बस्ती का ‘ग्रीन’ मिशन: कहीं 44 लाख पौधे ‘वृक्ष-विसर्जन’ न बन जाएं!
बस्ती का 'ग्रीन' मिशन: कहीं 44 लाख पौधे 'वृक्ष-विसर्जन' न बन जाएं! सरकारी लक्ष्य की भेंट चढ़ेंगे 44 लाख पौधे या पनपेगा कोई नया कल? बस्ती में हरियाली का उत्सव: पौधों की सुरक्षा का दम, या सिर्फ खानापूर्ति का गम?
अजीत मिश्रा (खोजी)
44 लाख पौधे: महा-अभियान या महज कागजी अनुष्ठान?
- जिंदा रहने की गारंटी का सवाल: क्या 44 लाख पौधों का सपना बस्ती में साकार होगा?
- वृक्षारोपण अभियान: आंकड़ों की बाजीगरी या पर्यावरण संरक्षण की असली नींव?
बस्ती: 12 जुलाई को बस्ती में 44 लाख पौधे रोपने का सरकारी संकल्प लिया गया है। कलेक्ट्रेट की वातानुकूलित बैठकों में लक्ष्य तय हो गए हैं, अधिकारियों ने अपनी पीठ थपथपा ली है और ‘पर्यावरण संरक्षण’ का संकल्प भी लिया जा चुका है। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये 44 लाख पौधे महज एक दिन का ‘फोटो-ऑप’ (Photo-op) बनकर रह जाएंगे, या वास्तव में बस्ती की धरती पर एक हरित क्रांति की नींव बनेंगे?
सवालों के घेरे में ‘जीवित रहने’ की गारंटी
जिलाधिकारी महोदया ने पौधों के संरक्षण पर जोर तो दिया है, लेकिन इतिहास गवाह है कि सरकारी वृक्षारोपण अभियानों का एक बड़ा हिस्सा ‘वृक्षारोपण’ से ज्यादा ‘वृक्ष-विसर्जन’ में बदल जाता है।
- गड्ढों का खेल: अभियान के चंद दिन पहले आनन-फानन में खोदे गए गड्ढों की गुणवत्ता क्या है? क्या ये पौधे जड़ जमाने लायक मिट्टी पाएंगे, या कंक्रीट और सूखे की भेंट चढ़ जाएंगे?
- पानी का संकट: मानसून का बहाना तो लिया जा रहा है, लेकिन यदि बारिश कम हुई, तो इन लाखों पौधों को पानी पिलाने की क्या कोई पुख्ता व्यवस्था धरातल पर है? टैंकरों की दिखावटी रस्म अदायगी से काम नहीं चलेगा।
- सुरक्षा का सवाल: ट्री-गार्ड का आवंटन होता है, लेकिन जमीन पर वे अक्सर नदारद मिलते हैं। आवारा पशुओं के लिए ये 44 लाख पौधे ‘हरे चारे’ के अलावा कुछ नहीं हैं। क्या विभाग ने उनकी सुरक्षा के लिए कोई ठोस घेराबंदी की है?
- जवाबदेही का सच: जिलाधिकारी ने ‘जवाबदेही’ तय करने की बात कही है। पर पूर्व के अभियानों में कितने अधिकारियों पर गाज गिरी? कितने पौधे आज जीवित हैं? इस पर एक श्वेत पत्र (White Paper) जारी होना चाहिए।
क्या चाहिए प्रशासनिक इच्छाशक्ति?
महज सरकारी विभागों के बीच समन्वय बैठा देने से पर्यावरण नहीं बचता।
- जियो-टैगिंग का दिखावा नहीं, सत्यापन: जो पौधे लगाए जाएं, उनकी जियो-टैगिंग हो, लेकिन उसका वास्तविक भौतिक सत्यापन (Physical Verification) भी होना चाहिए। क्या 6 महीने बाद कोई अधिकारी जाकर देखेगा कि वह पौधा जीवित है या सूख गया?
- स्थानीय भागीदारी: जब तक इन पौधों को स्थानीय निवासियों और ग्राम पंचायतों की ‘संपत्ति’ नहीं बनाया जाएगा, तब तक यह सरकारी बोझ ही रहेगा।
- पौधों की प्रजाति का चयन: क्या केवल संख्या बढ़ाने के चक्कर में ऐसी प्रजातियां तो नहीं थोपी जा रही हैं जो स्थानीय जलवायु के अनुकूल ही नहीं हैं?
निष्कर्ष
44 लाख का आंकड़ा सुनने में प्रभावशाली लगता है, लेकिन पर्यावरण को आंकड़ों की नहीं, ऑक्सीजन की जरूरत है। यदि 12 जुलाई को बस्ती की धरती पर रोपे जाने वाले लाखों पौधों में से आधे भी जीवित नहीं बचे, तो यह केवल सरकारी धन की बर्बादी ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के विश्वास के साथ एक क्रूर मजाक होगा।
अब देखना यह है कि प्रशासन का यह अभियान केवल फाइलों में ‘सफल’ होता है या बस्ती की माटी में वास्तव में हरियाली बनकर उतरता है। बस्ती की जनता अब केवल आंकड़ों पर नहीं, परिणामों पर नजर रखेगी।
क्या आपको लगता है कि इस बार 44 लाख पौधों का लक्ष्य पूरा होगा और वे सुरक्षित रहेंगे?












