
अजीत मिश्रा (खोजी)
खाकी और खादी के साए में पलते भ्रष्टाचार पर एक तमाचा: धनघटा में एंटी करप्शन की रेड
- भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई: काश्तकार कन्हैया लाल की शिकायत पर एंटी करप्शन ब्यूरो ने बिछाया जाल, रंगे हाथों दबोचा गया आरोपी लेखपाल।
- तहसील परिसर में हड़कंप: अचानक हुई इस कार्रवाई से राजस्व विभाग और कर्मचारियों में मचा कोहराम, कानूनी कार्रवाई में जुटी टीम।
उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में भ्रष्टाचार अब कोई छिपी हुई बात नहीं रह गई है, बल्कि यह आम आदमी की रोजाना की जिंदगी का एक ऐसा कड़वा सच बन चुका है जिसके बिना सरकारी दफ्तरों का पहिया हिलता ही नहीं। ताजा मामला संत कबीर नगर जिले की धनघटा तहसील का है, जहां एंटी करप्शन ब्यूरो की टीम ने चकबंदी लेखपाल अभय सिंह को 10,000 रुपये की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार किया है। यह कार्रवाई सिर्फ एक भ्रष्ट कर्मचारी की गिरफ्तारी नहीं है, बल्कि उस सड़ी-गली व्यवस्था पर करारा प्रहार है जो जनता के खून-पसीने की कमाई को दीमक की तरह चाट रही है।
हक की खातिर दर-दर भटकने को मजबूर अन्नदाता
सवाल यह उठता है कि एक साधारण काश्तकार, कन्हैया लाल, को अपने ही वैध काम के लिए एक सरकारी बाबू के आगे गिड़गिड़ाना क्यों पड़ा? क्या सरकार द्वारा तय वेतन इस देश के इन कारिंदों की भूख मिटाने के लिए काफी नहीं है? एक तरफ सरकार पारदर्शी और भ्रष्टाचार मुक्त शासन के बड़े-बड़े दावे करती है, वहीं दूसरी तरफ तहसील स्तर पर बैठे ये छोटे-बड़े अधिकारी आम जनता का शोषण करने का कोई मौका नहीं छोड़ते। कन्हैया लाल जैसे लोग महीनों तक फाइलों के गट्ठर उठाए दर-दर भटकने को मजबूर होते हैं, और अंततः मजबूरी में इन्हें अपनी गाढ़ी कमाई इन भ्रष्टाचारियों की भेंट चढ़ानी पड़ती है।
तहसील परिसरों में पनपता बेखौफ तंत्र
धनघटा तहसील में इस छापेमारी के बाद जो हड़कंप मचा, वह इस बात का सबूत है कि भ्रष्टाचार केवल एक व्यक्ति का कृत्य नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की सह पर फलने-फूलने वाला नासूर है। जब तक ऐसे मामलों में सिर्फ खानापूर्ति के लिए निलंबन या ट्रांसफर का खेल खेला जाएगा, तब तक इन घूसखोरों के मन से कानून का डर खत्म नहीं होगा। जनता का काम करने के लिए तनख्वाह लेने वाले ये नुमाइंदे खुद को उस जमीन का मालिक समझने लगे हैं जिस पर जनता का हक है।
निष्कर्ष और सख्त संदेश
एंटी करप्शन टीम की यह कार्रवाई सराहनीय है और यह उन तमाम लोगों के लिए एक चेतावनी है जो सरकारी कुर्सी को अपनी तिजोरी भरने का जरिया मानते हैं। लेकिन केवल एक लेखपाल के पकड़े जाने से व्यवस्था नहीं सुधरेगी। जरूरत इस बात की है कि ऐसे भ्रष्ट तत्वों के खिलाफ स्पीडी ट्रायल (त्वरित मुकदमे) चलाकर उन्हें ऐसी मिसाल सजा दी जाए कि दोबारा कोई भी बाबू किसी कन्हैया लाल का हक छीनने से पहले सौ बार सोचे। भ्रष्टाचार के इस नासूर को जड़ से उखाड़ने के लिए समाज और शासन दोनों को मिलकर और अधिक कड़े कदम उठाने होंगे।









