

दुमका जिले के जरमुंडी प्रखंड अंतर्गत झखिया नदी पर स्थित कोर्डिहा डैम आज भी आम लोगों की नजरों से कोसों दूर है। यह डैम न केवल इस क्षेत्र की प्राकृतिक सुंदरता को एक नया आयाम देता है, बल्कि जल संरक्षण और सिंचाई के क्षेत्र में भी चुपचाप क्रांति ला रहा है।
इस जलाशय की सबसे रोचक बात यह है कि इसके निर्माण की सटीक तारीख अब तक स्पष्ट नहीं है। लेकिन कुछ स्थानीय ग्रामीणों से बातचीत के दौरान यह पता चला कि, इस डैम का निर्माण कार्य 2020 के कोरोना लॉकडाउन के दौरान आरंभ हुआ था। और इसका निर्माण कार्य कब पूरा हुआ इसकी सटीक जानकारी उपलब्ध नहीं है। यह समय एक ऐसा समय था जब पूरा देश ठहर गया था। उस कठिन दौर में भी मजदूरों और इंजीनियरों ने विषम परिस्थितियों में डटे रहकर इस परियोजना को आकार दिया। आज कोर्डिहा डैम उसी संकल्प, श्रम और धैर्य का जीवंत उदाहरण बना है। डैम की संरचना ठोस कंक्रीट से की गई है। जिसमें जल प्रवाह नियंत्रित करने हेतु कई अतिप्रवाह मार्ग (स्लिपवे) बनाए गए हैं। तकनीकी दृष्टिकोण से यह एक दक्ष और सुदृढ़ निर्माण है। जो न केवल जल संग्रहण करता है, बल्कि बाढ़ नियंत्रण में भी उपयोगी सिद्ध हो रहा है।प्राकृतिक दृष्टि से देखें तो यह स्थान किसी स्वप्नलोक जैसा प्रतीत होता है। हरे-भरे खेत, बादलों से घिरा आकाश और शांत जलराशि। यह सब मिलकर एक अद्भुत दृश्य रचते हैं, जो इसे पर्यटन की दृष्टि से भी खास बना देता है। कोर्डिहा डैम तक पहुंचने का रास्ता नोनीहाट-बासुकीनाथ मार्ग पर स्थित बैंगनथारा गांव से होकर गुजरता है। हालांकि सड़कों की स्थिति और जागरूकता की कमी के कारण यह डैम अभी तक पर्यटन मानचित्र पर अपनी जगह नहीं बना पाया है। लेकिन इसमें संभावनाओं की कोई कमी नहीं है। आज यह डैम आसपास के खेतों के लिए सिंचाई का एक विश्वसनीय माध्यम बन चुका है। विशेषकर सूखे की स्थिति में यह जलाशय किसानों के लिए जीवनदायिनी साबित हो सकता है। यह जलाशय फसलों को नई जान देने में सक्षम है और खेती को मौसम की मार से बचाने में बड़ी भूमिका निभा रहा है।
जहाँ एक ओर कोर्डिहा डैम अपनी उपयोगिता और सुंदरता से प्रभावित करता है, वहीं दूसरी ओर इसकी प्रसिद्धि में सबसे बड़ी बाधा जानकारी और प्रचार की कमी है। कोर्डिहा डैम एक उदाहरण है उस संभावनाशील ग्रामीण भारत का, जो अब भी अपने भीतर अनेक कहानियाँ और संसाधन समेटे हुए है। आवश्यकता है तो बस उन्हें पहचानने और उभारने की।




