उत्तर प्रदेशबस्ती

वर्दी का शर्मनाक कारनामा: उपनिरीक्षक ने मुर्दे से लिखवाया बयान, अदालत ने लगाई फटकार

न्याय का मजाक: 15 महीने पहले मृत महिला का पुलिस ने दर्ज किया फर्जी बयान मुंडेरवा पुलिस की पोल-पट्टी: थाने में बैठकर लिखी गई 'फर्जी जाँच', अदालत ने दिए कार्रवाई के आदेश

अजीत मिश्रा (खोजी)

खाकी की साख पर लगा बड़ा दाग: जब मुर्दे ने दी गवाही, तो पुलिस की ‘जाँच’ पर उठे गंभीर सवाल

  • खाकी की लापरवाही या साजिश? मृतका के नाम पर पेश किया गया झूठा साक्ष्य, अदालत ने माना गंभीर अपराध
  • अदालत का कड़ा प्रहार: झूठी जाँच आख्या पेश करने वाले उपनिरीक्षक पर गिर सकती है गाज

बस्ती। न्याय के मंदिर में जब पुलिस की ओर से पेश किए गए सबूतों की पोल खुलती है, तो पूरे तंत्र पर भरोसा करना मुश्किल हो जाता है। मुंडेरवा थाने से जुड़ा एक हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है, जहाँ एक उपनिरीक्षक ने अपनी जाँच रिपोर्ट को सही साबित करने के लिए मृत महिला का ही ‘बयान’ दर्ज करा दिया। यह मामला न केवल पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है, बल्कि न्याय व्यवस्था के साथ किए गए खिलवाड़ का एक जीता-जागता उदाहरण है।

क्या है पूरा मामला?

बेहित गाँव के निवासी ओमप्रकाश ने सात लोगों के खिलाफ न्यायालय में एक परिवाद दाखिल किया था। मामले की गंभीरता को देखते हुए न्यायालय (सिविल जज, एफटीसी, न्यायाधीश शुभम द्विवेदी) ने 10 फरवरी 2026 को मुंडेरवा थानाध्यक्ष को इस मामले की गहन जाँच करने का आदेश दिया था।

इस आदेश के अनुपालन में, थाने में तैनात उपनिरीक्षक जावेद अहमद ने 10 मार्च 2026 को न्यायालय में अपनी जाँच रिपोर्ट (आख्या) पेश की। इस रिपोर्ट में उन्होंने बाकायदा गवाहों के बयान भी शामिल किए थे।

जब अदालत में खुली झूठ की परत

जाँच रिपोर्ट के अवलोकन के दौरान न्यायालय ने पाया कि उपनिरीक्षक ने अपनी रिपोर्ट को पुख्ता दिखाने के लिए वादी की पत्नी विंध्यवासिनी का बयान भी दर्ज कराया था। लेकिन, जब मामले की सुनवाई के दौरान विपक्षी पक्ष के प्रहलाद ने आपत्ति दर्ज कराई, तो सच्चाई सामने आ गई।

प्रहलाद ने अदालत को सबूतों के साथ अवगत कराया कि जिस विंध्यवासिनी के बयान को उपनिरीक्षक ने 10 मार्च 2026 को दर्ज होना बताया, उसकी मृत्यु तो 26 नवंबर 2024 को ही हो चुकी थी। विपक्ष ने इसके प्रमाण के तौर पर मृतका के वारिसान से संबंधित मुकदमे के दस्तावेज भी पेश किए।

जावेद खान की कार्यशैली को लेकर जो तथ्य सामने आए हैं, वे चौंकाने वाले हैं। आरोप है कि उसने निजी स्वार्थ और विपक्षियों से मिलीभगत के चलते एक निर्दोष व्यक्ति को सुनियोजित तरीके से फंसाने की साजिश रची। जिस व्यक्ति को ‘जिला बदर’ करने की पूरी पटकथा जावेद ने तैयार की थी, उसका पूर्व का रिकॉर्ड इतना साफ था कि उस पर कभी शांति भंग (धारा 151) तक का चालान नहीं हुआ था। विपक्षियों से धन उगाही कर किसी निर्दोष के जीवन को बर्बाद करने का यह कृत्य खाकी की विश्वसनीयता पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह है।

कमिश्नर कोर्ट से मिली राहत, सच्चाई की हुई जीत

जब जावेद खान के अत्याचार सीमा पार कर गए, तो पीड़ित व्यक्ति ने न्याय के लिए कमिश्नर कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अपनी निष्पक्ष सुनवाई में कमिश्नर कोर्ट ने पुलिस की मनमानी कार्यवाही को संज्ञान में लिया और जिला बदर की प्रक्रिया पर तुरंत ‘स्टे’ (रोक) लगा दिया। यह उस पीड़ित के लिए एक बड़ी राहत थी जिसे पुलिसिया तंत्र द्वारा गलत तरीके से फंसाया जा रहा था।

कोर्ट का सख्त रुख: मुकदमा दर्ज करने के आदेश

मामले की गंभीरता को देखते हुए अब अदालत ने कड़ा रुख अपनाया है। एक मृतक महिला का बयान दर्ज करने के बाद, न्यायालय ने जावेद खान के विरुद्ध मुकदमा दर्ज करने के स्पष्ट आदेश दिए हैं। इसके साथ ही, अदालत ने मुंडेरवा थानाध्यक्ष को तलब कर मामले से जुड़ी विस्तृत रिपोर्ट पेश करने को कहा है।

खाकी पर उठते सवाल

यह मामला केवल एक पुलिसकर्मी की करतूत नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था पर सवाल है जहाँ जनता अपनी सुरक्षा की उम्मीद लेकर जाती है। जब रक्षक ही भक्षक बन जाए और वर्दी का उपयोग निजी रंजिश निकालने के लिए किया जाने लगे, तो आम आदमी कहां जाए? न्यायालय के इस हस्तक्षेप से यह उम्मीद जगी है कि कानून के दुरुपयोग करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। देखना यह होगा कि इस मामले में विभाग द्वारा क्या ठोस कार्यवाही की जाती है और क्या पीड़ित को पूर्ण न्याय मिल पाता है।

पुलिस की ‘मेहनत’ या महज खानापूर्ति?

इस खुलासे के बाद न्यायालय ने उपनिरीक्षक के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने इसे सामान्य चूक नहीं, बल्कि ‘गंभीर लापरवाही’ माना है। इस मामले में मुख्य रूप से दो बड़े सवाल उठते हैं:

  • थाने में बैठकर जाँच: क्या पुलिसकर्मी ने बिना मौके पर जाए और बिना किसी पड़ताल के थाने में बैठकर ही मनगढ़ंत बयान लिख दिए?
  • अनुचित लाभ का खेल: विपक्षी का आरोप है कि उपनिरीक्षक ने अनुचित लाभ लेकर और मनमाने तरीके से गवाहों के नाम जोड़कर एक फर्जी जाँच आख्या तैयार की है।

न्याय का तकाजा क्या है?

अदालत ने इस मामले को संज्ञान में लेते हुए संबंधित उपनिरीक्षक के खिलाफ कार्रवाई का कड़ा आदेश पारित किया है। एक महिला की मौत के डेढ़ साल बाद उसके नाम से फर्जी बयान तैयार कर उसे अदालत में सबूत के तौर पर पेश करना कानून के रक्षकों के लिए शर्म की बात है।

अब सवाल यह है कि वर्दी के रसूख तले दबे ऐसे अधिकारियों पर क्या केवल विभागीय कार्रवाई ही होगी, या फिर उनके खिलाफ जालसाजी और न्याय प्रक्रिया को गुमराह करने के लिए कानूनी कार्यवाही भी की जाएगी? यह मामला केवल एक उपनिरीक्षक की गलती नहीं, बल्कि पुलिस व्यवस्था में व्याप्त उस भ्रष्टाचार का आईना है जो न्याय के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है।

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