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नगर पालिका में “विकास” या “विवेकहीन पक्षपात”? गार्डन चौक से जैन मंदिर तक—सवालों के घेरे में नगर पालिका अध्यक्ष अशोक जैन

एक तरफ़ “सुशासन” का दावा, दूसरी तरफ़ पसंदीदा इलाक़ों पर मेहरबानी! नगर पालिका अध्यक्ष पर पक्षपात के गंभीर आरोप, जनता में उबाल

नगर की फिज़ा में इन दिनों असंतोष साफ़ महसूस किया जा सकता है। कारण है—नगर पालिका अध्यक्ष अशोक जैन के कार्यशैली को लेकर उठते गंभीर सवाल। एक तरफ़ गार्डन चौक स्थित सार्वजनिक गार्डन के मेन गेट में बदलाव कर कथित हेरफेर, तो दूसरी तरफ़ जैन मंदिर के सामने प्राथमिकता के आधार पर बनाई गई नई सड़क। इन दोनों घटनाओं ने मिलकर एक ही सवाल को जन्म दिया है—क्या नगर पालिका का विकास सबके लिए है या सिर्फ़ अपनों के लिए?
सार्वजनिक संपत्ति में हेरफेर—किसके आदेश से?
गार्डन चौक का गार्डन शहर की सार्वजनिक धरोहर है। यह न किसी व्यक्ति विशेष की है, न किसी समाज की। ऐसे में इसके मेन गेट में बदलाव को लेकर यह सवाल उठना लाज़मी है कि यह निर्णय किस नियम, किस प्रस्ताव और किस अनुमति के तहत लिया गया?
स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि न तो परिषद में इस पर खुली चर्चा हुई, न ही आमजन को इसकी जानकारी दी गई। यदि सब कुछ नियमों के तहत था, तो फिर पारदर्शिता क्यों नहीं दिखाई गई?
जैन मंदिर के सामने ही क्यों चमक गई सड़क?
विकास कार्यों की प्राथमिकता आमतौर पर जनसंख्या, आवश्यकता और जर्जर स्थिति के आधार पर तय होती है। लेकिन नगर में चर्चा है कि जैन मंदिर के सामने की सड़क को विशेष तवज्जो देकर नवनिर्मित कराया गया, जबकि कई वार्डों में सड़कें वर्षों से बदहाल हैं।
जनता पूछ रही है—क्या सड़कें भी अब आस्था देखकर बनेंगी?
क्या नगर पालिका अध्यक्ष का पद किसी एक समाज के हित साधने के लिए है?
पैसा जनता का, खर्च चुनिंदा समाज पर?
सबसे तीखा सवाल तब उठता है जब नगर पालिका के बजट खर्च की बात आती है। आरोप हैं कि नगर निधि से होने वाला खर्च बार-बार जैन समाज से जुड़े कार्यों पर केंद्रित नज़र आता है।
जबकि यह पैसा हर करदाता नागरिक का है—चाहे वह किसी भी समाज, धर्म या वर्ग से हो।
“हम टैक्स सब बराबर देते हैं, लेकिन सुविधा कुछ खास इलाक़ों को ही मिलती है। यह लोकतंत्र नहीं, भेदभाव है।”
— वार्डवासी
नेतृत्व पूरे शहर का होता है, समाज विशेष का नहीं
नगर पालिका अध्यक्ष का पद सम्मान के साथ बड़ी जिम्मेदारी भी लाता है। उनसे अपेक्षा होती है कि वे पूरे शहर और जिले के विकास के बारे में सोचें, न कि अपने व्यक्तिगत या सामाजिक जुड़ाव के आधार पर फैसले लें।
जब फैसलों में पक्षपात की गंध आने लगे, तो भरोसा टूटता है—और यही आज हो रहा है।
सवाल जो जवाब मांगते हैं
गार्डन चौक के गेट में बदलाव का प्रस्ताव और स्वीकृति कहाँ है?
सड़क निर्माण की प्राथमिकता तय करने के मापदंड क्या थे?
क्या अन्य वार्डों की समस्याएँ कम महत्वपूर्ण हैं?
नगर निधि के खर्च का सामाजिक संतुलन क्यों नहीं दिखता?
अब चुप्पी नहीं, जवाब चाहिए
शहर की जनता अब भावनाओं और नारों से आगे बढ़कर जवाब और कार्रवाई चाहती है। यदि आरोप निराधार हैं, तो नगर पालिका अध्यक्ष को दस्तावेज़ों के साथ स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। और यदि कहीं गलती हुई है, तो स्वीकारोक्ति और सुधार ही विश्वास बहाल कर सकता है।
विकास वही सच्चा है, जो सबको साथ लेकर चले।
वरना इतिहास गवाह है—पक्षपात की बुनियाद पर खड़ा कोई भी नेतृत्व ज़्यादा देर तक नहीं टिकता।

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