

कांग्रेस के ही सर्वे ने तोड़ी EVM साजिश की स्क्रिप्ट
राहुल गांधी की राजनीति पर जनता का अविश्वास या रणनीतिक भ्रम?
नईदिल्ली/बेंगलुरु। कांग्रेस लंबे समय से चुनावी हार का ठीकरा EVM पर फोड़ती रही है। हर पराजय के बाद मशीनों पर सवाल, संस्थाओं पर अविश्वास और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश — यह राहुल गांधी की राजनीति का एक स्थायी पैटर्न बन चुका है। लेकिन अब कर्नाटक में कांग्रेस से जुड़े सर्वे ने ही इस नैरेटिव की पोल खोल दी है।
जब उसी पार्टी के सर्वे में 85% लोग EVM को भरोसेमंद बता रहे हों, तो सवाल उठता है —
क्या कांग्रेस जनता से कट चुकी है, या फिर वह जानबूझकर अविश्वास की राजनीति कर रही है?
हार की राजनीति और EVM का सहारा
कांग्रेस की दुविधा साफ है।
- जीत मिले तो EVM ठीक
- हार मिले तो EVM संदिग्ध
यह दोहरा रवैया न सिर्फ राजनीतिक नैतिकता पर सवाल उठाता है, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख को भी कमजोर करता है। जनता अब इस रणनीति को समझ चुकी है, जिसका प्रमाण यही सर्वे है।
राहुल गांधी का ‘डाउट पॉलिटिक्स’ मॉडल
राहुल गांधी ने खुद को सिस्टम पर सवाल उठाने वाले नेता के रूप में पेश करने की कोशिश की, लेकिन यह सवाल अब संस्थागत सुधार से ज्यादा संदेह पैदा करने का औजार बन गया है।
EVM, चुनाव आयोग, मीडिया और न्यायपालिका — जब हर संस्था संदिग्ध बताई जाए, तो संदेश साफ जाता है:“अगर हम हारें, तो सिस्टम गलत है।”
BJP को मिला नैरेटिव हथियार
इस सर्वे ने BJP को वही दे दिया जिसकी उसे तलाश थी — तथ्य आधारित पलटवार।
अब BJP यह कहने की स्थिति में है कि EVM पर भरोसा जनता कर रही है, कांग्रेस नहीं।
“राहुल गांधी के गाल पर तमाचा” वाला बयान महज तंज नहीं, बल्कि कांग्रेस की रणनीतिक विफलता का प्रतीक बन गया है।
असली सवाल: कांग्रेस किस पर भरोसा करती है?
अगर कांग्रेस अपने ही सर्वे पर भरोसा नहीं करती, तो वह जनता से भरोसे की उम्मीद कैसे कर सकती है?
लोकतंत्र संदेह से नहीं, विश्वास से चलता है — और यह भरोसा आज कांग्रेस के पक्ष में जाता नहीं दिख रहा।कर्नाटक का यह सर्वे सिर्फ EVM पर जनता का भरोसा नहीं दिखाता,
बल्कि यह भी बताता है कि कांग्रेस की नकारात्मक राजनीति अब उलटी पड़ने लगी है।
राहुल गांधी के सामने अब विकल्प साफ है —
या तो तथ्य स्वीकार करें,
या फिर हर हार के बाद नया बहाना तलाशते रहें।





