“विधायक जी का मंच और हिस्ट्रीशीटर का मान: क्या यही है पार्टी का असली ‘सम्मान’?”
"मंच पर 'गैंगस्टर', कुर्सियों पर 'कार्यकर्ता': सत्ता के गलियारों में क्या यही है लोकतंत्र की नई परिभाषा?" "अपराधियों को 'VIP' ट्रीटमेंट, वफादार कार्यकर्ताओं का अपमान; बस्ती की राजनीति में मचा घमासान!"
अजीत मिश्रा (खोजी)
सियासत का ‘अपराधीकरण’ और कार्यकर्ताओं का अपमान: क्या यही है 2027 की तैयारी?
- “मंच की शोभा बढ़ा रहे ‘हिस्ट्रीशीटर’: विधायक जी के ‘अच्छे दिन’ या सिद्धांतों का अंतिम संस्कार?”
- “साफ-सुथरी राजनीति का ढोंग या अपराधियों का दबदबा? जनता पूछ रही है—आखिर ‘मंच’ किसका है?”
- “दरी बिछाने वाला बाहर, घर फूंकने वाला मंच पर; बदल रही है पार्टी की ‘रीति-नीति’!”
- “अपराधियों का संरक्षण: पार्टी की साख पर लगा ‘हिस्ट्रीशीटर’ का दाग!”
- “विधायक जी के मंच पर ‘डकैत’: सवालों के घेरे में 2027 की सियासी बिसात।”
- “संगठन की नींव vs अपराधियों का प्रभाव: शर्मसार हुई राजनीतिक मर्यादा।”
बस्ती। राजनीति में मंच, सिद्धांतों और मूल्यों का प्रतीक माना जाता है, लेकिन बस्ती से सामने आई एक हालिया तस्वीर ने इन मूल्यों को तार-तार कर दिया है। एक सरकारी कार्यक्रम के दौरान भाजपा विधायक के मंच पर एक ऐसे व्यक्ति का ‘सम्मानजनक’ स्थान प्राप्त करना, जिसका नाम पुलिस रिकॉर्ड में ‘हिस्ट्रीशीटर’ के रूप में दर्ज है, न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि सत्ता पक्ष की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिन्ह भी खड़ा करता है।
मंच पर ‘हिस्ट्रीशीटर’, सामने समर्पित कार्यकर्ता
घटनाक्रम का केंद्र वह मंच है जहाँ बिजली विभाग के एक उपकेंद्र का लोकार्पण हो रहा था। प्रोटोकॉल के अनुसार, वहां स्थानीय जनप्रतिनिधियों और गणमान्य नागरिकों को होना था। लेकिन, मंच की गरिमा तब कलंकित हो गई जब वहां ‘हिस्ट्रीशीटर’ रणजीत सिंह उर्फ खनन सिंह को प्रमुखता से बैठाया गया।
विडंबना देखिए कि उसी मंच के सामने प्लास्टिक की कुर्सियों पर वे समर्पित कार्यकर्ता बैठे थे, जिन्होंने वर्षों से पार्टी के लिए अपनी जवानी, समय और संसाधन झोंक दिए। यह दृश्य उन कार्यकर्ताओं के लिए एक तमाचे जैसा था जिन्होंने राम जन्मभूमि आंदोलन से लेकर संगठन को सींचने तक में अपनी अहम भूमिका निभाई है।
दागदार अतीत और ‘अपराधी’ की सूची
जिस व्यक्ति को मंच का ‘अतिथि’ बनाया गया, उसका आपराधिक इतिहास किसी से छिपा नहीं है। आरटीआई के तहत दुबौलिया थाने से प्राप्त जानकारी के अनुसार, रणजीत सिंह और उसके तीन बेटों के खिलाफ गंभीर धाराओं में मुकदमे दर्ज हैं। इसमें डकैती, एससी-एसटी एक्ट के तहत उत्पीड़न और घर जलाने जैसे घिनौने कृत्य शामिल हैं। थाना रिकॉर्ड में दर्ज ‘हिस्ट्रीशीटर संख्या 274’ और ‘गैंगस्टर एक्ट 104/98’ का आरोपी व्यक्ति यदि सत्ताधारी पार्टी के मंच पर विराजमान हो, तो यह उस पार्टी की ‘शून्य टॉलरेंस’ (Zero Tolerance) की नीति को कटघरे में खड़ा करता है।
सवाल विधायक जी से: क्या यह ‘अज्ञानता’ है या ‘मजबूरी’?
इस पूरे प्रकरण पर सबसे बड़ा सवाल बस्ती के स्थानीय विधायक की भूमिका पर उठ रहा है। क्या एक जनप्रतिनिधि को यह नहीं मालूम होता कि उनके मंच पर कौन बैठ रहा है?
- यदि उन्हें मालूम था, तो यह गंभीर नैतिक विचलन है।
- यदि नहीं मालूम था, तो यह उनकी सुरक्षा व्यवस्था और स्थानीय खुफिया तंत्र की विफलता है।
अक्सर नेता ऐसे मामलों में “अनजान होने” का बहाना बनाकर किनारा कर लेते हैं। लेकिन, जब मंच पर चुनिंदा लोग हों और उनमें से एक कुख्यात अपराधी हो, तो जनता इस बहाने को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। यह ‘अनजान’ रहने का मामला कम और अपराधियों को संरक्षण देने का संदेश ज्यादा लगता है।
संगठन की नींव बनाम अवसरवाद की इमारत
राजनीति का इतिहास गवाह है कि दल अपनी विचारधारा और संघर्षशील कार्यकर्ताओं के बल पर बड़े होते हैं। लेकिन जब संगठन में ‘समर्पण’ से ज्यादा ‘प्रभाव’ और ‘भय’ का महत्व बढ़ने लगे, तो इसका परिणाम पार्टी के लिए आत्मघाती होता है। एक तरफ वह कार्यकर्ता है जो झंडा ढोता है, दरी बिछाता है और बिना किसी स्वार्थ के पार्टी के लिए पसीना बहाता है, और दूसरी तरफ वह ‘बाहुबली’ है जिसे मंच पर बिठाकर अपनी ‘ताकत’ का प्रदर्शन किया जाता है।
2027 का चुनाव और जनता का आक्रोश
वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव नजदीक हैं। इस घटना ने आम जनता के मन में यह सवाल पैदा कर दिया है कि क्या पार्टी वास्तव में अपराधियों से मुक्ति चाहती है? यदि मंचों पर अपराधी इसी तरह शोभा बढ़ाते रहेंगे, तो पार्टी का ‘स्वच्छ छवि’ का दावा खोखला साबित होगा। जनता अब सिर्फ भाषण नहीं सुनती, वह नेताओं के आचरण और उनके साथ खड़े लोगों को भी परखती है।
यह घटना न केवल भाजपा के लिए आत्ममंथन का विषय है, बल्कि यह उन तमाम राजनीतिक दलों के लिए चेतावनी है जो अपनी नैतिकता को भूलकर केवल जीत के गणित में अपराधियों को गले लगा रहे हैं। यदि समय रहते संगठन ने ऐसे तत्वों से दूरी नहीं बनाई, तो आने वाले समय में कार्यकर्ताओं का मोहभंग होना निश्चित है, जो पार्टी के लिए अपूरणीय क्षति साबित होगा।
क्या आपको लगता है कि राजनीतिक पार्टियों को अपनी छवि सुधारने के लिए सार्वजनिक मंचों पर अपराधियों के साथ फोटो खिंचवाने वाले नेताओं पर सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई करनी चाहिए?










