

बलौदा बाजार नगर का हृदय कहे जाने वाला गार्डन चौक स्थित ऐतिहासिक गार्डन आज खुद सवाल पूछ रहा है।नगर की पहचान रहा बड़ा (महाराजा) गेट, जिसे शहर की शान माना जाता था, उसे उखाड़कर हटाया गया और चुपचाप हाई स्कूल के पास बनी चौपाटी में स्थापित कर दिया गया।
इतना ही नहीं, एक घोड़े की मूर्ति, जो कभी गौरव और पहचान का प्रतीक हो सकती थी, उसे भी दो दुकानों के बीच इस तरह छिपाकर रख दिया गया, मानो उसे देखने का अधिकार जनता को नहीं, सिर्फ सत्ता को हो।
जनता के पैसों से खेल?
सबसे बड़ा और पीड़ादायक प्रश्न यही है कि यह सब किसके आदेश पर और किसके हित में किया गया?
क्या जनता के टैक्स के पैसों से बने सार्वजनिक संसाधनों को इस तरह इधर-उधर करना, छिपाना और उनकी मूल पहचान मिटाना दुरुपयोग नहीं है?
आज आम नागरिक पूछ रहा है —
दोष किसका है?
जवाबदेही किसकी बनती है?
क्या इस पूरे घटनाक्रम के लिए
राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा,
नगर पालिका अध्यक्ष अशोक जैन,
या फिर शिक्षा मंत्री गुरु खुशवंत साहेब
जिम्मेदारी से बच सकते हैं?
विकास या मनमानी?
विकास के नाम पर यदि शहर की धरोहरों से खिलवाड़ हो, यदि बिना सार्वजनिक विमर्श के फैसले लिए जाएं, तो यह विकास नहीं बल्कि मनमानी सत्ता का प्रदर्शन कहलाएगा।
गार्डन चौक से गेट हटाने का निर्णय आखिर किस बैठक में हुआ?
क्या नगरवासियों की सहमति ली गई?
क्या इसका कोई लिखित प्रस्ताव सार्वजनिक है?
इन सवालों के जवाब आज भी हवा में लटके हैं।
अपने ही वार्ड में पार्षद “अतिथि” भी नहीं!
इसी चौपाटी के उद्घाटन को लेकर एक और मामला सामने आया है, जिसने इस पूरे घटनाक्रम को राजनीतिक और सामाजिक रूप से और संवेदनशील बना दिया है।
जिस वार्ड क्रमांक 02 में करोड़ों की लागत से चौपाटी बनी, उसी वार्ड के युवा आदिवासी पार्षद श्री अमितेश नेताम को उद्घाटन समारोह में वह सम्मान नहीं दिया गया, जो परंपरागत रूप से हर जनप्रतिनिधि को मिलता आया है।
आमंत्रण पत्र में —
न तो उनका नाम विशिष्ट अतिथि के रूप में दर्ज किया गया,
न ही उन्हें उस गरिमा के साथ स्थान दिया गया, जो उनके पद और जनादेश के अनुरूप हो।
उन्हें बस नगर के अन्य पार्षदों की सामान्य सूची में समाहित कर दिया गया।
यह सिर्फ अपमान नहीं, एक संकेत है
यह मामला सिर्फ एक नाम छूटने का नहीं है।
यह सवाल उठाता है — क्या यह एक युवा आदिवासी जनप्रतिनिधि की अनदेखी है?
क्या सत्ता के गलियारों में आज भी कुछ आवाज़ें असहज लगती हैं?
नगर में इससे पहले जहां-जहां उद्घाटन या भूमिपूजन हुआ, वहां संबंधित वार्ड के पार्षद का नाम मुख्य पृष्ठ, शिलापट्ट और मंच पर प्रमुखता से रहा।
तो फिर इस बार ऐसा क्या बदल गया?
चुप नहीं था पार्षद
अपने सम्मान और अपने वार्ड की आवाज़ को दबता देख पार्षद श्री अमितेश नेताम ने चुप्पी साधने के बजाय सीधे कलेक्टर से शिकायत कर दी।
उनका यह कदम सिर्फ व्यक्तिगत विरोध नहीं, बल्कि उस व्यवस्था के खिलाफ आवाज़ है, जहां जनता के चुने हुए प्रतिनिधि को ही हाशिए पर खड़ा कर दिया जाता है।
अब नजरें जवाब पर
आज बलौदा बाजार की जनता दो स्तरों पर जवाब चाहती है —
क्या शहर की संपत्तियों से इस तरह मनमाना व्यवहार जायज़ है?
क्या एक आदिवासी युवा पार्षद को नजरअंदाज करना सत्ता की सोच को उजागर नहीं करता?
भव्य उद्घाटन से पहले ही यह चौपाटी विवाद, सवाल और संवेदनाओं का केंद्र बन चुकी है।
अब देखना यह है कि क्या जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग जवाब देंगे,
या फिर यह मामला भी समय की धूल में दबा दिया जाएगा।
क्योंकि जब विकास में पारदर्शिता नहीं और सम्मान में समानता नहीं,
तो सवाल उठना लाज़मी है।








