13 जुलाई की शिकायत के निस्तारण में 20 मई का स्पॉट मेमो लगाने का गंभीर आरोप, IGRS पोर्टल की कार्यप्रणाली पर उठे बड़े सवाल
शिकायतकर्ता का आरोप है कि 13 जुलाई को दर्ज की गई इस शिकायत के निस्तारण के लिए राजस्व कर्मचारी द्वारा जो रिपोर्ट (आख्या) और स्पॉट मेमो लगाया गया, उस पर तारीख 20 मई दर्ज है। आरोप है कि यह पुराना स्पॉट मेमो या रिपोर्ट किसी अन्य पूर्व शिकायत के निस्तारण में पहले ही उपयोग की जा चुकी है। एक ही रिपोर्ट या पुराने मेमो को बार-बार अलग-अलग मामलों में चस्पा कर देना यह साबित करता है कि मैदानी स्तर पर जमीनी हकीकत की जांच किए बिना ही कागजी खानापूर्ति कर दी जाती है।
अजीत मिश्रा (खोजी)
IGRS पोर्टल पर गंभीर लापरवाही: 13 जुलाई की शिकायत के निस्तारण में 20 मई का स्पॉट मेमो लगाने का आरोप
- राजस्व विभाग की मनमानी: एक ही पुरानी रिपोर्ट को बार-बार इस्तेमाल कर कागजी खानापूर्ति करने का दावा
- बस्ती के ग्राम पुरापिरई में जमीन कब्जा मामले की जांच आख्या पर विवाद, बिना मैदानी हकीकत परखे रिपोर्ट लगाने की चर्चा
- शिकायतकर्ता ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से की मांग—दोषी राजस्व कर्मियों के खिलाफ हो कड़ी विधिक और विभागीय कार्रवाई
बस्ती: जनसमस्याओं के त्वरित और पारदर्शी निस्तारण के लिए उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा संचालित IGRS (जनसुनवाई) पोर्टल की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। बस्ती जिले में राजस्व विभाग से जुड़ा एक ऐसा मामला सामने आया है, जो प्रशासनिक पारदर्शिता और मैदानी जांच की सच्चाई पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।
क्या है पूरा मामला?
प्राप्त जानकारी और दस्तावेजों के अनुसार, बस्ती जिले के तप्पा-कर्नैला परगना नगर पूरब तहसील क्षेत्र के अंतर्गत ग्राम पुरापिरई निवासी आदिल खान पुत्र असलम खान द्वारा IGRS पोर्टल पर एक शिकायत दर्ज कराई गई थी।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि 13 जुलाई को दर्ज की गई इस शिकायत के निस्तारण के लिए राजस्व कर्मचारी द्वारा जो रिपोर्ट (आख्या) और स्पॉट मेमो लगाया गया, उस पर तारीख 20 मई दर्ज है। आरोप है कि यह पुराना स्पॉट मेमो या रिपोर्ट किसी अन्य पूर्व शिकायत के निस्तारण में पहले ही उपयोग की जा चुकी है। एक ही रिपोर्ट या पुराने मेमो को बार-बार अलग-अलग मामलों में चस्पा कर देना यह साबित करता है कि मैदानी स्तर पर जमीनी हकीकत की जांच किए बिना ही कागजी खानापूर्ति कर दी जाती है।

दस्तावेजों से खुले परत-दर-परत राज़
मामले से संबंधित जो कागजात सामने आए हैं, वे इस प्रकार हैं:
- संदर्भ संख्या: 92618500016369
- शिकायत का विषय: गाटा संख्या 79 क, ख, ग, घ (क्षेत्रफल 0.5180 हेक्टेयर) पर सार्वजनिक भूमि/बंजर पर अवैध कब्जा कर घर बनाए जाने के संबंध में जांच और कार्रवाई की मांग।
- राजस्व कर्मियों की आख्या: लेखपाल द्वारा दी गई रिपोर्ट में यह दर्शाया गया कि भौतिक रूप से भूखंड का विभाजन नहीं हुआ है और मौके पर कोई निर्माण कार्य नहीं हो रहा है।
- तारीख और सत्यापन का विरोधाभास: दस्तावेजों पर 22/7/2026 और 23/07/2026 की तिथियां दर्ज हैं, जबकि स्पॉट मेमो और पुरानी आख्याओं के उपयोग को लेकर गंभीर अनियमितता के आरोप लगाए जा रहे हैं। इसके साथ संलग्न जीपीएस मैप कैमरे की तस्वीर में 19/06/2026 की तिथि और जगदीशपुर, उत्तर प्रदेश (कोऑर्डिनेट्स: Lat 26.661336° Long 82.705598°) का लोकेशन डेटा दर्ज है, जो तारीखों के फेरबदल और प्रशासनिक सुस्ती की ओर इशारा करता है।

उठ रहे हैं गंभीर सवाल
इस पूरे प्रकरण ने स्थानीय प्रशासन और राजस्व कर्मियों की कार्यशैली पर निम्नलिखित तीखे सवाल खड़े कर दिए हैं:
- पुरानी तारीख का इस्तेमाल क्यों? 13 जुलाई की शिकायत के निस्तारण में पुरानी तारीख (या पूर्व में प्रयुक्त) स्पॉट मेमो/रिपोर्ट का उपयोग क्यों किया गया?
- क्या मौके पर गए थे लेखपाल? क्या संबंधित राजस्व कर्मचारी ने वास्तव में मौके पर जाकर भौतिक सत्यापन किया था या कार्यालय में बैठकर ही फर्जी आख्या तैयार कर दी गई?
- उच्चाधिकारियों की भूमिका: रिपोर्ट पोर्टल पर अपलोड करने से पहले क्या क्षेत्र के उच्चाधिकारियों (कानूनगो/तहसीलदार) द्वारा इसका भौतिक सत्यापन किया गया था या बिना देखे ही इसे संस्तुति दे दी गई?
- पारदर्शिता पर बट्टा: यदि इस प्रकार पुरानी या फर्जी रिपोर्ट लगाकर मामलों का निस्तारण किया जाता रहेगा, तो आम जनता का IGRS प्रणाली से से विश्वास कैसे कायम रहेगा?
मुख्यमंत्री से निष्पक्ष जांच और कार्रवाई की मांग
शिकायतकर्ता ने इस मामले को बेहद गंभीरता से लेते हुए प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से हस्तक्षेप करने की गुहार लगाई है। मांग की गई है कि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच कराई जाए, गलत और भ्रामक आख्या लगाने वाले दोषी राजस्व कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय की जाए तथा उनके खिलाफ कठोर विधिक एवं विभागीय कार्रवाई अमल में लाई जाए।
यदि समय रहते ऐसे लापरवाह कर्मियों पर नकेल नहीं कसी गई, तो सरकार की मंशानुरूप चल रही ‘जनसुनवाई’ व्यवस्था महज एक छलावा बनकर रह जाएगी।
(नोट: प्रस्तुत तथ्य उपलब्ध शिकायत पत्रों, दस्तावेजों और प्राप्त आरोपों पर आधारित हैं। स्वतंत्र पुष्टि होने तक इन्हें आरोपों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।)

















