
पिछले कुछ वर्षों में बहुत तेज बदलाव हुआ है वो हुआ है किन्नर समाज में
अभी कुछ साल पहले तक ही किन्नरों के सम्मेलन होते थे तो उसमें लगता था कि ये सब मुस्लिम मजहब को मानते हैं…. किसी पीर बली आदि के लिए फातिहा पढ़े जाते थे…. देगा चढ़ती थीं …. मजारों की ओर चादर ले जाने वाले जलूस निकलते थे…
लेकिन यकायक ही क्या हुआ कि इनके सम्मेलनों में हवन सामग्री धूप की सुगन्ध फैलने लगीं …. फातिहा का स्थान मंत्रों ने ले लिया …. पीर की जगह गुरुओं ने लेली …. हरे रंग की जगह भगवा दिखने लगा…. कब्बाली मजार की जगह भजन , नगर कीर्तन परिक्रमा मठ दिखने लगे
और अब कुम्भ में विभिन्न किन्नर महामंडलेश्वर और किन्नर शंकराचार्य चर्चित हैं
क्या शास्त्र सम्मत है या शास्त्र विरोधी ये विषय अलग है
लेकिन खोजा बिरादरी का किन्नर समाज मे बदल जाना निश्चित ही सुखद अनुभूति देता है





