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‘डीएम’ पर ‘नहीं’, भ्रष्ट ‘अध्यक्षों’ पर ‘भरोसा’: प्रशासक नियुक्ति पर उठे सवाल

जिला पंचायत में नई व्यवस्था: अध्यक्षों को प्रशासक बनाने पर सियासी घमासान; क्या ‘डील’ के तहत बदला गया प्रशासक का नियम? सरकार के निर्णय पर गंभीर आरोप

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अजीत मिश्रा (खोजी)

जिला पंचायत में प्रशासक नियुक्ति पर घमासान, सत्ता के गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म

बस्ती, 12 जुलाई 2026

​जिले में जिला पंचायत अध्यक्षों को प्रशासक नियुक्त करने के राज्य सरकार के निर्णय ने राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में तीखी बहस को जन्म दे दिया है। अब तक की स्थापित परंपरा रही है कि जिला पंचायत अध्यक्ष का कार्यकाल समाप्त होने के बाद जिलाधिकारी (डीएम) ही प्रशासक के रूप में कमान संभालते थे, लेकिन इस बार सरकार ने इस प्रक्रिया में बड़ा बदलाव किया है।अब तक की परंपरा के विपरीत, जहाँ जिलाधिकारी (डीएम) प्रशासक की भूमिका निभाते थे, सरकार ने इस बार जिला पंचायत अध्यक्षों को यह जिम्मेदारी सौंपी है।

प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल

नया आदेश जारी होने के बाद से ही इस निर्णय के पीछे के उद्देश्यों पर सवाल उठाए जा रहे हैं। आलोचकों का आरोप है कि इस नियुक्ति के लिए 25 करोड़ रुपये से अधिक की एक बड़ी ‘डील’ की गई है। हालांकि, सरकारी निर्देशानुसार, प्रशासक बनाए गए इन अध्यक्षों के अधिकारों को सीमित कर दिया गया है।

  • अधिकारों का बंटवारा: प्रशासक के रूप में अध्यक्ष न तो कोई नीतिगत फैसला ले सकते हैं, न ही कोई टेंडर जारी कर सकते हैं और न ही भुगतान प्रक्रिया में हस्तक्षेप कर सकते हैं।
  • डीएम की भूमिका: कार्ययोजना तैयार करने और टेंडर निकालने की प्रक्रिया अब डीएम के माध्यम से शासन को भेजी जाएगी और वहीं से मंजूरी मिलने के बाद ही काम शुरू हो सकेगा।
  • संजय चौधरी का कार्यकाल: इस बदलाव के साथ ही संजय चौधरी 12 जुलाई 2026 से ‘निवर्तमान अध्यक्ष’ की श्रेणी में आ गए हैं।

राजनीतिक प्रतिक्रिया

इस फैसले को लेकर विपक्ष और आम जनता में भी असंतोष की चर्चाएं तेज हैं। लेख में यह दावा किया गया है कि मंत्री ओमप्रकाश राजभर द्वारा की गई इस पैरवी का खामियाजा भविष्य में भाजपा को उठाना पड़ सकता है। स्थानीय स्तर पर लोग इस निर्णय को लोकतंत्र की स्वस्थ परंपराओं के विपरीत मान रहे हैं।

प्रमुख बिंदु और आरोप:

  • वित्तीय अनियमितताओं की चर्चा: स्थानीय स्तर पर इस नियुक्ति के पीछे 25 करोड़ रुपये से अधिक की कथित ‘डील’ होने का गंभीर आरोप लगाया गया है।
  • प्रशासक की सीमित शक्तियाँ: नई व्यवस्था के तहत, हालांकि अध्यक्ष प्रशासक बने हैं, लेकिन उनके पास कार्ययोजना बनाने, टेंडर निकालने, भुगतान करने या नीतिगत फैसले लेने का अधिकार नहीं होगा। ये सभी कार्य डीएम की देखरेख और शासन की मंजूरी से होंगे।
  • संजय चौधरी का कार्यकाल: इस निर्णय के साथ ही 12 जुलाई 2026 से संजय चौधरी ‘निवर्तमान अध्यक्ष’ की श्रेणी में आ गए हैं।
  • राजनीतिक प्रतिक्रिया: आलोचकों का तर्क है कि सरकार का यह कदम लोकतंत्र की स्थापित परंपराओं के विरुद्ध है। लेख में यह दावा किया गया है कि इस निर्णय के चलते जनता में असंतोष है, जिसका असर भविष्य में चुनावी परिणामों पर पड़ सकता है।

​सरकार के इस कदम पर अब आगे क्या राजनीतिक प्रतिक्रिया सामने आती है, यह देखना दिलचस्प होगा।

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