
बस्ती स्वास्थ्य विभाग का भ्रष्टाचार: क्या लखनऊ दरबार में होगा शिकायतों का निपटारा?
सील हुए सेंटरों का अवैध संचालन: क्या डिप्टी सीएमओ डा. एके चौधरी दे रहे हैं संरक्षण? जिले में नहीं हुई सुनवाई, तो फरियादी ने खटखटाया लखनऊ का दरवाजा
अजीत मिश्रा (खोजी)
प्रशासनिक विफलता का चेहरा: जब आम आदमी को ‘दरबार’ तक जाना पड़े
- स्वास्थ्य विभाग में भ्रष्टाचार का नंगा नाच: लखनऊ तक पहुँची उमेश गोस्वामी की ‘लड़ाकू’ हुंकार
- ‘डिप्टी’ सीएम ‘तक’ पहुंचा ‘लड़ाकू’ उमेश ‘गोस्वामी’। भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत और सील तोड़ने का खेल: उमेश गोस्वामी की सीधी चुनौती
बस्ती। जब एक नागरिक को अपनी समस्या लेकर सूबे की राजधानी लखनऊ तक की दौड़ लगानी पड़े, तो यह उस जिले के प्रशासन की ‘हार’ और ‘भ्रष्टाचार’ की जीत का सबसे बड़ा सबूत है। उमेश गोस्वामी का संघर्ष इस बात का जीता-जागता उदाहरण है कि कैसे स्थानीय स्तर पर जिम्मेदारों ने अपनी आँखें और कान बंद कर रखे हैं।स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के तमाम दावों के बीच बस्ती का स्वास्थ्य विभाग एक बार फिर सवालों के घेरे में है। स्थानीय स्तर पर सुनवाई न होने से तंग आकर उमेश गोस्वामी और गंगाराम यादव जैसे जागरूक नागरिकों ने अब सीधे सूबे के डिप्टी सीएम और स्वास्थ्य मंत्री ब्रजेश पाठक के दरबार का रुख किया है।
स्थानीय सिस्टम पर गहराते सवाल
उमेश गोस्वामी और गंगाराम यादव जैसे लोग व्यवस्था के लिए ‘लड़ाकू’ हो सकते हैं, लेकिन असल में वे उस आम आदमी की आवाज हैं जिसे जिला प्रशासन ने लाचार बना दिया है। यदि डीएम और सीएमओ स्तर पर समस्याओं का समाधान मिल जाता, तो किसी को डिप्टी सीएम (स्वास्थ्य मंत्री) के दफ्तर तक फरियाद लेकर जाने की ज़रूरत क्यों पड़ती? यह स्थानीय अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह है।यह स्थिति प्रशासनिक विफलता की पराकाष्ठा है कि आम नागरिक को अपनी समस्या के समाधान के लिए जिले की सीमाओं से बाहर लखनऊ तक दौड़ लगानी पड़ रही है। यदि जिले के डीएम और सीएमओ स्तर पर समस्याओं का निस्तारण समय रहते हो जाता, तो फरियादियों को इतनी दूर जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। इसे स्थानीय अधिकारियों की पूरी तरह से विफलता के रूप में देखा जा रहा है।
भ्रष्टाचार का मकड़जाल
आरोप बेहद गंभीर हैं। ‘भारत अल्ट्रासाउंड सेंटर’ और ‘सिटी सेंटर’ जैसे केंद्रों का बार-बार सील होने के बावजूद फिर से खुल जाना, सीधे तौर पर प्रशासनिक मिलीभगत की ओर इशारा करता है। आरोप है कि डिप्टी सीएमओ डा. एके चौधरी ने मोटी रकम लेकर इन केंद्रों को संरक्षण दिया और सील तोड़ने तक की छूट दे दी। हद तो तब हो गई जब दो बार सील हो चुके सेंटर को नाम बदलकर फिर से पंजीकृत करने की चाल चली जा रही है।
उमेश गोस्वामी ने स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों और सेंटरों पर कई संगीन आरोप लगाए हैं:
- अवैध संरक्षण: आरोप है कि डिप्टी सीएमओ डा. एके चौधरी ने मोटी रकम लेकर नियमों को ताक पर रखकर अवैध सेंटरों को संरक्षण दिया है।
- सेंटरों का गोरखधंधा: शाह आलम के ‘सिटी सेंटर’ पर आरोप है कि उसने पेट में मृत बच्चे को भी ‘नॉर्मल’ बताकर अल्ट्रासाउंड किया।
- सील के बावजूद खेल: लालगंज कुदरहा मार्ग स्थित ‘भारत अल्ट्रासाउंड सेंटर’, जिसके मालिक मोहम्मद दानिश हैं, को दो बार मजिस्ट्रेट द्वारा सील किया गया था। आरोप है कि डा. एके चौधरी के कहने पर सील तोड़कर मशीन बाहर निकाल ली गई।
- नाम बदलकर पंजीकरण: जो केंद्र दो बार सील हो चुके हैं, उन्हें नाम बदलकर पुनः पंजीकृत करने का प्रयास किया जा रहा है।
क्या मौन ही प्रशासन का जवाब है?
27 जून 2026 को की गई शिकायतों पर डीएम कार्यालय की चुप्पी क्या किसी बड़े खेल का संकेत है? जब जनता का भरोसा स्थानीय तंत्र से उठ जाता है, तब वह लखनऊ का रुख करती है। उमेश गोस्वामी की यह लंबी दौड़ प्रशासन के लिए चेतावनी है कि जनता अब और चुप रहने वाली नहीं है।उमेश गोस्वामी ने इन मामलों की शिकायत 27 जून 2026 को डीएम से की थी, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। उनका कहना है कि डिप्टी सीएमओ के संरक्षण के कारण इन सेंटर संचालकों का हौसला बुलंद है। अब मांग की जा रही है कि उच्च स्तरीय टीम बनाकर इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो और डा. एके चौधरी तथा सेंटर मालिकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।
अब वक्त आ गया है कि इन भ्रष्ट अधिकारियों और नियमों को ताक पर रखने वाले सेंटरों के खिलाफ उच्च स्तरीय टीम बनाकर कार्रवाई की जाए। क्या प्रशासन अब भी कुंभकर्णी नींद में सोता रहेगा, या जनता की इस ‘लड़ाकू’ आवाज को कोई ठोस परिणाम मिलेगा?
















