क बेखौफ फल-फूल रहा है?

सुरक्षा तंत्र की विफलता या मिलीभगत?
17 किलो गांजे का लावारिस मिलना यह साबित करता है कि तस्करों को कानून का रत्ती भर भी डर नहीं है। हैरानी की बात यह है कि इतनी बड़ी मात्रा में मादक पदार्थ ट्रेन के भीतर पहुंच जाता है और किसी को भनक तक नहीं लगती। क्या सीसीटीवी कैमरे केवल शोपीस बनकर रह गए हैं? या फिर स्टेशन पर तैनात सुरक्षाकर्मियों की चौकसी केवल औपचारिकता मात्र है? लावारिस बैग मिलने का मतलब है कि तस्करों को सुरक्षा घेरा भेदने में कोई खास मशक्कत नहीं करनी पड़ी।
युवा पीढ़ी को जहर बांटने का खेल
अंतरराष्ट्रीय बाजार में 17 लाख रुपये की कीमत रखने वाला यह गांजा अगर बाजार में खप जाता, तो न जाने कितने घरों के चिराग बुझ जाते। रेलवे प्रशासन अक्सर ‘सघन तलाशी अभियान’ का ढोल पीटता है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि बस्ती स्टेशन से गुजरने वाली ट्रेनों का इस्तेमाल नशा माफिया बेधड़क कर रहे हैं।
जांच के नाम पर केवल खानापूर्ति?
आरपीएफ इंस्पेक्टर मिर्जा राशिद बेग और उनकी टीम ने बरामदगी के बाद मामले को जीआरपी को सौंप दिया है और जांच शुरू होने का रटा-रटाया बयान जारी कर दिया है। लेकिन, बस्ती की जनता को केवल बयान नहीं, परिणाम चाहिए। सवाल यह है कि:
- ट्रेन में चढ़ने से पहले बैग की जांच क्यों नहीं हुई?
- इस खेप को भेजने वाला मास्टरमाइंड कौन है और उसे बस्ती में रिसीव कौन करने वाला था?
- क्या तस्करों के इस नेटवर्क में किसी अंदरूनी व्यक्ति का हाथ है?
अधिकारियों की चुप्पी पर उठे सवाल
यह कोई पहली बार नहीं है जब बस्ती में मादक पदार्थ बरामद हुए हैं। यदि सुरक्षा एजेंसियां वाकई गंभीर हैं, तो वे तस्करों को पकड़ने में नाकाम क्यों हैं? केवल ‘लावारिस’ माल बरामद कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेना इस बात का संकेत है कि असली तस्कर अभी भी कानून की पकड़ से दूर हैं।
बस्ती की जनता अब यह देखना चाहती है कि क्या पुलिस इस तस्करी के तार कहां तक जुड़े हैं, इसका पर्दाफाश करेगी या फिर यह मामला भी पुरानी फाइलों में दबकर रह जाएगा। समय आ गया है कि रेलवे और पुलिस प्रशासन अपनी कार्यशैली में सुधार करे, अन्यथा बस्ती स्टेशन नशेडियों का सुरक्षित अड्डा बन जाएगा।
क्या पुलिस के ‘सघन अभियान’ महज कागजी खानापूर्ति हैं? क्या तस्करों तक पहुंचने में पुलिस नाकाम है? बस्ती की जनता को अब जवाब चाहिए!








