
धनबाद : धनबाद के झरिया में अग्निप्रभावित क्षेत्र में रहने वाले लोगों एक बार फिर से आस जगी है.
अग्निप्रभावित क्षेत्र झरिया में लगभग 100 साल से भूमिगत आग लगी हुई है. इस भूमिगत आग के ऊपर हजारों लोग रह रहे हैं. लेकिन अब तक इन लोगों को सुरक्षित बसाने का लक्ष्य पूरा नहीं हो पाया है. एक बार फिर से झरिया मास्टर प्लान के तहत राशि मंजूर करके इनको बसाने की कवायद शुरू की गयी है. जिससे लोगों में नई आस जगी है.
झरिया मास्टर प्लान 2009 में लाया गया था. 2021 तक अग्निप्रभावित और डेंजर जोन में रहने वाले लोगों को विस्थापित करने का लक्ष्य था।लेकिन लंबे समय के प्रयास के बाद भी यह सफल नहीं हो पाई. अब केंद्र सरकार ने झरिया मास्टर प्लान के लिये 5940 करोड़ के राशि की मंजूरी दी है. इसके तहत डेंजर और अग्निप्रभावित क्षेत्र में रहने वाले लोगो को सुरक्षित पुनर्वास, रोजगार के साथ समुचित सुविधा देना है.
सरकार की पहल को लोगों ने सराहा
केंद्र सरकार के इस फैसले को लेकर झरिया के लोग खुशी जाहिर कर रहे हैं. सरकार के इस पहल को सराह रहे हैं. वहीं झरिया डेंजर जोन और अग्निप्रभावित क्षेत्र में रहने वाले लोगों ने कहा कि सरकार का नया प्लान अच्छा है लेकिन घर मुआवजा के साथ रोजगार भी मिलना चाहिए. सिस्टम ऐसा हो जिससे कि उनलोगों को लाभ मिल पाए, फिलहाल वो जहरीले गैस और आग में रह रहे हैं.
वहीं सोशल एक्टिविस्ट पिनाकी राय ने कहा कि सरकार ने इस बार झरिया मास्टर प्लान में मुआवजा की राशि बढ़ाई है. पुनर्वास स्थल में सभी समुचित सुविधा होगा. कौशल विकास के तहत रोजगार भी देने की बात है. सरकार अग्निप्रभावित और डेंजर जोन में रहने वाले लोगों को बसाने का काम करेगी. साथ जो क्षेत्र अग्निप्रभावित नहीं है वहां के लोगों को भी प्लान के तहत फायदा मिले, 5 साल में झरिया स्वर्ग बन सकता है.
समाजसेवी ने कहा कि इस राशि को किसी दूसरी जगह नहीं लगाया जाना चाहिए, जैसे डीएमएफटी की राशि सिर्फ कोयला खनन क्षेत्र के प्रभावित इलाकों में खर्च करनी है. लेकिन इसका उपयोग दूसरे कई विकास कार्यों में किया जा रहा है, यह सरासर गलत है. अगर केबिनेट से मंजूर राशि का उपयोग फिर कहीं दूसरे कार्य में होता है तो यह झरिया के लोगों के साथ सिर्फ छलावा होगा.
संशोधित मास्टर प्लान को मंजूरी
केंद्र सरकार ने बुधवार को झारखंड में झरिया कोयला क्षेत्र में लगी आग से निपटने और प्रभावित परिवारों के पुनर्वास के लिए 5,940 करोड़ रुपये की संशोधित मास्टर प्लान को मंजूरी दी. इस पर फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति ने लिया. संशोधित झरिया मास्टर प्लान (जेएमपी) को मंजूरी दे दी है. संशोधित योजना के कार्यान्वयन के लिए कुल वित्तीय परिव्यय 5,940.47 करोड़ रुपये है. चरणबद्ध दृष्टिकोण यह सुनिश्चित करेगा कि आग और धंसने की घटनाओं से निपटने और प्रभावित परिवारों के पुनर्वास को सबसे कमजोर स्थलों से प्राथमिकता के आधार पर किया जाएगा.
इस संशोधित योजना में पुनर्वासित परिवारों के लिए सतत आजीविका सृजन पर जोर दिया गया है. लक्षित कौशल विकास कार्यक्रम चलाए जाएंगे और पुनर्वासित परिवारों की आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए आय सृजन के अवसर सृजित किए जाएंगे. इसके अलावा, कानूनी शीर्षक धारक परिवारों और गैर-कानूनी शीर्षक धारक परिवारों दोनों को 1 लाख रुपये का आजीविका अनुदान और संस्थागत ऋण पाइपलाइन के माध्यम से 3 लाख रुपये तक की ऋण सहायता तक पहुंच प्रदान की जाएगी.
इसके अलावा, पुनर्वास स्थलों पर व्यापक बुनियादी ढांचे और आवश्यक सुविधाएं- जैसे सड़क, बिजली, पानी की आपूर्ति, सीवरेज, स्कूल, अस्पताल, कौशल विकास केंद्र, सामुदायिक हॉल और अन्य सामान्य सुविधाएं विकसित की जानी हैं. इन प्रावधानों को संशोधित झरिया मास्टर प्लान के कार्यान्वयन के लिए समिति की सिफारिशों के अनुसार लागू किया जाएगा, जिससे समग्र और मानवीय पुनर्वास दृष्टिकोण सुनिश्चित होगा.
आजीविका समर्थन उपायों के हिस्से के रूप में, आजीविका से संबंधित गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए एक समर्पित झरिया वैकल्पिक आजीविका पुनर्वास कोष की स्थापना की जाएगी. क्षेत्र में संचालित बहु कौशल विकास संस्थानों के सहयोग से कौशल विकास पहल भी की जाएगी. धनबाद जिला में आग, धंसाव और पुनर्वास से निपटने के लिए झरिया मास्टर प्लान को केंद्र ने अगस्त 2009 में मंजूरी दी थी. जिसमें 10 साल की कार्यान्वयन अवधि और दो साल की पूर्व-कार्यान्वयन अवधि थी, जिसमें 7,112.11 करोड़ रुपये का अनुमानित निवेश था.
2021 में समाप्त हो गई थी योजना
झरिया कोलफील्ड में कोयला खदानें 1916 से हैं, जब आग की पहली घटना की सूचना मिली थी. इसके बाद से ओवरबर्डन मलबे के भीतर कई आग लग चुकी हैं. राष्ट्रीयकरण से पहले ये खदानें निजी स्वामित्व वाली थीं और लाभ-संचालित दृष्टिकोण से संचालित होती थीं. जिसमें खनन के तरीके अवैज्ञानिक थे, जिनमें सुरक्षा, संरक्षण और पर्यावरण की कोई चिंता नहीं थी. इस प्रथा के परिणामस्वरूप गंभीर भूमि क्षरण, धंसाव, कोयला खदान में आग और अन्य सामाजिक-पर्यावरणीय समस्याएं हुई हैं.
राष्ट्रीयकरण के बाद झरिया कोयला आग की समस्या का अध्ययन करने के लिए 1978 में एक पोलिश टीम और भारतीय विशेषज्ञों को नियुक्त किया गया. जांच के अनुसार बीसीसीएल की 41 कोयला खदानों में 77 आग की घटनाओं की पहचान की गई. 1996 में केंद्र ने झरिया कोयला क्षेत्रों में आग और धंसाव की समस्याओं की समीक्षा के लिए कोयला सचिव की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया.




