उत्तर प्रदेशबस्ती

बस्ती में ‘ज़हर’ का कारोबार: फ़ास्ट फूड के नाम पर परोसी जा रही मौत, प्रशासन मौन!

शहर की सड़कों पर सजे इस मौत के बाजार का भंडाफोड़ होना जरूरी है। क्या बस्ती प्रशासन इस पर लगाम लगाएगा, या फिर इसी तरह किसी बड़े स्वास्थ्य संकट का इंतज़ार किया जाएगा?

अजीत मिश्रा (खोजी)

बस्ती में फास्ट फूड के नाम पर ज़हर का कारोबार, शाम ढलते ही सजती मौत की दुकानें, जिम्मेदार मौन

  • शहर की पटरियों पर ‘अवैध प्रयोगशाला’: क्या पुलिस वेरिफिकेशन के नाम पर बस्ती सुरक्षित है?
  • बाहरी दुकानदारों की फौज और प्रशासन की बेपरवाही, क्या बस्ती बन रही है ‘सॉफ्ट टारगेट’?
  • सावधान बस्ती! शाम होते ही सड़कों पर सजता है बीमारी का बाजार, जिम्मेदार अधिकारी कहाँ हैं?

बस्ती ।। जिसे कभी अपनी सादगी और शुद्धता के लिए जाना जाता था, आज शाम होते ही एक नए धंधे की गिरफ्त में आ जाता है। नगर पालिका क्षेत्र की मुख्य सड़कों, चौराहों, स्कूल-कॉलेजों और अस्पतालों के बाहर सज जाते हैं फास्ट फूड के ठेले। तेज़ आवाज़ में बजता म्यूजिक, चटक रंग की लाइटें और कड़ाही में उबलता काला, बदबूदार तेल – यही है नए बस्ती के स्वाद की हकीकत।

यह फास्ट फूड नहीं, धीमा ज़हर है जो हमारी आने वाली पीढ़ी की नसों में उतारा जा रहा है।

खुले में मौत का तंदूर

इन ठेलों पर न तो ढक्कन है, न सफाई। दिन भर की धूल, गाड़ियों का धुआं, नाली के बगल में रखी चटनी की बाल्टी और उस पर भिनभिनाती मक्खियों और मच्छरों की फौज। समोसा, मोमोज, चाऊमीन, बर्गर, चिकन रोल – सब कुछ उसी एक काले पड़े तेल में बार-बार तल कर परोसा जा रहा है, जिस तेल को देख कर ही उबकाई आ जाए। डॉक्टर बताते हैं कि यही जला हुआ तेल कैंसर, लीवर फेलियर, फूड पॉइजनिंग और पेट की गंभीर बीमारियों की सबसे बड़ी वजह है।

सबसे बड़ा सवाल – ये दुकानें लगती कहाँ हैं? सड़क की पटरी पर, अतिक्रमण कर के। जहाँ पैदल चलना मुश्किल है, वहाँ भट्टी जल रही है।

फूड विभाग की आँखों पर पट्टी क्यों?

हर महीने सैंपलिंग, छापेमारी और लाइसेंस चेकिंग का ढिंढोरा पीटने वाला खाद्य सुरक्षा विभाग इस पूरे खेल से अनजान कैसे है? क्या इन ठेलों के लिए FSSAI लाइसेंस, मेडिकल सर्टिफिकेट या सफाई का कोई मानक नहीं है? हकीकत यह है कि हफ्ता-वसूली और महीनेदारी के आगे विभाग ने आँखें मूँद ली हैं। जब तक कोई बड़ा हादसा नहीं होता, किसी बच्चे की जान नहीं जाती, तब तक साहब की नींद नहीं खुलेगी।

सुरक्षा का सवाल भी अनदेखा नहीं

एक और कड़वा सच जिस पर चुप रहना अपराध है। इनमें से अधिकतर ठेले-खोमचे लगाने वाले गैर जनपद और गैर प्रांतों से आकर यहाँ बसे हैं। न इनका कोई स्थायी पता, न कोई रिकॉर्ड। सवाल सिर्फ फूड पॉइजनिंग का नहीं, शहर की सुरक्षा का भी है। क्या स्थानीय पुलिस के पास इन अस्थायी निवासियों का कोई डाटा है? क्या मकान मालिकों ने किराये पर कमरा या झोपड़ी देने से पहले इनका पुलिस वेरिफिकेशन कराया है? अगर नहीं, तो यह लापरवाही किसी दिन पूरे शहर को भारी पड़ सकती है।

बस्ती को फास्ट फूड नहीं, सेफ फूड चाहिए। प्रशासन को चाहिए कि –

  • नगर पालिका क्षेत्र में सड़क किनारे खुले में खाद्य सामग्री बेचने पर तत्काल रोक लगे।
  • फूड विभाग हर ठेले का सैंपल ले, तेल की जाँच करे और बिना लाइसेंस वालों पर ताला लगाए।
  • पुलिस और LIU संयुक्त अभियान चला कर बाहरी फेरी वालों का सत्यापन करे और मकान मालिकों को वेरिफिकेशन के लिए बाध्य करे।

यह लेख किसी के रोजगार के खिलाफ नहीं, उस लापरवाही के खिलाफ है जो रोजगार के नाम पर पूरे शहर को बीमार बना रही है। अगर आज नहीं बोले तो कल अपने ही बच्चों को अस्पताल के बिस्तर पर देखने को मजबूर होंगे।

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