“क्या पुलिस के पास केवल लाठी है या ‘जिम्मेदारी’ भी? चौखड़ा कांड से उठे गंभीर सवाल”
अधिकारी भले ही अब "निष्पक्ष जांच" और "सख्त कार्रवाई" का रटा-रटाया बयान देकर पल्ला झाड़ लें, लेकिन सवाल उस खोए हुए समय का है जो पुलिस की लापरवाही की भेंट चढ़ गया। गांव में फैली दहशत और तनाव के लिए कौन जिम्मेदार है?
अजीत मिश्रा (खोजी)
संपादकीय: पुलिस की ‘सुस्ती’ ने चौखड़ा में बहाया खून, क्या शिकायतों का ढेर सिर्फ रद्दी का टुकड़ा है?
- “शिकायत के बाद भी क्यों नहीं टला खूनी संघर्ष? चौखड़ा में पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल”
- “थाने में दर्ज ‘शिकायत’ या ‘रद्दी का टुकड़ा’? चौखड़ा हिंसा ने प्रशासन को कटघरे में खड़ा किया”
सिद्धार्थनगर। इटवा थाना क्षेत्र का चौखड़ा गांव आज एक बार फिर चीखों और सिसकियों से गूंज उठा। दो पक्षों के बीच हुई खूनी झड़प में आधा दर्जन लोगों का लहुलुहान होना केवल दो परिवारों की रंजिश का परिणाम नहीं है, बल्कि यह उन वर्दीधारी अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर एक गहरा तमाचा है, जिन्होंने वर्दी की मर्यादा और अपने कर्तव्य से अधिक ‘लापरवाही’ को प्राथमिकता दी।
क्या पुलिस के लिए ‘प्रार्थना पत्र’ महज एक औपचारिकता है?
घटना के तथ्य चीख-चीख कर प्रशासन की पोल खोल रहे हैं। पीड़ित पक्ष ने 14 जुलाई को ही थाने की चौखट पर दस्तक दी थी। एक हफ्ता बीत जाने के बाद भी पुलिस का ‘कान में तेल डालकर सोए रहना’ यह साबित करता है कि जिले में कानून-व्यवस्था की डोर बेहद कमजोर हाथों में है। यदि शिकायत मिलने पर पुलिस ने समय रहते हस्तक्षेप किया होता, तो आज गांव की सड़कों पर खून नहीं बहता और आधा दर्जन लोग अस्पताल के बिस्तर पर नहीं होते।
सुस्त पुलिस, बेलगाम अपराधी
चौखड़ा गांव की यह घटना कोई इकलौती मिसाल नहीं है। आए दिन ऐसी खबरें आती हैं कि पुलिस को पहले से भनक होती है, लेकिन कार्रवाई तब होती है जब कोई बड़ा हादसा हो जाता है। पुलिस का यह “घटना के बाद सक्रिय होना” जनता के मन में यह सवाल पैदा कर रहा है कि आखिर थाने में शिकायत दर्ज कराने का फायदा ही क्या? क्या पुलिस केवल लाशें गिरने या सिर फटने का इंतज़ार करती है?
प्रशासन की जवाबदेही कौन तय करेगा?
अधिकारी भले ही अब “निष्पक्ष जांच” और “सख्त कार्रवाई” का रटा-रटाया बयान देकर पल्ला झाड़ लें, लेकिन सवाल उस खोए हुए समय का है जो पुलिस की लापरवाही की भेंट चढ़ गया। गांव में फैली दहशत और तनाव के लिए कौन जिम्मेदार है?
पुलिस प्रशासन को यह समझना होगा कि उनकी जिम्मेदारी सिर्फ एफआईआर दर्ज करना नहीं, बल्कि अपराध को होने से पहले रोकना है। यदि इटवा पुलिस ने अब भी सबक नहीं लिया, तो चौखड़ा जैसी घटनाओं का सिलसिला थमेगा नहीं। अब वक्त आ गया है कि लापरवाह अधिकारियों पर भी जिम्मेदारी तय हो, ताकि भविष्य में कोई और परिवार पुलिस की सुस्ती की कीमत अपने खून से न चुकाए।
यह घटना एक चेतावनी है—क्या प्रशासन इसे समझेगा या अगली घटना का इंतजार करेगा?



















