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यूपी का पुलिसिया प्रेमग्रंथ : हाइड्रोसील से शुरू और पोस्टमार्टम पर खत्म!

उत्तर प्रदेश

यूपी का पुलिसिया प्रेमग्रंथ : हाइड्रोसील से शुरू और पोस्टमार्टम पर खत्म!

अजीत मिश्रा (खोजी)

लखनऊ : जिस देश में सेना के एक जवान की शहादत पर हर एक आँख नम हो जाती है और पूरा मुल्क न्योछावर हो जाता है, वहीं एक पुलिस जवान की मौत से आवाम इस कदर अनजान बनी रहती है जैसे कुछ हुआ ही नहीं। माहौल इस कदर बेरुखा हो चला है कि ईमानदारी, फर्ज और निष्पक्षता को अपनी ढाल बनाकर जी रहे कुछ जाबांज़ पुलिसकर्मी आज उन तमाम बेग़ैरत लोगों के कर्मों का दंश झेलने के लिए विवश हैं… जिन्होंने वर्दी पहनकर वर्दी को ही विख्यात से कुख्यात बना दिया। अब ऐसी स्थिति में कुछ एक वर्दीधारी अपना खून और अपनी जान देकर भी आवाम के दिलों में भला क्या मुकाम हासिल कर लेंगे?

 

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एटा- खाट पर बेसुध पड़ा यह लड़का है “सत्यवीर”…..उम्र सिर्फ 17 साल… एटा के निधौलकला थाने के चंद्रभानपुर गांव का रहने वाला था। नौकरी के लिए जयपुर गया था। मार्च में एक लड़की लापता हुई और शक उस पर गया। कोई सबूत नहीं, सिर्फ शक। पुलिस ने पूछताछ के लिए बुलाया। परिवार ने जयपुर से बुलाकर बेटे को थाने भेजा। 1 अगस्त को उसका भाई उसे लेकर पहुंचा। आरोप है कि थाने में दरोगा सुरेंद्र यादव, आसिफ अली और सिपाही पुष्पेन्द्र, दिलीप समेत कई पुलिसकर्मियों ने उसे एक कमरे में ले जाकर बर्बरता से पीटा। और अब, सत्यवीर की लाश गांव के खेतों में पड़ी मिली है। उसके शरीर पर गंभीर चोटों के निशान हैं।

 

यह कोई इकलौती घटना नहीं है। याद कीजिए, 2021 में कासगंज में एक नाबालिग लड़की की गुमशुदगी के केस में 22 साल के अल्ताफ को थाने बुलाया गया। उसके पिता साथ में थे। वहां उसकी जमकर पिटाई हुई और बाद में उसकी लाश थाने की हवालात में लटकती मिली। पुलिस ने कहा उसने आत्महत्या कर ली। पर क्या वाकई?

 

मथुरा: यूपी के मथुरा जिला के गोवर्धन थानांतर्गत घटी हालिया घटना तो पुरस्कृत करने लायक है.. युवक को बुलाकर हवालात में इसलिए पीटा गया क्योंकि उसने दरोगा कपिल नागर द्वारा रिश्वत मांगे जाने की शिकायत सीएम योगी के पोर्टल पर कर दी थी। बताया जा रहा है कि SSP मथुरा साहब तो आरोपी दरोगा को बचाने के लिए पूरा दमख़म लगाए बैठे हैं। यहाँ तक कि डिप्टी सीएम बृजेश पाठक के हस्तक्षेप और SSP तथा CMO को कॉल करने के बाद भी कार्यवाही अब तक नहीं हुई है।

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डिप्टी CM के हस्तक्षेप के बाद एक सोशल एक्टिविस्ट को प्राप्त हुई मेडिको-लीगल रिपोर्ट में स्पष्ट लिखा है कि पीड़ित किसान के अंडकोशों पर लाठी-डंडे जैसे ब्लंट एंड हार्ड ऑब्जेक्ट से चोट की गई है। ये मेडिको रिपोर्ट अपराध के 3 दिन बाद की है। इसमें साफ़ साफ़ लिखा है कि पीड़ित के वृषणकोश पर तीन दिन पुरानी चोट हैं। बताया जा रहा है कि पुलिस का कहना है कि वो आरोपी पर ही मुक़दमा करने का सोच रही है क्योंकि पीड़ित ने झूठ बोला है कि दरोग़ा ने उसे पीटा है।

 

दूसरी तरफ पुलिस (मथुरा) ने अपने सार्वजनिक स्टेटमेंट में कहा है कि युवक को चौकी बुलाया गया था। युवक जब चौकी आया तो कहने लगा मुझे दर्द हो रहा है हाइड्रोसिल की बीमारी है। इसके बाद मथुरा पुलिस ने युवक का इलाज कराया। अब ऐसी मोहब्बत और मानवीय संवेदनाओं से भरी कहानी पर भला कौन फ़िदा ना हो? जब इन कहानियों को स्वर्ग में बैठे – हरिशंकर परसाई और राग दरबारी के श्रीलाल शुक्ल पढ़ते होंगे तो क्या सोचते होंगे?

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कानपुर: घाटमपुर तहसील के सजेती थानाक्षेत्र के एक गांव में पति-पत्नी के झगड़े की शिकायत पुलिस के पास पहुंची तो दरोगा और हेड कॉन्स्टेबल ने आरोपित पति को चौकी बुलाकर जमकर पीटा। आरोप है कि पट्टे की पिटाई से उसके शरीर पर निशान बन गए। छोड़ने के एवज में 50 हजार रुपये मांगे गए। पिटाई से आहत शख्स ने घर पहुंचकर फांसी लगाकर जान दे दी। घटना की सूचना पर पहुंची विधायक सरोज कुरील की नाराजगी के बाद अधिकारी मौके पर पहुंचे और पता चला कि आरोपित दारोगा और हेड कॉन्स्टेबल को निलंबित कर एफआईआर दर्ज की गई है।

 

इन घटनाओं को पिटाई कहना गलत होगा क्योंकि ये पिटाई नहीं, बल्कि प्रक्रिया बन चुकी है इस लोकतांत्रिक व्यवस्था की! 2018 में आगरा में हुई राजू गुप्ता की मौत की सीआईडी जांच में 17 पुलिसकर्मी अवैध हिरासत और गैर इरादतन हत्या के दोषी पाए गए। गोरखपुर में व्यापारी की मौत में कई पुलिस कर्मियों सहित नगद नारायण सिंह के नाम से मशहूर महाघूसखोर इंस्पेक्टर जगत नारायण सिंह के खिलाफ कार्यवाहियां हुई। भारत में पुलिस हिरासत में होने वाली मौतों के सबसे ज्यादा आंकड़े उत्तर प्रदेश से आते हैं। यूपी में ऐसे नामों की लिस्ट लगातार लंबी होती जा रही है “लखनऊ में मोहित पांडे…गोरखपुर में मनीष गुप्ता..आगरा में राजू गुप्ता…प्रयागराज में हीरालाल और लवकेश शर्मा..बागपत में साजिद..सीतापुर में राजू….नोएडा में योगेश आदि”। ये सभी लोग पुलिस कस्टडी या कथित पिटाई के शिकार बने।

 

ये कोई नए कारनामे नहीं हैं बल्कि सदियों से यही ढर्रा चला आ रहा है और शायद यही वजह है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में 1961 के एक मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस आनंद नारायण ने पुलिस पर तीखी टिप्पणी की थी!

 

“There is not a single lawless group in the whole of the country whose record of crime comes anywhere near the record of that organised unit which is known as the Indian Police Force.”

 

 

इस टिप्पणी का सीधे और सपाट शब्दों में अर्थ यह है कि “भारत में वर्दीधारी अपराधियों की एक ऐसी व्यवस्था मौजूद है, जिसे पुलिस के नाम से जाना जाता है ।”

 

“इस टिप्पणी से आहत सरकार ने इस टिप्पणी को हटाने के लिए शीर्षस्थ न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जिसे न्यायालय ने अस्वीकार कर दिया। यह टिप्पणी उत्तर प्रदेश में घटित एक घटना के सिलसिले में पुलिस अधिकारी मोहम्मद नईम के मामले को लेकर गई थी और आरोपी पुलिसकर्मी के विरुद्ध न्यायालय द्वारा नोटिस भी जारी किया गया था। हालांकि पुलिस अधिकारी द्वारा माफी मांगने पर उक्त नोटिस को न्यायमूर्ति ने रद्द कर दिया औऱ कहा था कि….

 

“मैंने नोटिस इसलिए जारी किया क्योंकि मैं लोक प्रशासन को यथासंभव साफ़-सुथरा बनाना चाहता हूँ। लेकिन एक व्यक्ति के प्रयास बहुत दूर तक नहीं जा सकते। अगर मुझे लगता कि मैं अपने अकेले प्रयासों से इस अस्तबल, यानी पुलिस बल, को साफ़ कर सकता हूँ, तो मुझे अकेले ही यह युद्ध छेड़ने में कोई हिचकिचाहट नहीं होती। मैं सेवानिवृत्ति के कगार पर हूँ और मेरे द्वारा दो-तीन महीने और इस तरह के कदम उठाने से पुलिस बल के संविधान और चरित्र पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। कुछ अपवादों को छोड़कर, सामान्यतः पुलिस बल इस निष्कर्ष पर पहुँच गया है कि अपराध की जाँच और सुरक्षा क़ानून का पालन करके नहीं की जा सकती और यह केवल क़ानून तोड़कर या उसे दरकिनार करके ही हासिल किया जा सकता है। कम से कम सौ साल की परंपराएँ तो यही दर्शाती हैं कि वे यही मानते हैं। अगर यह धारणा उनके मन से नहीं निकाली गई, तो सुधार की कोई संभावना नहीं है। मैं पूरी ज़िम्मेदारी के साथ कहता हूँ कि पूरे देश में एक भी ऐसा अराजक समूह नहीं है जिसका अपराध रिकॉर्ड उस संगठित इकाई, जिसे भारतीय पुलिस बल के नाम से जाना जाता है, के रिकॉर्ड के आसपास भी नजर आता हो। यदि पुलिस बल में मोहम्मद नईम जैसे अधिकारी होने चाहिए, तो बेहतर होगा कि हम अपने संविधान की धज्जियाँ उड़ा दें। लोकतंत्र और नागरिकों के अधिकारों को भूल जाएँ और न केवल अपने दंड विधानों में, बल्कि अपने शब्दकोशों में भी कानून और अन्य शब्दों के अर्थों को बदल दें। इन्हीं कारणों से मैं पुलिस अधिकारी मोहम्मद नईम की माफ़ी स्वीकार कर रहा हूँ और मोहम्मद नईम के खिलाफ कोई शिकायत दर्ज नहीं कर रहा हूँ। जिस व्यवस्था में कुछ मछलियों को छोड़कर हर मछली बदबूदार है, वहाँ एक-दो मछलियों को चुनकर यह कहना बेकार है कि वे बदबूदार हैं। इसलिए, मैं श्री मोहम्मद नईम के खिलाफ जारी नोटिस को रद्द करता हूँ।”

 

मैं जानता हूँ कि मेरी वजह से कई मीडिया दलालों के धंधों में बड़ी जबरदस्त गिरावट दर्ज हुई है। इसलिए इस लेख के बाद कई मीडियाई दलाल “वर्दी” को यह समझाने की कोशिश करेंगे कि मैं सिस्टम विरोधी हूँ..जबकि असलियत यह है कि किसी व्यवस्था के लिए सबसे बड़े विरोधी रूपी ज़हर उसके चाटुकार होते हैं.. न कि उस व्यवस्था के आलोचक!

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