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भारतीय समाज महिला  एडवोकेट शिवानी जैन

भारतीय समाज महिला  एडवोकेट शिवानी जैन

भारतीय समाज महिला  एडवोकेट शिवानी जैन

 

भारतीय समाज में नारी की स्थिति हमेशा से एक गहरी बहस का केंद्र रही है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जब हम महिला अधिकारों और उनकी सुरक्षा की बात करते हैं, तो यह केवल कानूनी प्रावधानों का मसला नहीं रह जाता, बल्कि यह मानवीय संवेदनाओं, सामाजिक ढांचों और सदियों पुरानी मानसिकता को बदलने की एक गंभीर पुकार बन जाती है। हकीकत तो यह है कि आज भी समाज के कई हिस्सों में महिलाओं की स्थिति ‘ऊपर से फिट-फाट, अंदर से मोकाम-घाट’ जैसी बनी हुई है, जहाँ कागजों पर तो वे स्वतंत्र हैं, लेकिन धरातल पर उनकी सुरक्षा और अधिकारों के बीच कोसों का फासला है।

विद्वान जे. एस. मिल ने अपनी कालजयी रचना ‘द सब्जेक्शन ऑफ विमेन’ में स्पष्ट किया था कि किसी भी समाज की प्रगति का मापदंड उस समाज में महिलाओं को मिलने वाली स्वतंत्रता और न्याय से तय होता है। उनका मानना था कि महिलाओं की अधीनता कोई प्राकृतिक सत्य नहीं, बल्कि एक कृत्रिम सामाजिक व्यवस्था है। यदि हम मिल के विचारों की रोशनी में आज के परिवेश को देखें, तो हम पाते हैं कि आधुनिक युग में महिलाएं अपनी योग्यता के झंडे तो गाड़ रही हैं, लेकिन सुरक्षा के मोर्चे पर वे आज भी असुरक्षित महसूस करती हैं। घर की दहलीज से लेकर कार्यस्थल की चारदीवारी तक, ‘आस्तीन के सांप’ हर जगह मौजूद हैं, जो उनकी गरिमा को डसने का कोई मौका नहीं छोड़ते।

अधिकारों की बात करें तो, सिमोन द बोउआर ने अपनी प्रसिद्ध कृति ‘द सेकेंड सेक्स’ में एक बहुत ही मार्मिक बात कही थी कि “स्त्री पैदा नहीं होती, बल्कि बना दी जाती है।” उनका यह विचार यह समझने के लिए पर्याप्त है कि बचपन से ही लड़कियों को सुरक्षा के नाम पर जिस तरह की पाबंदियों में बांधा जाता है, वह उनके अधिकारों का पहला गला घोंटना है। समाज उन्हें ‘घर की लाज’ की उपमा देकर उनके चारों ओर एक अदृश्य घेरा बना देता है, जिससे बाहर निकलना उनके लिए ‘लोहे के चने चबाने’ जैसा दुष्कर कार्य हो जाता है। अधिकारों की यह लड़ाई केवल मताधिकार या संपत्ति के अधिकार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अपने शरीर, अपने विचारों और अपनी पसंद पर पूर्ण नियंत्रण की मांग है।

सुरक्षा के विषय पर जब हम विचार करते हैं, तो अक्सर हमारा ध्यान केवल शारीरिक हिंसा की ओर जाता है, परंतु मानसिक और आर्थिक असुरक्षा उससे भी अधिक घातक है। समाज सुधारक बी. आर. अंबेडकर ने कहा था कि “मैं किसी समुदाय की प्रगति को उस समुदाय की महिलाओं द्वारा की गई प्रगति से मापता हूं।” यदि महिलाएं रात के अंधेरे में बेखौफ बाहर नहीं निकल सकतीं, तो यह प्रगति केवल एक छलावा है। हम चाँद पर पहुँचने की बात करते हैं, लेकिन अपनी बेटियों को सुरक्षित सड़क देने में अक्सर ‘मारे-मारे फिरते’ हैं। कानून की सख्ती अपनी जगह है, लेकिन जब तक समाज की नजर नहीं बदलेगी, तब तक सुरक्षा एक मृगतृष्णा ही बनी रहेगी।

आज के समय में शिक्षा को महिला सशक्तिकरण का सबसे बड़ा हथियार माना जाता है। सावित्रीबाई फुले ने जिस संघर्ष के साथ शिक्षा की अलख जगाई थी, उसका उद्देश्य केवल साक्षरता नहीं, बल्कि अधिकारों के प्रति जागरूकता था। विद्वानों का तर्क है कि शिक्षित महिला न केवल अपने अधिकारों को पहचानती है, बल्कि वह अन्याय के खिलाफ ‘दीवार बनकर खड़ी’ हो जाती है। फिर भी, उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद कार्यस्थलों पर होने वाला भेदभाव और सुरक्षा की कमी यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हमारी शिक्षा प्रणाली वास्तव में मानसिकता को बदलने में सफल रही है?

मर्यादा और सुरक्षा के नाम पर महिलाओं की स्वतंत्रता को सीमित करना ‘नेकी कर और कुएं में डाल’ जैसी बात हो गई है। लोग सुरक्षा के नाम पर पाबंदियां तो थोप देते हैं, लेकिन उन अपराधियों के खिलाफ सामूहिक चेतना नहीं जगाते जो इस सुरक्षा को खतरे में डालते हैं। मैरी वोल्स्टनक्राफ्ट ने अठारहवीं सदी में ही ‘ए विंडिकेशन ऑफ द राइट्स ऑफ वुमन’ में तर्क दिया था कि महिलाओं को पुरुषों की तरह ही तर्कसंगत प्राणी माना जाना चाहिए। जब तक हम उन्हें केवल एक ‘वस्तु’ या ‘रक्षण योग्य पात्र’ के रूप में देखते रहेंगे, तब तक उन्हें बराबरी का दर्जा मिलना ‘टेढ़ी खीर’ ही साबित होगा।

समाज में व्याप्त पितृसत्तात्मक सोच ने सुरक्षा के नाम पर महिलाओं को पिंजरे में कैद करने की कोशिश की है, भले ही वह पिंजरा सोने का ही क्यों न हो। अधिकार वे नहीं हैं जो कोई आपको देता है, बल्कि वे हैं जिन्हें आपसे कोई छीन नहीं सकता। लेकिन विडंबना यह है कि आज भी महिलाओं को अपने बुनियादी हक पाने के लिए ‘हाथ-पांव मारने’ पड़ते हैं। विद्वान अमृता प्रीतम की कविताओं में जिस पीड़ा का उल्लेख मिलता है, वह वही पीड़ा है जो अधिकार विहीनता से उपजती है। वह अधिकार, जो व्यक्ति को अपनी पहचान के साथ जीने का गौरव प्रदान करता है।

सुरक्षा की समस्या का समाधान केवल पुलिस या कोर्ट के पास नहीं है। यह हर घर की परवरिश और हर स्कूल की शिक्षा में निहित है। जब तक घर का बेटा अपनी बहन को एक स्वतंत्र इंसान के रूप में नहीं देखेगा, तब तक समाज की बेटियां असुरक्षित ही रहेंगी। यह कहना गलत नहीं होगा कि ‘एक सड़ी मछली पूरे तालाब को गंदा करती है’, और समाज की यह सड़ी हुई मानसिकता ही है जो बलात्कार, छेड़छाड़ और घरेलू हिंसा जैसे अपराधों को जन्म देती है। हमें ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता है जहाँ सुरक्षा कोई उपहार न हो, बल्कि एक स्वाभाविक अधिकार हो।

अंततः, महिला अधिकारों और सुरक्षा का रास्ता आत्म-सम्मान और सामूहिक जिम्मेदारी से होकर गुजरता है। यह समय ‘अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत’ वाली स्थिति का इंतजार करने का नहीं है, बल्कि सक्रिय होकर ऐसी नीतियों और सामाजिक मूल्यों को स्थापित करने का है जहाँ हर महिला अपनी पूरी क्षमता के साथ जी सके। विद्वानों के विचार और दर्शन हमें दिशा दिखा सकते हैं, मुहावरे हमारे अनुभवों को व्यक्त कर सकते हैं, लेकिन बदलाव की असली मशाल तो स्वयं समाज को ही जलानी होगी। जब तक अधिकारों की इस लड़ाई में पुरुष और महिलाएं कंधे से कंधा मिलाकर नहीं चलेंगे, तब तक न्याय का सपना ‘आसमान के तारे तोड़ने’ जैसा ही बना रहेगा। गरिमा और सुरक्षा की इस यात्रा में हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हर महिला अपनी नियति की स्वयं निर्माता बने और समाज उसके पंखों को काटने के बजाय उसके आसमान को और विशाल बनाए।

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