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।। अफसर ‘बीमार’, डग्गामार ‘बेखौफ’: बस्ती की सड़कों पर मौत का तांडव।

माला जी की 'बीमारी' और डग्गामारों की 'मस्ती'— आखिर जनता ही क्यों पिसे हर बार?

अजीत मिश्रा (खोजी)

सिस्टम की ‘नींद’ और डग्गामारों की ‘दौड़’: आखिर कब तक?

सोमवार 19 जनवरी 26, उत्तर प्रदेश।

बस्ती।। सड़कों पर दौड़ते डग्गामार वाहन आज जिले की पहचान बन चुके हैं। नियम-कानून कागजों की शोभा बढ़ा रहे हैं और सड़कों पर मौत का तांडव बेखौफ जारी है। ‘ऑल यूपी’ और ‘ऑल इंडिया’ परमिट के नाम पर जिस तरह से नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं, वह परिवहन विभाग की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है।सूत्र बताते हैं कि आरटीओ विभाग के कुछ बाबू और कर्मचारी इन डग्गामार संचालकों के साथ ‘गलबहियां’ कर रहे हैं। फिटनेस और परमिट से जुड़े सवालों पर अधिकारियों की चुप्पी उनकी संलिप्तता की ओर इशारा करती है। जब प्रवर्तन टीम निकलती भी है, तो वह केवल ‘टारगेट’ और ‘खानापूर्ति’ तक सीमित रहती है। लग्जरी कारों को निजी उपयोग के नाम पर टैक्सी की तरह चलाया जा रहा है, लेकिन विभाग की फाइलें सफेद हाथी बनी हुई हैं।

🔥जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ता विभाग

प्रवर्तन की जिम्मेदारी संभालने वाली माला बाजपेयी ने बीमारी का हवाला देकर अपना पल्ला झाड़ लिया है। सवाल यह उठता है कि क्या सरकारी तंत्र इतना लाचार है कि एक अधिकारी के हटने के बाद पूरा विभाग पंगु हो गया है? या फिर यह ‘बीमारी’ सिर्फ एक ढाल है ताकि डग्गामारों को खुला मैदान मिल सके? वर्तमान में आरटीओ प्रशासन के कंधों पर दोहरा भार है, जिसका सीधा फायदा माफिया उठा रहे हैं।हैरानी की बात यह है कि जिले में प्रवर्तन (Enforcement) की जिम्मेदारी संभालने वाला कोई नहीं है। जिम्मेदार अधिकारी ‘बीमारी’ का बहाना बनाकर कुर्सी छोड़ चुके हैं, जिससे परिवहन माफियाओं के हौसले बुलंद हैं। बिना फिटनेस और बिना परमिट के ये वाहन न केवल सरकार को राजस्व का चूना लगा रहे हैं, बल्कि आम जनता की जान को भी जोखिम में डाल रहे हैं।

🔥चौराहे बने ‘अवैध स्टैंड’

बड़ेवन चौराहे से लेकर शहर के मुख्य रास्तों तक, लग्जरी कारों और डग्गामार बसों ने कब्जा कर रखा है। निजी इस्तेमाल के लिए पंजीकृत गाड़ियाँ धड़ल्ले से टैक्सियों के रूप में चल रही हैं। क्या विभाग को यह भीड़ दिखाई नहीं देती? या फिर ‘सुविधा शुल्क’ के खेल ने आंखों पर पट्टी बांध दी है?

🔥चंद रुपयों के लिए जान का सौदा

अयोध्या और लखनऊ जैसे लंबे मार्गों पर ठूस-ठूस कर भरी जा रही सवारियां किसी बड़े हादसे को दावत दे रही हैं। स्थानीय प्रशासन और आरटीओ विभाग की यह ‘खानापूर्ति’ वाली कार्रवाई अब जनता को रास नहीं आ रही। सड़कों पर केवल ‘चेकिंग’ का दिखावा होता है, जबकि असलियत में डग्गामार वाहन बिना रोक-टोक फर्राटा भर रहे हैं।

क्या शासन-प्रशासन तब जागेगा जब इन डग्गामार बसों के कारण कोई मासूम अपनी जान गंवाएगा? या फिर ‘सुविधा शुल्क’ की चमक के आगे जनता की सुरक्षा की कोई कीमत नहीं है? मंडल स्तर के अधिकारियों को इस ‘डग्गामार सिंडिकेट’ को तुरंत ध्वस्त करना चाहिए, वरना यह माना जाएगा कि भ्रष्टाचार की जड़ें विभाग में बहुत गहरी हैं।यदि समय रहते इन ‘सड़क के लुटेरों’ पर लगाम नहीं कसी गई और विभाग ने अपनी जिम्मेदारी नहीं समझी, तो किसी बड़े हादसे की जिम्मेदारी लेने वाला भी कोई नहीं होगा। अब समय आ गया है कि शासन स्तर से इस भ्रष्टाचार और लापरवाही की उच्च स्तरीय जांच हो और दोषियों पर कठोर कार्रवाई की जाए।

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