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लोकतंत्र के अदृश्य योद्धा: मतदाता पुनरीक्षण की चौखट पर पिसते शिक्षक — चुनाव आते ही क्यों बन जाते हैं प्रशासनिक चक्की का सबसे छोटा दाना…?

अधिकारी दबाव, धमकी-भय, संसाधन-शून्यता और मौन व्यवस्था के बीच लोकतंत्र की रीढ़ का दर्द चीख रहा है, पर सुनाई किसे दे रहा है…?

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लोकतंत्र के अदृश्य योद्धा: मतदाता पुनरीक्षण की चौखट पर पिसते शिक्षक — चुनाव आते ही क्यों बन जाते हैं प्रशासनिक चक्की का सबसे छोटा दाना…? अधिकारी दबाव, धमकी-भय, संसाधन-शून्यता और मौन व्यवस्था के बीच लोकतंत्र की रीढ़ का दर्द चीख रहा है, पर सुनाई किसे दे रहा है…?

भारत में चुनाव को लोकतंत्र का सबसे बड़ा पर्व, सबसे पवित्र प्रक्रिया और जनता की सर्वोच्च शक्ति का उत्सव कहा जाता है। हर बार मंचों, भाषणों, सरकारी विज्ञापनों और राजनीतिक नारों में लोकतंत्र के सच्चे सिपाही की महिमा का वर्णन किया जाता है, पर असल ज़मीनी सच्चाई यह है कि यही सिपाही— बीएलओ यानी बूथ लेवल अधिकारी, जो वास्तव में मतदाता पुनरीक्षण अभियान के सबसे सक्रिय स्तंभ हैं— इस लोकतंत्र की सेवा करते-करते प्रशासनिक दबाव, मानसिक प्रताड़ना, संसाधनों की भारी कमी, अपमानजनक परिस्थितियों और कर्तव्य के वैधानिक कवच से वंचित होने के बीच सबसे असुरक्षित जीवन जीने पर मजबूर कर दिए गए हैं। इस समय पूरे देश में चुनाव आयोग द्वारा विशेष गहन पुनरीक्षण अर्थात स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन की प्रक्रिया चलाई जा रही है, जिसका उद्देश्य मतदाता सूची को त्रुटिरहित, अद्यतन, पारदर्शी और निष्पक्ष बनाना बताया जा रहा है, किंतु जब इसी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर विपक्ष प्रश्नचिह्न खड़े करता है, प्रशासनिक तंत्र पर कार्यशैली को लेकर तीखी आलोचना होती है, जनसामान्य स्तर पर मतदाता पुनरीक्षण को लेकर भ्रम, कठिनाई और अविश्वास दिखाई देता है, तब भी उस आलोचना, संदेह और दबाव के बीच सबसे अधिक जूझने, सबसे ज्यादा बोझ उठाने और सबसे अधिक जोखिम लेने का काम बीएलओ के रूप में तैनात शिक्षकों को सौंप दिया जाता है, और यह सौंपना संगठन-दायित्व नहीं बल्कि परिस्थितिजन्य बलिदान की अनिवार्य लिखावट बन चुकी है। यह वे शिक्षक, शिक्षा मित्र और विद्यालयों में कार्यरत संवेदनशील शिक्षण-कर्मचारी हैं, जिनके कंधों पर न सिर्फ शिक्षा-व्यवस्था का दायित्व है, बल्कि चुनाव आते ही मतदाता-सूची पुनरीक्षण, जनगणना, सरकारी सर्वे, डाटा संकलन, घर-घर दस्तावेज़ जांच, आधार सत्यापन, जनसंवाद, नागरिक सत्यापन, मतदाता प्रपत्र संग्रहण, ऑनलाइन पोर्टल अपडेट, त्रुटि सुधार, आपराधिक प्रवृत्ति वाले घरों तक शारीरिक उपस्थिति, ग्रामीण-शहरी दोनों मोर्चों पर पैदल सर्वे, जोखिम भरे इलाकों में जानकारी संकलन, प्रशासन द्वारा निर्धारित लक्ष्य-पूर्ति, समय की अंतिम सीमा का अनुपालन, तथा रिपोर्ट-सबमिशन जैसे कार्य सौंप दिए जाते हैं, पर इन्हें न सुरक्षा अधिकारी, न संसाधन, न यात्रा-भत्ता, न पर्याप्त प्रशिक्षण, न मनोबल संरक्षण, और न काम के अनुपात में कोई प्रशासनिक सम्मान दिया जाता है, जिससे बीएलओ कर्तव्य के योद्धा कम, व्यवस्था के अदृश्य मजदूर अधिक बन जाते हैं, और यह त्रासदी सरकारी पत्रों में नहीं बल्कि उन शिक्षकों की आंखों में पढ़ी जा सकती है जो बैग में फॉर्म, हाथ में ऐप्लिकेशन, शिकायतों का बोझ, पैरों में चलते-चलते सूजते तलवे, और मन में भय की चुभन लेकर लोकतंत्र की सूची को सत्य की भाषा में बदलने का संघर्ष कर रहे हैं। सहारनपुर से लेकर पूरे प्रदेश तक जब जनसत्ता ने ऐसे कुछ बीएलओ से बात की तो जो तथ्य सामने आए, वे केवल प्रशासनिक अनियमितता नहीं, बल्कि मनोबल-वध और भय-निर्माण की एक संगठित मनोवैज्ञानिक संरचना का हिस्सा प्रतीत होते हैं, जहाँ शिक्षक यह साफ-साफ कह रहे हैं कि वे न इस पुनरीक्षण अभियान के खिलाफ हैं, न वे अपनी ड्यूटी से पीछे हटना चाहते हैं, पर वे सहयोग, सम्मान, सुरक्षा-आश्वासन और संवेदनशील प्रशासनिक संवाद के हकदार जरूर हैं, जिनसे उन्हें अब तक वंचित रखा गया, यही कारण है कि पुनरीक्षण लक्ष्य पूरा करने के लिए न तो उन्हें सरकारी वाहन दिया गया, न किसी सर्वे-संचार साथी का सहयोग मिला, न डिजिटल संसाधन मिले, न नेटवर्क-सुविधा की कोई व्यवस्थित मदद, बल्कि इन्हें केवल धमकी-आधारित लक्ष्य-पूर्ति संस्कृति के बीच लाकर खड़ा कर दिया गया, जिसमें एक बीएलओ शिक्षक ने दावा किया कि लक्ष्य पूरा न होने पर उन्हें प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने, सेवा-समाप्ति की कार्रवाई करने, वेतन-रोकने तथा आपराधिक मुकदमे में फंसाने तक की धमकी दी गई, जो न्यायिक प्रक्रिया में गंभीर आपराधिक दखल उत्पन्न करने का प्रमाण है और यह सवाल उठता है कि जब शिक्षक की ड्यूटी में अपराध-पंजीकरण की धमकी देनी सशक्त निगरानी नहीं बल्कि शक्ति का दुरुपयोग और मनोबल का विनाश है, तो इस प्रकार की ड्यूटी-संस्कृति लोकतंत्र की पारदर्शिता बढ़ा रही है या लोकतंत्र को चलाने वालों की सुरक्षा खत्म कर रही है…? यह व्यवस्था इस प्रश्न को भी जन्म देती है कि भारत में शिक्षक का पेशा केवल पढ़ाने के लिए है, या हर प्रशासनिक लक्ष्य-पूर्ति की बलि का पहला बकरा बनने के लिए…? उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव 2021 के दौरान भी यही शिक्षक लोकतंत्र की सेवा में लगाए गए थे, पर उस समय कोरोना का प्रहार था, आज बार-बार होने वाला प्रशासनिक दबाव है, तब हजारों शिक्षक कोविड की चपेट में आए, अस्पतालों तक पहुंचे, कई परिवारों ने अपने कमाने वाले शिक्षक खो दिए, लेकिन सरकार द्वारा उन मौतों का कोई आधिकारिक सम्मिलित आँकड़ा कभी जारी नहीं किया गया, मानो लोकतंत्र के पर्व में जान गंवाने वाला शिक्षक सरकारी रिपोर्ट में शामिल होने लायक भी न समझा गया, बाद में केवल आर्थिक मुआवजे की घोषणा हुई, जबकि मुआवजा मृत्यु का समाधान नहीं केवल मृत्यु के बाद की औपचारिक मरहम-पट्टी है, और यह बात चार वर्ष बीतने के बाद भी उतनी ही सच्ची है, न तब संवाद सुधरा, न आज लक्ष्य-पूर्ति दबाव संस्कृति बदली, इसीलिए शिक्षक बीएलओ यह नहीं कह रहे कि ड्यूटी गलत है या लोकतंत्र की सेवा नहीं करनी चाहिए, वे केवल इतना कह रहे हैं कि लोकतंत्र की सेवा करते-करते मौत मिले तो कम से कम सम्मान की भाषा में सरकारी अभिलेख में उनका नाम दर्ज हो, जीवन मिले तो सुरक्षा मिले, संवाद मिले तो धमकी-हीन मानव भाषा में मिले लेकिन आज तक प्रशासनिक संवाद का स्वर लोकतंत्र के सिपाही को सम्मानित करने की भाषा में कम और लक्ष्य-पूर्ति की धमकी में अधिक सुनाई दे रहा है, जिससे यह निष्कर्ष निकलता है कि लोकतंत्र की सेवा की कीमत लक्ष्यों से वसूली जा रही है, न कि सुरक्षा और सम्मान से दायित्व पूरा कराया जा रहा है, एक बीएलओ शिक्षक को नागरिकों से बात करनी है पर अधिकारी शिक्षक से डर में बात कराता है, नागरिक सुरक्षा का कार्यक्रम शिक्षक से कराया जाता है पर शिक्षक की सुरक्षा व्यवस्था राजनीतिक-प्रशासनिक मौन में गुम कर दी जाती है, लक्ष्य शिक्षक के द्वारा पूरा कराया जाता है पर दबाव शिक्षक पर और credit सभा-मंच पर किसी और को मिलता है, यह लोकतंत्र के पर्व की सबसे बड़ी irony है जहाँ शिक्षा का योद्धा केवल डाटा का वाहक, कागज़ का संग्रहकर्ता और लक्ष्य-पीड़ित बन जाता है, इस पुनरीक्षण आदेश 2025 का आधार लोकतंत्र की स्वच्छता बढ़ाना बताया जा रहा है पर इसका सबसे अस्वच्छ पक्ष यह है कि जो लोग इस काम की ज़िम्मेदारी उठा रहे हैं, वे ही सबसे अधिक दबाए, धमकाए, डराए, मानसिक रूप से थकाए, और कानूनी सुरक्षा आश्वासन से वंचित रखे गए हैं, और यह वंचना लोकतंत्र का संरक्षण नहीं लोकतंत्र के संरक्षकों का अपहरण है, अतः आज यह प्रश्न केवल सहारनपुर तक सीमित नहीं बल्कि पूरे देश के प्रशासनिक तंत्र की चौखट पर खड़े लोकतंत्र के बीएलओ शिक्षक समुदाय का है— कि क्या लोकतंत्र की सेवा सूची-सुधार के नाम पर जान-जोखिम, मानसिक-भय और प्रशासनिक धमकी संस्कृति में ही पूरी होगी, या न्यायहित में मनोबल-संरक्षण, सम्मानजनक संवाद और सुरक्षा-सहयोग के साथ भी पूरी कराई जा सकती है…? अगर लोकतंत्र सूची-सुधार से मजबूत होता है तो सूची-सुधार शिक्षक की मौत से नहीं शिक्षक की सुरक्षा से मजबूत होना चाहिए, लोकतंत्र की विजय शिक्षक के पिसे कंधों से नहीं, शिक्षक के सुरक्षित कंधों से लिखी जानी चाहिए, लोकतंत्र के उत्सव की पारदर्शिता तभी पूर्ण मानी जाएगी जब लोकतंत्र को चलाने वालों की पीड़ा, थकान, भय और असुरक्षा भी पारदर्शी सरकारी आंकड़ों में जगह पा सके, परंतु आज तक ऐसा नहीं हुआ, अतः यह पुनरीक्षण याचना शिक्षकों की नहीं बल्कि लोकतंत्र सुरक्षा सिद्धांत की याचना है जहाँ लोकतंत्र, शिक्षक, सूची और न्याय एक ही पंक्ति में लिखे जाएं— सम्मान, सुरक्षा और सत्य के साथ


रिपोर्ट : अलिक सिंह
संपादक – वंदे भारत लाइव टीवी न्यूज
ब्यूरो प्रमुख – दैनिक आशंका बुलेटिन, सहारनपुर
संपर्क : 8217554083

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