

एक्सक्लूसिव इन्वेस्टिगेशन: सहारनपुर के चर्च कम्पाउंड में जमीन घोटाले का बड़ा खुलासा — फर्जी दस्तावेज़, अवैध बिक्री और प्रशासनिक साझेदारी की आशंका
सहारनपुर के प्रख्यात बाजोरिया रोड स्थित चर्च कम्पाउंड से हमारी टीम द्वारा की गई विस्तृत पड़ताल में ऐसे दस्तावेज़ और तथ्यों का जाल उजागर हुआ है जो यह संकेत देते हैं कि धार्मिक संपत्ति के नाम पर एक संगठित और योजनाबद्ध घोटाले को वर्षों से अंजाम दिया जा रहा है; जांच के दौरान मिले रेकॉर्ड और गवाहियों से स्पष्ट होता है कि चर्च की असली स्वामित्व डीड वर्ष 1929 में इलाहाबाद रजिस्ट्री कार्यालय में Lucknow Diocese के नाम दर्ज है, फिर भी हालिया वर्षों में Church of North India Trust Association तथा कथित Agra Diocese के नाम पर दर्ज कराए गए दस्तावेज़ों के आधार पर उसी संपत्ति के कई हिस्सों की आबादियाँ, गिफ्ट-डीड और विक्रय रजिस्ट्रेशन कराये गए हैं, जिनमें वर्ष 2024 की संदिग्ध रजिस्ट्री (लेखपत्र सं. 16157, पंजीकरण दिनांक 12 नवम्बर 2024) विशेष रूप से चिंताजनक है क्योंकि उसमें चर्च कम्पाउंड के घोषित सार्वजनिक उपयोग की जमीन — जिसे कॉलोनी नक्शे में पार्क व टैक्सी स्टैंड के रूप में दिखाया गया था — को छोटे-छोटे आवासीय प्लॉटों में बदलकर ₹96,16,000 जैसे बाजार मूल्य पर पंजीकृत किया गया है और स्टाम्प शुल्क मात्र ₹5,000 का दाखिला दिख रहा है; जब टीम ने मौके पर जाकर वास्तविक स्थिति देखी तो नक्शे में दर्शाए गए पार्क, टैक्सी स्टैंड या सार्वजनिक सुविधाएँ अनुपस्थित पाईं गईं और उनकी जगह वह जमीन निजी कारोबारियों या कथित खरीदारों के कब्जे में थी, जिनके नाम रजिस्ट्री में संगीता पुत्री सुरिन्दर सिंह, सचिन शर्मा, अर्पित शर्मा और सचिन कुमार जैसे व्यक्तियों के रूप में दर्ज हैं। हमारी पड़ताल ने यह भी उजागर किया कि Church of North India Trust Association नामक संस्था कानूनी तौर पर कई गंभीर विवादों में घिरी हुई प्रतीत होती है और इस संस्था के तथाकथित पदाधिकारियों पर दर्ज आपराधिक मुकदमों का जिक्र स्थानीय स्रोतों और हमारे दस्तावेजी सबूतों में मिलता है; इसी कारण दिल्ली हाईकोर्ट व अन्य न्यायालयों द्वारा पारित निर्देशों के बावजूद कुछ स्थानों पर इन संस्थाओं द्वारा संपत्ति के विक्रय और हस्तांतरण पर अंकुश लगाने के आदेशों के पालन की अनदेखी या सीधी अवहेलना की शंका बनती है। सहारनपुर विकास प्राधिकरण (SVP) के नक्शों में जब इस कॉलोनी के लिए पार्क, टैक्सी स्टैंड और सार्वजनिक उपयोग की ज़मीनें अंकित थीं, तब अधिकारियों के पास यह साफ दायित्व था कि सार्वजनिक भूमि का निजीकरण रोका जाए; बावजूद इसके हमारे पास मौजूद दस्तावेज़ और स्थानीय बयानों से संकेत मिलता है कि निर्माण व रजिस्ट्री के समय सरकारी अभिलेखों में चुपके से बदलाव कर या स्थानीय स्तर पर मिलीभगत के जरिए उन सार्वजनिक हिस्सों को निजी सम्पत्तियों में तब्दील कर दिया गया और उन्हें गुप्त तरीके से बेचा गया। चर्च कम्पाउंड में दर्ज हुई 1929 की मूल डीड, Lucknow Diocese के नाम पंजीकृत होने के बावजूद पिछले कुछ वर्षों में एक जटिल नेटवर्क सक्रिय रहा है जो फर्जी गिफ्ट डीड, दान पत्र, डमी लेटरहेड और नकली हस्ताक्षरों के जरिये पंजीकरण कराने और फिर उस संपत्ति का वैधानिकता के दायरे से बाहर बेचकर लाभ अर्जित करने का काम कर रहा है। इस पूरे मकड़जाल का एक पक्ष यह भी है कि जिन दस्तावेज़ों के आधार पर रजिस्ट्री करवाई जा रही है, वे कई बार तारीखों, हस्ताक्षरों और कानूनन आवश्यक सत्यापन के मानदंडों पर खरे नहीं उतरते; हमारे पास मौजूद कुछ प्रतियों में स्पष्ट विचलन और अनियमितताएँ मिलीं जो रजिस्ट्री अधिकारियों के संज्ञान में लाने योग्य हैं। स्थानीय समुदाय और चर्च से जुड़े वास्तविक हितधारक आशंकित हैं कि धनबल और प्रभाव का इस्तेमाल करके इस प्रकार की पंक्तियों को रेकॉर्ड में बदल दिया गया, जबकि वास्तविक स्वामी — Lucknow Diocese — ने न केवल अपनी कानूनी स्वामित्व का दावा बरकरार रखा है बल्कि अब इस पूरे घोटाले को उजागर करने और फर्जी रजिस्ट्री तथा विक्रय को रद्द कराने के लिए उच्च न्यायालयों में मुकदमों की तैयारी कर रही है; सूत्रों के मुताबिक Lucknow Diocese जल्द ही इलाहाबाद हाईकोर्ट अथवा सहारनपुर जिला न्यायालय में फर्जी दस्तावेज़ों, रजिस्ट्री कार्यालय की भूमिका और प्राधिकरण के सम्बद्ध अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू करने की राह पर है, और यदि अदालतों में साक्ष्य ठोस सिद्ध होते हैं तो इसमें कई प्रशासनिक अधिकारियों और रजिस्ट्रेशन कर्मचारियों के ऊपर भी आपराधिक और सेवा संबंधी कार्रवाई के आदेश आ सकते हैं। स्थानीय व्यापारियों और नागरिकों का कहना है कि यदि प्रशासन ने समय रहते कड़ी कार्रवाई की होती तो यह कम से कम रोकथाम के तरीके अपनाने योग्य मामला था; वहीँ कई लोग यह भी पूछ रहे हैं कि क्या सहारनपुर विकास प्राधिकरण की ओर से नक्शे मंजूर करने और बाद में उन सार्वजनिक स्थलों की निजी बिक्री में कानूनी मनमानी या कर्मचारी-स्तरीय सहमति का हाथ तो नहीं? हमारे स्रोत यह भी बताते हैं कि कुछ मामलों में रजिस्ट्री दस्तावेजों की पृष्ठभूमि में कब्जे की प्रक्रिया तब हुई जब स्थानीय स्तर पर दबाव बनाकर सार्वजनिक भूमि को “आवासीय” दिखा दिया गया और फिर उस पर मालिकाना हक के दस्तावेज़ बनाकर पंजीकरण कराया गया। यह मामला केवल जमीन के स्वामित्व का विवाद नहीं रहा; यह धार्मिक समुदाय की संपत्ति पर ज़रूरत से ज़्यादा हमले का मुद्दा बन चुका है, जिससे धार्मिक सौहार्द और समुदायों के बीच विश्वास भी प्रभावित हुआ है। हमने कई बार प्राधिकरण व रजिस्ट्री कार्यालय से स्पष्टीकरण मांगने की कोशिश की पर प्रतिक्रिया सीमित और पालोना रही; इस तरह की प्रशासनिक चुप्पी और धीमी कार्रवाई संदेह को और हवा देती है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चिंताजनक बात यह है कि यदि फर्जी दस्तावेज़ और नाजायज़ रजिस्ट्री धड़ल्ले से जारी की जा सकती है तो प्रणालीगत सुधार और जवाबदेही की आवश्यकता निहायत स्पष्ट हो जाती है — चाहे वह रजिस्ट्री प्रथाओं का कड़ा सत्यापन हो, सहारनपुर विकास प्राधिकरण के नक्शा अनुमोदन की पारदर्शिता हो, या प्रोजेक्टों में धार्मिक संस्थाओं की देनदारी का सत्यापन। अब अगले कदम के रूप में Lucknow Diocese की कानूनी तैयारी, हाईकोर्ट के पास मामले का जाना और यदि आवश्यक हुआ तो प्रशासनिक अफसरों के खिलाफ शिकायत दाखिल होना संभावित है; जनता और स्थानीय हितधारक इस बात पर नज़र रख रहे हैं कि क्या प्रशासन इस बार शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए त्वरित और कड़ी कार्रवाई करेगा या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा जैसा कि कई बार पहले सार्वजनिक संपत्तियों के विवादों में होते देखा गया है। यह रिपोर्ट उन दस्तावेज़ों, गवाहियों और रजिस्ट्री प्रतियों पर आधारित है जो हमारे पास मौजूद हैं और हमने अपनी जांच में सभी पक्षों के दावों तथा उपलब्ध आधिकारिक रेकॉर्ड्स को सामने रखते हुए निष्कर्ष निकाले हैं; आगे न्यायालयीन प्रक्रिया से ही अंतिम सत्य निश्चित होगा तथा यदि अंशतः भी दोष सिद्ध होते हैं तो यह न केवल सहारनपुर के लिए बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र के पारदर्शिता और जवाबदेही के सवाल उठाने वाला घटनाक्रम सिद्ध होगा। —
रिपोर्ट: अलिक सिंह, ; संपादक — वंदे भारत लाइव टीवी न्यूज़, संपर्क: 8217554083.














