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उत्तर प्रदेशबस्ती

वन विभाग में ‘ईमानदारी’ की कीमत 50 फीसदी कमीशन: क्या यही है सरकारी विकास का सच?

कागजों में 'विश्व रिकॉर्ड', धरातल पर हरियाली गायब: वन विभाग के भ्रष्टाचार का कच्चा-चिट्ठा 'रेंजर मैडम' का फरमान, 50% कमीशन दो वरना नौकरी छोड़ो: वन विभाग में भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा

अजीत मिश्रा (खोजी)

वन विभाग का ‘हरित’ भ्रष्टाचार: कागजों में पेड़, धरातल पर घपला!

  • पौधों की चोरी, कमीशन की होड़: वन विभाग में चल रहा ‘अवैध कमाई’ का संगठित धंधा
  • ईमानदार कर्मचारियों के लिए ‘सजा’ और भ्रष्टाचारियों को संरक्षण: वन विभाग की काली सच्चाई
  • फर्जी बिलों का जाल और 26 लाख का घोटाला: वन विभाग की ‘हरियाली’ पर भ्रष्टाचार का ग्रहण

​जब हम ‘वन विभाग’ का नाम सुनते हैं, तो मन में हरियाली और पर्यावरण संरक्षण की एक सुखद तस्वीर उभरती है। लेकिन, रिपोर्ट इस विभाग के पीछे छिपे उस काले सच को उजागर करती है, जो हरियाली के नाम पर जनता के खून-पसीने की कमाई को दीमक की तरह चाट रहा है।पर्यावरण संरक्षण का जिम्मा संभालने वाला वन विभाग अब खुद भ्रष्टाचार के ऐसे दलदल में फंसा है, जहाँ ईमानदारी की सजा भुगतनी पड़ती है। हाल ही में सामने आए तथ्यों के अनुसार, वन विभाग के निचले स्तर के कर्मचारियों, विशेषकर वन रक्षकों और वन दरोगाओं से कथित तौर पर 50 प्रतिशत कमीशन वसूला जा रहा है।

ईमानदारी की ‘सजा’ और कमीशन का ‘खेल’

​यह कल्पना से परे है कि एक विभाग में ईमानदारी को ‘अपराध’ माना जाने लगे। रिपोर्ट के अनुसार, वन रक्षक और वन दरोगा को अपने काम के बदले ‘रेंजर मैडम’ को 50 प्रतिशत कमीशन देना पड़ता है। यदि वे ऐसा नहीं करते, तो उन्हें निलंबन और तबादले का भय दिखाया जाता है। यह कमीशन कोई छोटी-मोटी रकम नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार की वह नींव है जिस पर विभाग के अधिकारी अपना साम्राज्य खड़ा कर रहे हैं।

​वन विभाग के भीतर चल रहा कमीशन का खेल किसी बड़े संगठित अपराध से कम नहीं है।

  • ​सूत्रों के अनुसार, वन रक्षकों और वन दरोगाओं को अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करने के बदले अपनी ही जेब से 50 प्रतिशत कमीशन देना पड़ता है।
  • ​यदि कोई कर्मचारी इस कमीशन को देने से मना करता है, तो उसे तत्काल प्रभाव से निलंबन, तबादले या ‘अटैच’ किए जाने का भय दिखाया जाता है।
  • ​चूंकि वेतन से कमीशन देना संभव नहीं होता, इसलिए कर्मचारी वृक्षारोपण जैसे कार्यों में घपला करने को मजबूर होते हैं।
  • ​उदाहरण के लिए, अगर 2000 पौधों का लक्ष्य दिया जाता है, तो उसमें से 500 पौधों की चोरी कर उन्हें बेच दिया जाता है, ताकि कमीशन की रकम जुटाई जा सके।

कागजी हरियाली, असलियत में बंजर

​विभाग के कारनामे यहीं नहीं रुकते। सरकारी आंकड़ों के अनुसार जिले में प्रतिवर्ष लगभग 41 लाख पौधे लगाए जा रहे हैं, लेकिन धरातल पर हरियाली का कहीं पता नहीं है। सवाल यह है कि यदि ये करोड़ों पौधे वास्तव में लगे होते, तो आज पूरा जिला जंगल बन चुका होता। सच तो यह है कि विभाग ने केवल ‘विश्व रिकॉर्ड’ बनाने और अपनी जेबें भरने के लिए फर्जी वृक्षारोपण का खेल रचा है।

विभाग के विभागीय आंकड़ों और जमीनी हकीकत में जमीन-आसमान का अंतर है।

  • ​सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, जिले में हर साल लगभग 41 लाख पौधे लगाए जाते हैं।
  • ​पिछले दो वर्षों में कुल दो करोड़ से अधिक पौधे लगाने का दावा किया गया है, लेकिन धरातल पर कहीं भी इन करोड़ों पौधों का अता-पता नहीं है।
  • ​हैरानी की बात यह है कि विभाग ने वृक्षारोपण के बाद पौधों के जीवित रहने की दर 100 प्रतिशत दिखाई है, जो कि पूरी तरह से फर्जीवाड़ा प्रतीत होता है।
  • ​आगामी सत्र 26-27 के लिए भी 44.30 लाख पौधों के रोपण की योजना तैयार कर ली गई है, जबकि पिछली योजनाएं केवल कागजों तक ही सीमित रहीं।

भ्रष्टाचार पर ‘पर्दा’ और फर्जीवाड़े की पराकाष्ठा

​जब ‘राम नगर रेंज’ में फर्जी बिल और जाली हस्ताक्षरों का मामला सामने आया, तो विभाग का असली चेहरा बेनकाब हो गया। मास्टरमाइंड पर कार्रवाई करने के बजाय उसे केवल ‘अटैच’ कर बचा लिया गया, जो यह दर्शाता है कि विभाग में भ्रष्टाचार को संरक्षण देने की एक सोची-समझी नीति काम कर रही है।

भ्रष्टाचार के साक्ष्य सामने आने के बावजूद विभाग के आला अधिकारी कार्रवाई करने के बजाय लीपापोती करने में जुटे हैं।

  • ​राम नगर रेंज में फर्जी हस्ताक्षरों और 26 लाख रुपये के फर्जी बिल का मामला सामने आने के बाद हड़कंप मच गया था।
  • ​इस घोटाले के ‘मास्टरमाइंड’ जयशंकर प्रसाद पर बर्खास्तगी की मांग उठने के बावजूद, अधिकारियों ने उन्हें केवल कार्यालय से ‘अटैच’ कर दिया।
  • ​यह स्पष्ट है कि भ्रष्टाचार के इस तंत्र को रेंजर और उच्चाधिकारियों का मौन संरक्षण प्राप्त है।

क्या यह ‘आर्थिक अपराध’ नहीं?

​वन विभाग में भ्रष्टाचार का यह खेल न केवल सरकारी धन की लूट है, बल्कि यह एक गंभीर आर्थिक अपराध है। जो भी ईमानदार कर्मचारी इस व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाता है, विभाग उसे निशाना बनाता है। हरियाली के नाम पर फल-फूल रहा यह ‘कमीशन तंत्र’ आने वाली पीढ़ी के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहा है।

निष्कर्ष:

वन विभाग, जो पर्यावरण का रक्षक होना चाहिए था, आज वह खुद ही ‘आर्थिक अपराध’ का केंद्र बन गया है। हरियाली के नाम पर चल रहा यह फर्जीवाड़ा न केवल सरकारी धन की लूट है, बल्कि आने वाली पीढ़ी के भविष्य के साथ खिलवाड़ भी है। समय आ गया है कि इस भ्रष्टाचार के तंत्र की गहन जांच हो और जिम्मेदार अधिकारियों को उनके कृत्यों की सजा दी जाए, ताकि ‘ईमानदारी’ को विभाग में फिर से जगह मिल सके।

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